Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
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VṛttiGovind
LSK 659
वैकल्पिकपत्वविधायकं विधिसूत्रम्
स्फुरतिस्फुलत्योर्निर्निविभ्यः
Aṣṭādhyāyī 8.3.76
Vṛtti Varadarājācārya

षत्वं वा स्यात्। निःष्फुरति, निःस्फुरति।

णू स्तवने॥ ३१॥ परिणूतगुणोदयः। नुवति। नुनाव। नुविता।

टुमस्जो शुद्धौ॥३२॥ मज्जति। ममज्ज। ममज्जिथ। मस्जिनशोरिति नुम्।

वार्तिकम्- मस्जेरन्त्यात्पूर्वो नुम्वाच्यः। संयोगादिलोपः। ममङ्क्थ।

मङ्क्ता। मङ्क्ष्यति। अमाङ्क्षीत्। अमाङ्क्ताम्। अमाङ्क्षुः।

रुजो भङ्गे॥३३॥ रुजति। रोक्ता। रोक्ष्यति। अरौक्षीत्।

भुजो कौटिल्ये॥३४॥ रुजिवत्। विश प्रवेशने॥ ३५॥ विशति।

मृश आमर्शने॥३६॥ आमर्शनं स्पर्शः।

अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम्। अम्राक्षीत्, अमाक्षीत्, अमृक्षत्।

षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु॥३७॥ सीदतीत्यादि॥

शद्लृ शातने॥३८॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६५९- स्फुरतिस्फुलत्योर्निनिविभ्यः। स्फुरतिश्च स्फुलतिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः स्फुरतिस्फुलती, तयोः स्फुरतिस्फुलत्योः। निर् च निश्च विश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो निर्निवयः, तेभ्यो निर्निविभ्यः। स्फुरतिस्फुलत्योः पष्ठ्यन्तं, निर्निविभ्यः पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। सहेः षाढः सः से सः, अपदान्तस्य मूर्धन्यः से मूर्धन्यः और सिवादीनां वाड्व्यवायेऽपि से वा की अनुवृत्ति आती है।

निर्, नि और वि उपसर्ग से परे स्फुर् और स्फुल् धातुओं के सकार को विकल्प से षकार आदेश होता है।

निःष्फुरति, निःस्फुरति। यहाँ पर निर् उपसर्ग के रेफ को विसर्ग करने के बाद शरीरे खरि वा विसर्गलोपो वक्तव्यः वार्तिक से वैकल्पिक विसर्गलोप और षत्व होकर निष्फुरति एवं विसर्गलोप के अभावपक्ष में वा शरि से विसर्ग के स्थान में विसर्ग ही होने पर निःष्फुरति तथा उसके भी अभावपक्ष में विसर्जनीयस्य सः से सकार और उसके स्थान पर ष्टुना ष्टुः ष्टुत्व होकर निष्फुरति ये तीन रूप होते हैं। इससे षत्व न होने के पक्ष में निःस्फुरति भी बनता है।

णू स्तवने। णू धातु स्तुति करना या प्रशंसा करना अर्थ में है। णो नः से धातु के आदि में विद्यमान णकार के स्थान पर नकार आदेश होकर नू बन जाता है। इस धातु के परिणत-गुणोदयः आदि प्रयोग मिलते हैं। अतः यह धातु ऊदन्त है न कि उदन्त। इसमें किसी वर्ण की इत्संज्ञा नहीं होती है। यह धातु परस्मैपदी, सेट् और कुटादि है। अतः णित् और णित् से भिन्न में गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्दित् से ङिद्वद्भाव होता है। अजादि प्रत्यय के परे अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से उवङ् होता है।

नुवति। नू से लट्, तिप्, श, अपित् शित् होने के कारण ङिद्वद्भाव होकर गुण का निषेध, अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से उवङ् आदेश, न्+उव्+अ+ति, वर्णसम्मेलन, नुवति। नुवतः, नुवन्ति आदि।

लिट् में- नुनाव, नुनुवतुः, नुनुवुः, नुनुविथः, नुनुवथुः, नुनुव, नुनाव-नुनव, नुनुविव, नुनुविम। आगे- नुविता। नुविष्यति। नुवतु। अनुवत्। नुवेत्। नूयात्। अनुवीत्। अनुविष्यत्।

टुमस्जो शुद्धौ। टुमस्जो धातु शुद्ध होना अर्थ में है। आदिर्जिटुडवः से टु की इत्संज्ञा होती है और अन्त्य ओकार भी इत्संज्ञक है। इस तरह केवल मस्ज् शेष रहता है। टु की इत्संज्ञा का फल कृदन्त में टिवतोऽथुच् की प्रवृत्ति और ओकार की इत्संज्ञा का फल ओदितश्च की प्रवृत्ति है। उदात्तेत् होने से परस्मैपदी और जकारान्त अनुदात्त होने से अनिट् है। लिट् में क्रादिनियम से इट् और थल् में भारद्वाज के मत में विकल्प से इट् होता है।

