Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
Show
VṛttiGovind
LSK 654
वैकल्पिकामागमविधायकं विधिसूत्रम्
अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 6.1.59
Vṛtti Varadarājācārya

उपदेशेऽनुदात्तो य ऋदुपधस्याम् वा स्याञ्झलादावकिति।

क्रष्टा, कर्ष्टा। कृक्षीष्ट।

वार्तिकम्- स्पृशमृशकृषतृपदूपां च्लेः सिन्वा वाच्यः।

अक्राक्षीत्, अकाक्षीत्, अकृक्षत्। अकृष्टा। अकृक्षाताम्। अकृक्षत।

क्सपक्षे- अकृक्षत।

अकृक्षाताम्। अकृक्षन्त। मिल सङ्गमे॥५॥

मिलति,

मिलते। मिमेल।

मेलिता। अमेलित्। मोच्ल् मोचने॥६॥

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६५४- अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम्। ऋत् उपधायां यस्य स ऋदुपधः, तस्य ऋदुपधस्य। अनुदात्तस्य षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदम्, ऋदुपधस्य षष्ठ्यन्तम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्। आदेच उपदेशेऽशिति से उपदेशे और सृजिदृशोर्झल्यमकिति से झलि, अम्, अकिति की अनृवृत्ति आती है।

उपदेश अवस्था में अनुदात्त जो ऋदुपध धातु, उसको विकल्प से अम् का आगम होता है किंतु से भिन्न झलादि प्रत्यय के परे होने पर।

मकार की इत्संज्ञा होती है, मित् होने के कारण अकार मिद्योऽन्त्यात्परः से अन्त्य अच् के बाद बैठता है।

क्रष्टा। कृष् से लुट् में कृष्+ता बना है। उपदेश अवस्था में अनुदात्त और ऋकार उपधा वाला धातु होने के कारण अकित् झलादि ता के परे होने पर अनुदात्तस्य चर्दुपधस्यान्यतरस्याम् से अम् आगम हुआ। मकार की इत्संज्ञा हुई। कृ का ऋकार अन्त्य अच् है, उसके बाद अ बैठा, कृ+अष्+ता बना। कृ+अ में यण् होकर कृ+र्+अ=क्र, क्रष्+ता में षकार के योग से तकार को ष्टुत्व होकर क्रष्टा सिद्ध हुआ। क्रष्टा, क्रष्टारौ, क्रष्टारः, क्रष्टासि-क्रष्टासे। अम् आगम न होने के पक्ष में कृष् के ऋकार को उपधा गुण होकर कर्ष्टा आदि रूप सिद्ध होते हैं। कर्ष्टा, कर्ष्टारौ, कर्ष्टारः, कर्ष्टासि-कर्ष्टासे।

लृट्- अम्पक्षे- क्रक्ष्यति, क्रक्ष्यतः, क्रक्ष्यन्ति। क्रक्ष्यते, क्रक्ष्येते, क्रक्ष्यन्ते। अम् के अभाव में- कक्ष्यति, कक्ष्यतः, कक्ष्यन्ति। कक्ष्यते, कक्ष्येते, कक्ष्यन्ते। लृट्- कृष्तु-कृष्तात्, कृष्ताम्, कृष्तु। कृष्ताम्, कृष्ताम्, कृष्ताम्। लङ्- अकृष्त्, अकृष्त। विधिलिङ्- कृष्त्, कृष्त। आत्मनेपद- कृष्यात्, कृक्षीष्ट।

स्पृशमृशकृषतृपदूपां च्लेः सिन्वा वाच्यः। यह वार्तिक है। स्पृश, मृश, कृष्, तृप्, दृप् धातुओं से परे च्लि के स्थान पर विकल्प से सिच् होता है।

स्पृश, मृश और कृष् से परे च्लि के स्थान पर शल इगुपधादनिटः क्सः से क्स आदेश और तृप् एवं दृप् धातुओं के पुषादि होने के कारण पुषादिद्यृताद्यृलृदितः परस्मैपदेषु से अङ् की प्राप्ति थी, उसे बाधकर इस वार्तिक से वैकल्पिक सिच् आदेश का ही विधान किया जाता है। सिच् न होने के पक्ष में यथाप्राप्त क्स और अङ् हो जाते हैं।

अक्राक्षीत्, अकाक्षीत्। कृ से लुङ्, अट्, ति होकर अकृष्+त् बना है। च्लि होकर उसके स्थान पर क्स आदेश प्राप्त था, उसे बाधकर स्पृशमृशकृषतृपदूपां च्लेः सिन्वा

.....

