Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
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VṛttiGovind
LSK 657
वैकल्पिकाङ्गदेशविधायकं विधिसूत्रम्
आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 3.1.54
Vṛtti Varadarājācārya

लिपिसिचिह्नः परस्य च्लेरङ् वा। असिचत, असिक्त।

लिप उपदेहे॥१०॥ उपदेहो वृद्धिः। लिम्पति, लिम्पते। लेप्ता। अलिपत्।

अलिपत, अलिप्त।

इत्युभयपदिनः।

.....

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६५७- आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम्। आत्मनेपदेषु सप्तम्यन्तम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। च्लेः सिच् से च्लेः, अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ् से अङ् की लिपिसिचिह्नश्च से लिपिसिचिह्नः और णिश्रिद्रुमुभ्यः कर्तरि चङ् से कर्तरि की अनुवृत्ति आती है।

लिप्, सिच् और ह्वे धातुओं से परे च्लि के स्थान पर विकल्प से अङ् आदेश होता है आत्मनेपद के परे होने पर।

असिचत, असिक्त। आत्मनेपद के लुङ् में च्लि के स्थान पर आत्मनेपदेष्वन्यतरस्याम् से अङ् होने के पक्ष में असिचत बनता है। अङ् न होने के पक्ष में झलो झलि से सकार का लोप करके चकार को चोः कुः से कुत्व होकर असिक्त बनता है। जहाँ झल् परे नहीं मिलता वहाँ सकार का लोप भी नहीं होता और कुत्व भी नहीं होता।

कृती छेदने॥११॥ कृत्तति। चकर्त। कर्तिता। कर्तिष्यति, कर्त्स्यति। अकर्तीत्॥

खिद परिघाते॥१२॥ खिन्दति। चिखेद। खेत्ता॥

पिश अवयवे॥ १३॥ पिंशति। पेशिता॥

ओव्रश्चू छेदने॥१४॥ वृश्चति। वव्रश्च। वव्रश्चिथ, वव्रष्ठ। व्रश्चिता,

व्रष्टा। व्रश्चिष्यति, व्रक्ष्यति। वृश्च्यात्। अव्रश्चीत्। अव्राक्षीत्॥

व्यच व्याजीकरणे॥१५॥ विचति। विव्याच। विविचतुः व्यचिता। व्यचिष्यति।

विच्यात्। अव्याचीत्, अव्यचीत्।

व्यचेःकुटादित्वमनसीति तु नेह प्रवर्तते, अनसीति पर्युदासेन कृन्मात्रविषयत्वात्॥

उछि उञ्छे॥१६॥ उञ्छति।

‘उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्’। इति यादवः॥

ऋच्छ गतीन्द्रियप्रलयमूर्तिभावेषु॥१७॥

ऋच्छति। ऋच्छत्यृतामिति गुणः। द्विहल्ग्रहणस्यानेकहलुपलक्षणत्वान्नुट्।

आनच्छ। आनच्छतुः। ऋच्छता॥ उञ्झ उत्सर्गे॥१८॥ उञ्झति॥

लुभ विमोहन॥१९॥ लुभति।

.....

लुङ् के आत्मनेपद में रूप, अङ् होने पर- असिचत, असिचेताम्, असिचन्त।

अङ् न होने पर- असिक्त, असिक्षाताम्, असिक्षत। लृङ्- असेक्ष्यत्, असेक्ष्यत।

लिप उपदेहे। लिप् धातु उपदेह अर्थात् लेप आदि से बढ़ाना, लीपना आदि

अर्थों में है। पकारोत्तरवर्ती अकार की इत्संज्ञा होती है। स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी है।

अनिट् है किन्तु क्रादिनियम से लिट् में इट् हो जाता है। मुचादि होने के कारण नुम् आगम

होता है। इसकी सम्पूर्ण प्रक्रिया सिच् की तरह ही होती है।

लट्- लिम्पति, लिम्पते। लिट्- लिलेप, लिलिपे। लुट्- लेप्ता, लेप्तासि, लेप्तासे। लृट्-

लेप्स्यति, लेप्स्यते। लोट्- लिम्पतु-लिम्पतात्, लिम्पताम्। लङ्- अलिम्पत्, अलिम्पत। विधिलिङ्-