मज्जति। मस्ज् से लट्, तिप्, श के बाद मस्ज्+अ+ति बना। सकार को स्तोः

श्चुना श्चुः से शकार होकर मश्ज बना। शकार को झलां जश् झशि से जश्त्व होकर जकार हो गया। मज्ज+अति, वर्णसम्मेलन होकर मज्जति सिद्ध हुआ। मज्जतः। मज्जन्ति।

मस्जेरन्त्यात्पूर्वो नुम्वाच्यः। यह वार्तिक है। मस्ज् धातु में अन्त्य से पूर्व को नुम् हो ऐसा कहना चाहिए। नुम् में उकार और मकार की इत्संज्ञा होती है। मस्जिनशोर्झलि से हुए नुम् के मित् होने के कारण मिदचोऽन्त्यात्परः के नियम से अत्य अच् मकारोत्तरवर्ती अकार के बाद होना चाहिए था किन्तु इस वार्तिक से अन्त्य वर्ण से पूर्व को विहित होने के कारण अन्त्य वर्ण जकार से पूर्व होगा।

ममङ्क्थ-ममज्जिथ। ममस्ज्+थ में भारद्वाज नियम से इट् होने के पक्ष में झल् परे न होने के कारण नुम् नहीं होता। अतः ममज्जिथ बन जाता है किन्तु इट् न होने के पक्ष में झल् परे मिलता है, अतः मस्जेरन्त्यात्पूर्वो नुम्वाच्यः की सहायता से मस्जिनशोर्झलि से अन्त्य वर्ण जकार से पहले नुम् आगम होकर ममस्ज्+थ बना। स्कोः संयोगाद्योरन्ते च से सन्ज् इस संयोग के आदि में विद्यमान सकार का लोप हो जाता है और जकार को चोः कुः से कुत्व होकर गकार होता है। इस तरह ममन्ग्+थ बना। गकार को खरि च से चर्त्व होकर ककार होकर ममन्क्+थ बना। नकार को अनुस्वार और परसवर्ण होकर ङकार हुआ। ममङ्क्+थ, ममङ्क्थ सिद्ध हुआ।

लिट् के रूप- ममज्ज, ममज्जतुः, ममज्जुः, ममङ्क्थ-ममज्जिथ, ममज्जथुः, ममज्ज, ममज्ज, ममज्जिव, ममज्जिम।

लृट् में- मस्ज्+ति, मस्ज्+तास्+ति, मस्ज्+तास्+डा, मस्ज्+ता बनने के बाद अन्त्य वर्ण से पहले नुम् का आगम, संयोगादि सकार का लोप, नुम् के नकार को अनुस्वार और परसवर्ण करके मङ्क्ता बनता है। आगे- मङ्क्तारौ, मङ्क्तारः, मङ्क्तासि आदि बनते जाते हैं।

लृट् में- मस्ज्+ति, मस्ज्+स्य+ति बनने के बाद अन्त्य वर्ण से पहले नुम् का आगम, संयोगादि सकार का लोप, नुम् के नकार को अनुस्वार और परसवर्ण करके मङ्क्+स्यति बनता है। ककार से परे सकार को षत्व और ककार और पकार के योग में क्षत्व जोकर मङ्क्ष्यति बन जाता है। आगे मङ्क्ष्यतः, मङ्क्ष्यन्ति आदि बनते हैं।

अन्य लकारों में- मज्जतु। अमज्जत्। मज्जेत्। मज्ज्यात्।

लुङ्- तिप्, अट्, च्लि, सिच्, ईट्, नुम् करके वदव्रजहलन्तस्याचः से हलन्तलक्षणा वृद्धि होकर अमास्नज्+स्+ईत् बना। संयोगादि सकार का लोप, कुत्व, षत्व, चर्त्व, क्षत्व, नकार को अनुस्वार और अनुस्वार को परसवर्ण करके अमाङ्क्षीत् बनता है। ताम् में झलो झलि से सकार का लोप करके शेष कार्य पूर्व तरह करने पर अमाङ्क्ताम् बनता है। अन्यत्र यथायोग्य प्रक्रिया करके रूप बनाइये।

लुङ् के रूप- अमाङ्क्षीत्, अमाङ्क्ताम्, अमाङ्क्षुः, अमाङ्क्षीः, अमाङ्क्तम्, अमाङ्क्त, अमाङ्क्षम्, अमाङ्क्ष्व, अमाङ्क्ष्म। लृङ्- अमङ्क्ष्यत्।

