Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
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VṛttiGovind
LSK 658
इयो विकल्पाय विधिसूत्रम्
तीषसहलुभरुषरिषः
Aṣṭādhyāyī 7.2.48
Vṛtti Varadarājācārya

इच्छत्यादेः परस्य तादेरार्धधातुकस्येड्वा स्यात्। लोभिता, लोब्धा।

लोभिष्यति। तृप, तृम्फ तृप्तौ॥२०-२१॥ तृपति। ततर्प तर्पिता।

अतर्पीत्। तृम्फति।

वार्तिकम्- शो तृम्फादीनां नुम् वाच्यः।

आदिशब्दः प्रकारे, तेन येऽत्र नकारानुषक्तास्ते तृम्फादयः।

ततृम्फ। तृप्यात्॥ मृड, पृड, सुखने॥२२-२३॥ मृडति। पृडति।

शुन गतौ॥ २४॥ शुनति॥ इषु इच्छायाम्॥ २५॥ इच्छति। एषिता,

एष्टा। एषिष्यति। इष्यात्। ऐषीत्॥ कुट कौटिल्ये॥ २६॥

गाड-कुटादीति डित्वम्॥ चुकुटिथ। चुकोट, चुकुट। कुटिता॥

पुट संश्लेषणे॥२७॥ पुटति। पुटिता।

स्फुट विकसने॥२६॥ स्फुटति। स्फुटिता।

स्फुर, स्फुल संचलने॥ २९-३०॥ स्फुरति। स्फुलति॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६५८- तीषसहलुभरुषरिषः। इषश्च सहश्च लुभश्च रुषश्च रिट् च तेषां समाहारद्वन्द्वः इषहसलुभरुषरिट्, तस्मात् इषसहलुभरुषरिषः। ति सप्तम्यन्तम्, इषसहलुभरुषरिषः पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुकस्येड् वलादेः से आर्धधातुकस्य इट् और स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा से वा की अनुवृत्ति आती है।

इष, सह, लुभ, रुष् और रिष् धातुओं से परे तकारादि आर्धधातुक को विकल्प से इट् आगम होता है।

नित्य से प्राप्त इट् का यह सूत्र बाधक है।

लोभिता, लोब्धा। तास्-प्रत्यय तकारादि आर्धधातुक है। अत तीषसहलुभरुषरिषः से विकल्प से इट् हुआ। इट् होने के पक्ष में लोभिता और इट् न होने के पक्ष में लोभ्+ता इस स्थिति में झषस्तथोर्धोऽधः से तकार को धकार और भकार को झलां जश् झशि से जश्त्व बकार होकर लोब्धा बन जाता है। रूप- लोभिता, लोभितारौ, लोभितारः। इसी तरह लोब्धा, लोब्धारौ, लोब्धारः। आगे- लोभिष्यति। लुभतु। अलुभत्। लुभेत्। लुभ्यात्। अलोभीत्। अलोभिष्यत्।

तृप, तृम्फ तृप्तौ। तृप और तृम्फ धातु तृप्त करना अर्थ में है। दोनों परस्मैपदी और सेट् हैं। दिवादिगणीय तृप् क तृप्यति आदि रूप होते हैं। उससे यह भिन्न है।

तृप् के रूप- तृपति। ततर्प। तर्पिता। तर्पिष्यति। तृपतु। अतृपत्। तृपेत्। तृप्यात्। अतर्पीत्। अतर्पिष्यत्।

शे तृम्फादीनां नुम् वाच्यः। यह वार्तिक है। श के परे होने पर तृम्फ आदि धातुओं को नुम् हो ऐसा कहना चाहिए। यहाँ पर तृम्फादि का आदिशब्द प्रकार वाचक है अर्थात् तृम्फ आदि अर्थ न होकर तृम्फ जैसे धातुएँ गृहीत हैं। जिस तरह तृम्फ नकारोपध (मकारोपध) है, उसी तरह तुदादि प्रकरण में नकार उपधा वाली(मकारोपध) धातुएँ तृम्फादि कहलाती हैं। इसी लिए शुम्भ, उम्भ आदि धातुओं में इस वार्तिक स नुम् हो जाता है। एक शंका यह हो सकती है कि तृम्फ में तो स्वतः मकार है, इसमें नुम् की क्या आवश्यकता है? इसका उत्तर यह है कि तुदादिभ्यः शः से श होने के बाद उसके अकार को अपित् सार्वधातुक मानकर अनिदितां हल उपधायाः विङति से नकार का लोप होने पर तृफ् ही बच जाता है। अतः नुम् की आवश्यकता होती है। नुम् होने के बाद नकार को अनुस्वार और अनुस्वार को परसवर्ण मकार होकर पुनः तृम्फ ही बन जाता है। जहाँ श नहीं होता, वहाँ ङित् न होने के कारण नकार का लोप भी नहीं होता और नुम् भी नहीं होता। उपधा में लघु वर्ण न होने के कारण लिट् में गुण नहीं होता है।

रूप- तृम्फति। ततृम्फ। तृम्फिता। तृम्फिष्यति। तृम्फतु। अतृम्फत्। तृम्फेत्। तृप्यात्। अतृम्फीत्। अतृम्फिष्यत्।