वाच्यः से वैकल्पिक सिच् आदेश, वैकल्पिक अम् का आगम करके अक्रप्+स्+त बना। ईट् आगम करके वदव्रजहलन्तस्याचः से क्र की वृद्धि करके धातु के पकार को षढोः कः सि से ककार आदेश, ककार से परे सिच् के सकार को षत्व और क्+ष् के संयोग में क्षत्व करके अक्राक्षीत् बनता है। अम् न होने के पक्ष में अकाक्षीत् बनता है। सिच् न होकर क्स होने के पक्ष में अकृक्षत् बनता है।

लुङ्, परस्मैपद, अम्, सिच्- अक्राक्षीत्, अक्राष्टाम्, अक्राक्षुः, अक्राक्षीः, अक्राष्टम्, अक्राष्ट, अक्राक्षम्, अक्राक्ष्व, अक्राक्ष्म। अमोऽभावे- अकाक्षीत्, अकाष्टम्, अकार्क्षुः, अकार्क्षीः, अकाष्टम्, अकाष्ट, अकार्क्षम्, अकार्क्ष्व, अकार्क्ष्म। क्स के पक्ष में- अकृक्षत्, अकृक्षताम्, अकृक्षन्, अकृक्षः, अकृक्षतम्, अकृक्षत, अकृक्षम्, अकृक्षाव, अकृक्षाम। आत्मनेपद में- सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि नहीं होती और लिङ्सिचावात्मनेपदेषु से किद्वद्भाव होने के कारण अनुदात्तस्य चर्दुप० से अम् का आगम भी नहीं होता। सिच् होकर- अकृष्ट, अकृक्षाताम्, अकृक्षत, अकृष्टाः, अकृक्षाथाम्, अकृढ्वम्, अकृक्षि, अकृक्ष्वहि, अकृक्ष्महि। क्सपक्षे- अकृक्षत, अकृक्षाताम्, अकृक्षन्त, अकृक्षथाः, अकृक्षाथाम्, अकृक्षध्वम्, अकृक्षि, अकृक्षावहि, अकृक्षामहि।

लृङ्- अम्पक्षे- अक्रक्ष्यत्, अक्रक्ष्यत। अमोऽभावे- अकक्ष्यत्, अकक्ष्यत।

मिल सङ्गमे। मिल धातु मिलना, संयुक्त होना अर्थ में है। स्वरित अकार की इत्संज्ञा होने से उभयपदी और सेट् है। इसके भी रूप सरल ही हैं।