रुजो भङ्गे। रुजो धातु तोड़ना अर्थ में है। अनुनासिक ओकार इत्संज्ञक है। उदात्तेत् होने के कारण परस्मैपदी और जकारान्त अनुदात्तों में पठित होने से अनिट् है।

रूप- रुजति। रुरोज। रोक्ता। रोक्ष्यति। रुजतु। अरुजत्। रुजेत्। रुज्यात्। अरौक्षीत्। अरोक्ष्यत्।

भुजो कौटिल्ये। रुजिवत्। भुजो यह धातु टेढ़ा करना अर्थ में है। ओदित्, परस्मैपदी और अनिट् है। इसके रूप रुज् धातु की तरह ही होते हैं।

रूप- भुजति। बुभोज। भोक्ता। भोक्ष्यति। भुजतु। अभुजत्। भुजेत्। भुज्यात्। अभोक्षीत्। अभोक्ष्यत्।

विश प्रवेशने। विश धातु प्रवेश करना अर्थ में है। इसमें अकार इत्संज्ञक है। परस्मैपदी है और अनुदात्त धातुओं में परिगणित होने से अनिट् है। इस धातु से लुट् में व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से शकार के स्थान पर षकार आदेश होने पर ता के तकार ष्टुत्व होकर टकार होकर वेष्टा बनता है लुट् में षकार के स्थान पर षढोः कः सि से ककारादेश होने पर वेक्+ष्यति बनता है और क् और ष् के योग में क्ष हो जाता है, जिससे वेक्ष्यति यह रूप बन जाता है। लुङ् में शल इगुपधादनिटः क्सः से क्स आदेश होकर अविक्षत् बनता है।

रूप- विशति, विशतः, विशन्ति। विवेश, विविशतुः, विविशुः। वेष्टा, वेष्टारौ, वेष्टारः। वेक्ष्यति, वेक्ष्यतः, वेक्ष्यन्ति। विशतु-विशतात्, विशताम्, विशन्तु। अविशत्, अविशताम्, अविशन्। विशेत्, विशेताम्, विशेयुः। विश्यात्, विश्यास्ताम्, विश्यासुः। अविक्षत्, अविक्षताम्, अविक्षन्। अवेक्ष्यत्, अवेक्ष्यताम्, अवेक्ष्यन्।

मृश आमर्शने। आमर्शनं स्पर्शः। मृश धातु आमर्शन अर्थात् स्पर्श करना, छूना अर्थ में है। शकारोत्तरवर्ती अकार इत्संज्ञक है। अनिट् है।

लट्- मृशति, मृशतः, मृशन्ति।

लिट्- ममर्श, ममृशतुः, ममृशुः, ममर्शिथ ममृशथुः, ममृश, ममर्श, ममृशिव, ममृशिम।

लुट् में- यह धातु अनिट् है। मृश्+ता बनने के बाद अनुदात्तस्य चर्दुपध स्यान्यतरस्याम् से विकल्प से अम् का आगम होकर मृ+अश्+ता बना। मृ+अश् में इको यणचि से यण् होकर मृश्+ता बना। शकार को व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से षत्व और षकार के योग में ता के तकार को ष्टुत्व होकर मृष्टा बन जाता है। अम् न होने के पक्ष में गुण होकर मष्टा बनता है। इस तरह दो-दो रूप बनते हैं। मृष्टा, मृष्टारौ, मृष्टारः और मष्टा, मष्टारौ, मष्टारः आदि।

लृट् में भी वैकल्पिक अम् आगम, यण् तथा अम् के अभाव में गुण होकर शकार को षत्व, षकार को षढोः कः सि से कत्व, ककार से परे सकार को षत्व और ककार-षकार के संयोग से क्षत्व होकर दो-दो रूप बनते हैं। मृक्ष्यति, मृक्ष्यतः, मृक्ष्यन्ति और मक्ष्यति, मक्ष्यतः, मक्ष्यन्ति आदि।

आगे- मृशतु। अमृशत्। मृशेत्, मृश्यात् आदि।

अम्राक्षीत्, अमाक्षीत्, अमृक्षत्। लुङ् में अमृश्+त् बनने के बाद च्लि, उसके स्थान पर क्स प्राप्त, उसे बाधकर स्पृशमृशकृषतृपदूपां च्लेः सिन्वा वाच्यः से विकल्प से सिच् होने पर उसकी विद्यमानता में ईट् होकर अमृश्+स्+ईत् बना। अनुदात्तस्य चर्दुपध स्यान्यतरस्याम् से विकल्प से अम् का आगम होने पर अमृ+अश्+स्+ईत् बना। अमृ+अश् में यण् होकर अमृ+र्+अश् बना। वर्णसम्मेलन होकर अमृश्+स्+ईत् बना। वदव्रजहलन्तस्याचः से वृद्धि होकर अमृश्+स्+ईत् बना। श् को षत्व, सकार के परे होने पर षकार को षढोः कः सि से कत्व होने पर ककार से परे सकार को षत्व होकर अमृक्+ष्+ईत् बना।

