शिद्भाविनोऽस्मात्तङ्गनौ स्तः। शीयते। शीयताम्। अशीयत। शीयेत।
शशाद। शत्ता। शत्स्यति। अशदत्। अशस्यत्।। कृ विक्षेपे॥३९॥
६६०- शदेः शितः। श इत् यस्य स शित्, तस्य शितः। शदेः पञ्चम्यन्तं, शितः षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अनुदात्तङ्गित आत्मनेपदम् से आत्मनेपदम् की अनुवृत्ति आती है।
शिद्भावी अर्थात् यदि शित् प्रत्यय होने वाला हो तो शद् धातु से आत्मनेपद (तङ् और आन) होता है।
तुदादिगण में शप् के स्थान पर श होता है। जहाँ धातु से शित् प्रत्यय हो सकता है, ऐसे लकार हैं- लट्, लोट्, लङ् और विधिलिङ्। इनमें आत्मनेपद का विधान होगा और शेष लकारों में परस्मैपद ही रहेगा।
शीयते। शद् धातु से लट्, श की विवक्षा में शदेः शितः से आत्मनेपद तङ् के विधान से त आया, शद्+त बना। श होकर पाद्याध्मास्थाम्नादाण्डूश्यतिर्सर्तिशदसदां पिबजिघ्रधमतिष्ठमनयच्छपश्यच्छंधौशीयसीदाः से शीय आदेश होकर शीय+अत बना। पररूप और एत्व होकर शीयते सिद्ध हुआ।
लट्- शीयते, शीयेते, शीयन्ते, शीयसे, शीयेथे, शीयध्वे, शीये, शीयावहे, शीयामहे।
लिट्- शशाद, शेदतुः, शेदुः, शेदिथ-शशत्थ, शेदथुः, शेद आदि।
लुट्- शत्ता, शत्तारौ, शत्तारः। लृट्- शत्स्यति, शत्स्यतः, शत्स्यन्ति। लोट्- शीयताम्, शीयेताम्, शीयन्ताम्। लङ्- अशीयत, अशीयेताम्, अशीयन्त। विधिलिङ्- शीयेत, शीयेयाताम्, शीयेरन्। आशीर्लिङ्- शद्यात्, शद्यास्ताम्, शद्यासुः। लुङ्- अशदत्, अशदताम्, अशदन्। लृङ्- अशत्स्यत्, अशत्स्यताम्, अशत्स्यन्।
कृ विक्षेपे। कृ धातु विक्षेप अर्थात् बिखेरना, फेंकना आदि अर्थों में है। दीर्घ ऋकारान्त है। परस्मैपदी और ऋकारान्त होने से सेट् भी है।