लिम्पेत्, लिम्पेत। आशीर्लिङ्- लिप्यात्, लिप्सीष्ट। लुङ्- अलिपत्, अलिपत-अलिप्त।

यहाँ तक तुदादि के उभयपदी धातुओं का विवेचन पूर्ण हो गया। इसके पहले के

प्रकरण में पहले परस्मैपदी धातुओं का विवेचन होता था, उसके बाद आत्मनेपदी और उसके

बाद उभयपदी धातुओं का, किन्तु तुदादिगण का प्रथम धातु तुद् है और वह स्वरितेत् होने

के कारण उभयपदी है। अतः पहले उभयपदियों का विवेचन प्रारम्भ किया। अब परस्मैपदी

धातुओं का विवेचन प्रारम्भ करते हैं।

कृती छेदने। कृती धातु काटना, छेदन करना अर्थ में है। अन्त्य ईकार उदात्त

और अनुनासिक है। ईकार की इत्संज्ञा के बाद केवल कृत् शेष रहता है। ईदित् होने का फल

कृदन्त में श्वीदितो निष्ठायाम् से इट् का निषेध आदि है। मुचादि होने के कारण इससे भी

नुम् आगम होता है। अनुदात्तों में परिगणित न होने से सेट् है। इस धातु में सिच्भिन्न सकारादि

आर्धधातुक स्य के परे होने पर सेऽसिचिकृतचृतच्छृततृदनृतः( ६३१ ) से इट् विकल्प से

किया जाता है।

रूप- कृत्तति। चकर्त, चकृततुः, चकृतुः। कर्तिता। कर्तिष्यति, कर्त्स्यति। कृत्ततु।

अकृत्तत्। कृत्तेत्। कृत्यात्। अकर्तीत्, अकर्तिष्टाम्, अकर्तिषुः। अकर्तिष्यत्-अकर्त्स्यत्।

..... खिद परिघाते। खिद धातु प्रहार करना, सताना, दुःख देना अर्थ में है। अन्त्य अकार उदात्त और अनुनासिक है। अकार की इत्संज्ञा के बाद केवल खिद शेष रहता है। मुचादि होने के कारण इससे भी नुम् आगम होता है। अनुदात्तों में परिगणित होने से अनिद् है।

रूप- खिन्दति। चिखेद, चिखिदतुः, चिखिदुः। खेता। खेत्स्यति। खिन्दतु। अखिन्दतु। खिन्देतु। खिद्यातु। अखेत्सीतु। अखेत्स्यतु।

पिश अवयवे। पिश धातु अवयव करना, पीसना अर्थ में है किन्तु ऐसे अर्थ का प्रयोग नहीं मिलता। कहीं कहीं विभाग करना, देना, प्रकाशित करना आदि अर्थों में यह धातु प्रयुक्त हुआ है। अन्त्य अकार उदात्त और अनुनासिक है। अकार की इत्संज्ञा के बाद केवल पिश शेष रहता है। मुचादि होने के कारण इससे भी नुम् का आगम होता है। अन्त्य अच् पि के इकार के बाद नुम् का नकार बैठता है और उसका अनुस्वार होकर पिश बन जाता है। अनुदात्तों में परिगणित न होने से सेद् है।

रूप- पिंशति। पिपेश। पेशिता। पेशिष्यति। पिंशतु। अपिंशतु। पिंशेतु। पिश्यातु। अपेशीतु। अपेशिष्यतु।

यहाँ तक ही मुचादि माने गये हैं। अतः अब आगे नुम् नहीं होगा।

ओव्रश्चू छेदने। ओव्रश्चू धातु छेदन करना, काटना अर्थ में है। आदि ओकार और अन्त्य ऊकार की इत्संज्ञा होती है, केवल व्रश्चू शेष रहता है। ऊदित् होने के कारण स्वरतिसूतिसूयतिधूजूदितो वा से आर्धधातुक को विकल्प से इद् का आगम होता है।

वृश्चति। व्रश्चू से लट्, तिप्, श करके सार्वधातुकमपित् से श के अकार को डित् हो जाने से ग्रहिन्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां डिति च से व्र में विद्यमान रेफ के स्थान पर सम्प्रसारण होकर ऋकार हो जाता है। वृश्च्+अति=वृश्चति।

वव्रश्च। लिट्, तिप्, णल् होने के बाद व्रश्चू को द्वित्व करके लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् से अभ्यास को सम्प्रसारण करके वृश्च व्रश्च, हलादि शेष, उरत् से अर् करके पुनः हलादिशेष करके वव्रश्च्+अ बना। वर्णसम्मेलन, वव्रश्च। थल्, वस् मस् में इद् विकल्प से होता है।