लट्, परस्मैपद में- मिलति, मिलतः, मिलन्ति। मिलसि, मिलथः, मिलथ। मिलामि, मिलावः, मिलामः। आत्मनेपद में- मिलते, मिलेते, मिलन्ते। मिलसे, मिलेथे, मिलध्वे। मिले, मिलावहे, मिलामहे। लिट्, परस्मैपद में- मिमेल, मिमिलतुः, मिमिलुः। मिमेलिथ, मिमिलथुः, मिमिल। मिमेल, मिमिलिव, मिमिलिम। आत्मनेपद में- मिमिले, मिमिलाते, मिमिलिरे। मिमिलिषे, मिमिलाथे, मिमिलिध्वे। मिमिले, मिमिलिवहे, मिमिलिमहे। लृट्, परस्मैपद में- मेलिता, मेलितारौ, मेलितारः। मेलितासि, मेलितास्थः, मेलितास्थ। मेलितास्मि, मेलितास्वः, मेलितास्मः। आत्मनेपद में- मेलिता, मेलितारौ, मेलितारः। मेलितासे, मेलितासाथे, मेलिताढ्वे-मेलिताध्वे। मेलिताहे, मेलितास्वहे, मेलितास्महे। लृट्, परस्मैपद में- मेलिष्यति, मेलिष्यतः, मेलिष्यन्ति। मेलिष्यसि, मेलिष्यथः, मेलिष्यथ। मेलिष्यामि, मेलिष्यावः, मेलिष्यामः। आत्मनेपद में- मेलिष्यते, मेलिष्येते, मेलिष्यन्ते। मेलिष्यसे, मेलिष्येथे, मेलिष्यध्वे। मेलिष्ये, मेलिष्यावहे, मेलिष्यामहे। लोट्, परस्मैपद में- मिलतु-मिलतात्, मिलताम्, मिलन्तु। मिल-मिलतात्, मिलतम्, मिलत। मिलानि, मिलाव, मिलाम। आत्मनेपद में- मिलताम्, मिलेताम्, मिलन्ताम्। मिलस्व, मिलेथाम्, मिलध्वम्। मिलै, मिलावहै, मिलामहै। लङ्, परस्मैपद में- अमिलत्, अमिलताम्, अमिलन्। अमिलः, अमिलतम्, अमिलत। अमिलम्, अमिलाव, अमिलाम। आत्मनेपद में- अमिलत, अमिलेताम्, अमिलन्त। अमिलथाः, अमिलेथाम्, अमिलध्वम्। अमिले, अमिलावहि, अमिलामहि। विधिलिङ्, परस्मैपद में- मिलेत्, मिलेताम्, मिलेयुः। मिलेः, मिलेतम्, मिलेत। मिलेयम्, मिलेव, मिलेम। आत्मनेपद में- मिलेत, मिलेयाताम्, मिलेरन्। मिलेथाः, मिलेयाथाम्, मिलेध्वम्। मिलेय, मिलेवहि, मिलेमहि। आशीर्लिङ्, परस्मैपद में- मिल्यात्, मिल्यास्ताम्, मिल्यासुः। मिल्याः, मिल्यास्तम्, मिल्यास्त। मिल्यासम्, मिल्यास्व, मिल्यास्म। आत्मनेपद में- मेलिषीष्ट, मेलिषीयास्ताम्, मेलिषीरन्। मेलिषीष्ठाः, मेलिषीयास्थाम्, मेलिषीढ्वम्-मेलिषीध्वम्। मेलिषीय, मेलिषीवहि, मेलिषीमहि। लुङ्, परस्मैपद में- अमेलीत्,

अमेलिष्टाम्, अमेलिषुः। अमेलीः, अमेलिष्टम्, अमेलिष्ट। अमेलिषम्, अमेलिष्व, अमेलिष्म।

आत्मनेपद में- अमेलिष्ट, अमेलिषाताम्, अमेलिषत। अमेलिष्ठाः, अमेलिषाथाम्,

अमेलिष्वम्-अमेलिष्वम्। अमेलिषि, अमेलिष्वहि, अमेलिष्महि। लृङ्, परस्मैपद में- अमेलिष्यत्,

अमेलिष्यताम्, अमेलिष्यन्। अमेलिष्यः, अमेलिष्यतम्, अमेलिष्यत। अमेलिष्यम्, अमेलिष्याव,

अमेलिष्याम। आत्मनेपद में- अमेलिष्यत, अमेलिष्येताम्, अमेलिष्यन्त। अमेलिष्यथाः,

अमेलिष्येथाम्, अमेलिष्यध्वम्। अमेलिष्ये, अमेलिष्यावहि, अमेलिष्यामहि।

मुच्लृ मोचने। मुच्लृ धातु छोड़ना अर्थ में है। स्वरित लृकार की इत्संज्ञा होती है,

मुच् शेष रहता है। स्वरितेत् होने से उभयपदी है। अनिट् होते हुए भी लिट् में इट् होता है।

लृदित् होने से पुषादि० से च्लि के स्थान पर अङ् होता है।