क्षसंयोगे क्षः, अम्राक्ष्+ईत् बना। वर्णसम्मेलन होकर अम्राक्षीत् सिद्ध हुआ। अम् का आगम वैकल्पिक है। उसके न होने के पक्ष में वृद्धि होकर अम्राक्षीत् बना। सिच् भी वैकल्पिक है। उसके अभाव में शल इगुपधादनिटः क्सः से च्लि के स्थान पर क्स आदेश हुआ। क्स कित् है, अतः अम् आगम नहीं हुआ और लघूपधगुण भी नहीं हुआ। सिच् के अभाव में ईट् भी नहीं होता। इस तरह अमृश्+सत् में षत्व, कत्व, षत्व और क्षत्व होकर वर्णसम्मेलन होकर अमृक्षत् सिद्ध हुआ। इस तरह तीन रूप सिद्ध हुए।

लुङ् के रूप- अमागम के पक्ष में- अम्राक्षीत्, अम्राष्टाम्, अम्राक्षुः, अम्राक्षीः, अम्राष्टम्, अम्राष्ट, अम्राक्षम्, अम्राक्ष्व, अम्राक्ष्म। अम् के अभाव में- अम्राक्षीत्, अम्राष्टम्, अम्राक्षुः, अम्राक्षीः, अम्राष्टम्, अम्राष्ट, अम्राक्षम्, अम्राक्ष्व, अम्राक्ष्म। क्स के पक्ष में- अमृक्षत्, अमृक्षाताम्, अमृक्षन्, अमृक्षः, अमृक्षतम्, अमृक्षत, अमृक्षम्, अमृक्षाव, अमृक्षाम।

लृङ्- अम्रक्ष्यत्, अमक्ष्यत्।

षद्लृ विशरणगत्यवसादनेषु। षद्लृ धातु विशीर्ण होना( फटना ), गति और दुखी होना अर्थ में है। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश होता है। लृकार की इत्संज्ञा होती है, सद् शेष रहता है। उदात्त होने से परस्मैपदी और अनुदात्तों में परिगणित होने से अनिट् है। लृकार की इत्संज्ञा होने से लृदित् हुआ। इसका फल लुङ् में च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होना है। अनिट् होने पर भी लिट् में क्रादिनियम से नित्य से इट् और थल् में भारद्वाजनियम से विकल्प से इट् होता है। इत्संज्ञक शकारादि प्रत्ययों के परे अर्थात् श के परे होने पर पाद्याध्मास्थाम्ना-दाण्दृश्यतिसितिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यच्छधौशीयसीदाः से सद् के स्थान पर सीद् आदेश होता है। इस तरह लट् में सीदति, सीदतः आदि रूप बनते हैं।

लिट् में- इत्संज्ञक शकारादि प्रत्यय के अभाव में सीद् आदेश नहीं होता। अतः सद् को ही द्वित्व होकर ससद्+अ बनने के बाद उपधावृद्धि होकर ससाद बन जाता है। अतुस आदि में अत एकहल्मध्येऽनादेशादेर्लिटि से एत्व और अभ्यास लोप होकर सेदतुः सेदुः आदि रूप बनते हैं। थल् में इट् के पक्ष में थलि च सेटि से एत्वाभ्यास लोप होकर सेदिथः बनता है। इट् न होने के पक्ष में दकार को चर्त्व होकर ससत्थ बनता है। इस तरह लिट् के रूप होते हैं- ससाद, सेदतुः, सेदुः, सेदिथ-ससत्थ, सेदथुः, सेद, ससाद-ससद, सेदिव, सेदिम।

आगे- सत्ता। सत्स्यति। सीदतु। असीदत्। सीदेत्। सद्यात्।

लुङ्- लृदित् होने के कारण पुषादिद्युताद्यलृदितः परस्मैपदेषु से च्लि के स्थान पर अङ् होकर असदत्, असदताम् आदि रूप बनते हैं।

शद्लृ शातने। शद्लृ धातु बरबाद होना, मुरझाना आदि अर्थ में है। उदात्त लृ की इत्संज्ञा होती है। शद् शेष रहता है। पाद्याध्मास्थाम्नादाण्दृश्यतिसितिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यच्छधौशीयसीदाः से शित् के परे रहने पर शद् के स्थान पर शीय आदेश होता है। यह परस्मैपदी और अनिट् है। लिट् में क्रादिनियम से नित्य से इट् और थल् में भारद्वाजनियम से विकल्प से इट् होता है। जहाँ पर श होने वाला होता है, वहाँ पर शदेः शितः यह अग्रिम सूत्र आत्मनेपद का विधान करता है।