रूपः- वव्रश्च, वव्रश्चतुः, वव्रश्चुः, वव्रश्चिथ-वव्रष्ठ, वव्रश्चथुः, वव्रश्च, वव्रश्च, वव्रश्चिव-वव्रश्च्व, वव्रश्चिम-वव्रश्च्म। लुट्-इद्पक्षे- व्रश्चिता, इद् के अभाव में- व्रष्टा। लृट्- व्रश्चिष्यति, व्रक्ष्यति। लोट्- वृश्चतु। लड्- अवृश्चतु। विधिलिड्- वृश्चेतु। आशीर्लिड्- वृश्च्यातु। लुड्- इद् होने के पक्ष में नेटि से वृद्धि का निषेध होकर अव्रश्चीत्, अव्रश्चिष्टाम्, अव्रश्चिषुः आदि रूप बनते हैं और इद् न होने के पक्ष में वृद्धि होकर अव्राक्षीत्, अव्राष्टाम्, अव्राक्षुः आदि रूप बनते हैं। लृड्- अव्रश्चिष्यत्, अव्रक्ष्यत्।

व्यच व्याजीकरणे। व्यच धातु छलना, ठगना, धोखा देना अर्थ में है। अन्त्य अकार की इत्संज्ञा होती है। यह परस्मैपदी और सेद् है। सम्प्रसारणी अर्थात् इस धातु को कित् डित् के परे होने पर सम्प्रसारण होता है। श के परे रहते ग्रहिन्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चति-पृच्छतिभृज्जतीनां डिति च से तथा लिट् में लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् से सम्प्रसारण होता है। सम्प्रसारण में व्यच् के यकार को इकार हो जाता है।

विचति। विव्याच। व्यचिता। व्यचिष्यति। विचतु। अविचत्। विचेत्। विच्यात्। लुड् में अतो हलादेर्लघोः से वैकल्पिक वृद्धि होकर अव्याचीत् और अव्यचीत् ये दो रूप बनते हैं। अव्यचिष्यत्।

व्यचेः कुटादित्वमनसि। यह महाभाष्य का वार्तिक है। अस् से भिन्न अन्य प्रत्ययों के परे व्यच् को कुटादिगणीय मानना चाहिए। स्मरण रहे कि कुटादि को गाङ्कुटादिभ्योऽञ्णिन्दित् से डिद्वत् किया जाता है। अस् प्रत्यय कृत्प्रकरण में होता है। अनसि यहाँ पर पर्युदास है। पर्युदास का तात्पर्य है निषेध। पर्युदास के रूप में जो निषेध होता है वह तदभिन्न तत्सदृश का ग्रहण करता है। अस् से भिन्न किन्तु अस् के सदृश के परे रहने पर। अस् जिस तरह कृत् है उसी तरह अस्-भिन्न अन्य कृत् के परे तो हो सकता है किन्तु अस् परे नहीं। कहने का तात्पर्य यह है कि वह अनस् कृत् होना चाहिए। यहाँ तिङन्तप्रकरण में कृत् परे होने का प्रसंग नहीं है। अतः व्यच् धातु को सर्वत्र कुटादिगणीय नहीं माना जा सकता। फलतः इससे परे सिच् आदि भी डित् नहीं होते।

उछि उञ्छे। उछि धातु अनाज के एक-एक दाने को चुनना अर्थ में है। अन्त्य इकार की इत्संज्ञा होती है। इदित् होने के कारण इदितो नुम् धातोः से नुम् होता है। नकार को अनुस्वार और परसवर्ण होकर जकार बनाया जाता है। यह धातु सेट् है। लिट् में गुरुमान् और इजादि दोनों होने के कारण आम् हो जाता है जिससे आम से परे का लुक् और कृ, भू, अस् का अनुप्रयोग करके गोपायाञ्चकार की तरह रूप बनते हैं।

खेत में फसल के कट जाने के बाद किसान जब अपना अनाज उठा लेता था तब मुनिजन उस खेत में जाकर इधर-उधर बिखरे अनाज के दाने या बालियों को बटोर कर उससे अपना जीवन-निर्वाह करते थे। इसीको मुनिवृत्ति कहते हैं। जैसा कि मूलकार ने वैजयन्तीकोषकार यादव को उद्धृत करते हुए लिखा है- उञ्छः कणश आदानं कणिशाद्यर्जनं शिलम्। अर्थात् अनाज के दानों को बीनना उञ्छ है और अनाज के बालियों का बीनना शिल है।