मृड पृड सुखने। मृड और पृड धातु सुख देना अर्थ में है। अन्त्य अकार की इत्संज्ञा होती है। ये दोनों परस्मैपदी और सेट् हैं।

मृड् के रूप- मृडति, ममर्ड। मर्डिता। मर्डिष्यति। मृडतु। अमृडत्। मृडेत्। मृड्यात्। अमर्डीत्। अमर्डिष्यत्।

पृड् के रूप- पृडति, पपर्ड। पर्डिता। पर्डिष्यति। पृडतु। अपृडत्। पृडेत्। पृड्यात्। अपर्डीत्। अपर्डिष्यत्।

शुन गतौ। शुन धातु जाना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होती है और शुन् शेष रहता है। यह परस्मैपदी और सेट् है। रूप- शुनति। शुशोन। शोनिता। शोनिष्यति। शुनतु। अशुनत्। शुनेत्। शुन्यात्। अशोनीत्। अशोनिष्यत्।

इषु इच्छायाम्। इष् धातु इच्छा अर्थ में है। उकार इत्संज्ञक है। शित् के परे होने पर इषुगमियमां छः से षकार के स्थान पर छकार आदेश और छकार के परे रहते इकार को छे च से तुक् का आगम होकर तकार को श्चुत्व होकर इच्छ् हो जाता है। तकारादि आर्धधातुक के परे होने पर तीषसहलुभरुषरिषः से वेट् होता है। लिट् में सवर्ण अच् के परे होने पर अभ्यासस्यासवर्ण से इयङ् आदेश होकर इयेष आदि रूप बनते हैं।

लट्- इच्छति, इच्छतः, इच्छन्ति।

लिट् में इष् लिट्, तिष्, णल्, अ, द्वित्व, हलादिशेष करके इ+इष्+अ बना।

लघूपधगुण करके इ+एष्+अ, अभ्यासस्यासवर्णे से इयङ्, वर्णसम्मेलन करके इयेष बना।

आगे- ईषतुः, ईषुः, इयेषिथ, ईषथुः, ईष। इयेष, ईषिव, ईषिम।

एषिता-एष्टा। एषिष्यति। इच्छतु। ऐच्छत्। इच्छेत्। इष्यात्। ऐषीत्। ऐषिष्यत्।

कुट कौटिल्ये। कुट धातु टेंढ़ा होना, टेंढ़ा करना, धोखा देना आदि अर्थों में है। अन्त्य अकार इत्संज्ञक है। गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्दित् से णित् भिन्न जगहों पर डिद्वत् हो जाने के कारण गुण का निषेध होगा। श के परे होने पर तो वैसे भी गुणनिषेध है। यहाँ पर कुटादि का फल श न होने पर ही होता है।

रूप- कुटति। चुकोट, चुकुटतुः, चुकुटुः, चुकुटिथ, चुकुटथुः, चुकुट, चुकोट-चुकुट, चुकुटिव, चुकुटिम। कुटिता। कुटिष्यति। कुटतु। अकुटत्। कुटेत्। कुट्यात्। अकुटीत्। अकुटिष्यत्।

पुट संश्लेषणे। पुट धातु मिलाना या आलिंगन करना अर्थ में है। अकार इत्संज्ञक है। यह भी परस्मैपदी, सेट् तथा कुटाटिगण के अन्तर्गत आता है। अतः डिद्वत् हो जाने के कारण गुण आदि नहीं होंगे। रूप- पुटति। पुषोट। पुटिता। पुटिष्यति। पुटतु। अपुटत्। पुटेत्। पुट्यात्। अपुटीत्। अपुटिष्यत्।

स्फुट विकसने। स्फुट धातु खिलना, विकसित होना अर्थ में है। यह भी अकारेत्संज्ञक, परस्मैपदी, सेट् और कुटादि है। अतः इसके रूप भी कुटधातु की तरह ही होते हैं। स्फुटति। पुस्फोट। स्फुटिता। स्फुटिष्यति। स्फुटतु। अस्फुटत्। स्फुटेत्। स्फुट्यात्। अस्फुटीत्। अस्फुटिष्यत्।

स्फुर, स्फुल सञ्चलने। स्फुर और स्फुल ये दो धातुएँ संचलन अर्थात् हिलना, स्पन्दित होना, नेत्र आदि अंगों का फड़कना, चेष्टा करना, प्रकाशित होना, भासित

होना, कांपना आदि अर्थों में है। ये दोनों पूर्ववत् अकारेत्संज्ञक, परस्मैपदी, सेट् और कुटादि हैं। अतः इनके रूप कुट् की तरह होते हैं।

स्फुर् के रूप- स्फुरति। शर्पूर्वाः खयः। पुस्फोर। स्फुरिता। स्फुरिष्यति। स्फुरतु। अस्फुरत्। स्फुरेत्। हलि च से दीर्घ होकर- स्फूर्यात्। अस्फुरीत्। अस्फुरिष्यत्।

स्फुल् के रूप- स्फुलति। पुस्फोल। स्फुलिता। स्फुलिष्यति। स्फुलतु। अस्फुलत्। स्फुलेत्। रेफान्त न होने से हलि च से दीर्घ भी नहीं होगा- स्फुल्यात्। अस्फुलीत्। अस्फुलिष्यत्।