उञ्छति। उञ्छाञ्चकार, उञ्छाम्बभूव, उञ्छामास। उञ्छिता। उञ्छिष्यति। उञ्छतु। औञ्छत्। उञ्छेत्। उञ्छ्यात्। औञ्छीत्। औञ्छिष्यत्।

ऋच्छ गतीन्द्रियप्रलयमूर्तिभावेषु। ऋच्छ धातु गति, इन्द्रियों का बल नष्ट होना, कठिन या दृढ़ होना अर्थों में है। अन्त्य अकार की इत्संज्ञा होकर ऋच्छ शेष रहता है। यह परस्मैपदी और सेट् है। इसका वास्तविक मूल रूप तो ऋछ है किन्तु छे च से तुक् का आगम और छकार के योग में तकार को श्चुत्व होकर ऋच्छ बन जाता है।

लट् में ऋच्छति बनता है।

लिट् में चकार और छकार के संयोग से गुरुमान् होते हुए भी इजादेश्च गुरुमतोऽनृच्छः से आम् नहीं होता क्योंकि अनृच्छः यह पढ़कर ऋच्छ धातु में निषेध किया गया है। द्वित्व, अर्, हलादिशेष होकर अ+ऋच्छ्+अ बनने के बाद अत आदेः से अभ्यास के अकार को दीर्घ करके अनभ्यास ऋकार को ऋच्छत्यृताम् से गुण होकर आ+अर्+च्छ्+अ बना। अब तस्मान्नुड्द्विहलः से नुट् का आगम करके आ+न्+अर्+च्छ्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर आनच्छी। अब यहाँ प्रश्न यह उठता है कि तस्मान्नुड्द्विहलः में द्विहल् धातु को नुट् आगम करने का विधान है और यहाँ पर र्च्छ् ये तीन हलों के संयोग में यह सूत्र कैसे लगेगा? इसका उत्तर मूलकार इस तरह देते हैं- द्विहल्ग्रहणस्यानेकहलुपलक्षणान्नुट्। अर्थात् यह द्विहल् अनेक हलों का भी उपलक्षण है। उपलक्षण की परिभाषा है कि स्वप्रतिपादकत्वे सति स्वेतरप्रतिपादकत्वमुपलक्षणत्वम्। अर्थात् जिसके द्वारा अपना ग्रहण कर के अपने से अन्यों का ग्रहण हो जाय उसे उपलक्षण कहते हैं। एक उदाहरण प्रसिद्ध

है- जैसे काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम् अर्थात् कौओं से दही को बचाओ। इसका तात्पर्य यह है कि न केवल कौओं से अपितु दही के विनाशक कुत्ते, बिल्ली आदि से भी बचाना है। इसी तरह यहाँ उक्त सूत्र पर द्विहल् शब्द अनेक हल् का भी उपलक्षण है। अतः यहाँ पर नुट् होने में कोई आपत्ति नहीं है।

रूप- ऋच्छति। आनर्च्छ, आनर्च्छतुः, आनर्च्छुः आदि। ऋच्छिता। ऋच्छिष्यति।

ऋच्छतु। आर्च्छतु। ऋच्छेतु। ऋच्छ्यात्। आर्च्छीत्। आर्च्छिष्यत्।

उज्झ उत्सर्गे। उज्झ धातु उत्सर्ग अर्थात् छोड़ना अर्थ में है। यह परस्मैपदी और सेट् है। उज्झति। उज्झाञ्चकार, उज्झाम्बभूव, उज्झामास। उज्झिता। उज्झिष्यति। उज्झतु। औज्झत्। उज्झेत्। उज्झ्यात्। औज्झीत्। औज्झिष्यत्।

लुभ विमोहने। लुभ धातु लुभाना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होती है, लुभ् शेष रहता है। वलादि आर्धधातुक को नित्य से इट् और तकारादि आर्धधातुक तासि के तकार के परे रहते अग्रिम सूत्र तीषसहलुभरुषरिषः से वेट् हो जाता है। लट् में लुभति और लिट् में लुलोभ, लुलुभतुः।