भ्रस्जे रेफस्योपधायाश्च स्थाने रमागमो वा स्यादार्धधातुके।
बभर्जिथ, बभर्ष्ठ। बभ्रज्ज। बभ्रज्जतुः। बभ्रज्जिथ। स्कोरिति सलोपः।
व्रश्चेति षः। बभ्रष्ठ। बभर्जे, बभ्रज्जे। भर्ष्टा, भ्रष्टा। भक्ष्यति, भ्रक्षति।
वार्तिकम्- विडन्ति रमागमं बाधित्वा सम्प्रसारणं पूर्वविप्रतिषेधेन।
भृज्यात्, भृज्यास्ताम्। भृज्यासुः। भक्षीष्ट, भ्रक्षीष्ट। अभाक्षीत्, अभ्राक्षीत्।
अभर्ष्ट, अभ्रष्ट। कृष विलेखने॥४॥
कृषति, कृषते। चकर्ष, चकृषे।
.....
मित्त्वादन्त्यादचः पर। स्थानषष्ठीनिर्देशाद्रोपधयोर्निवृत्तिः। बभर्ज। बभर्जतुः।
६५३- भ्रस्जो रोपधयो रमन्यतरस्याम्। रश्च उपधा च तयोरितरेतरद्वन्द्वो रोपधे, तयोः
रोपधयोः। भ्रस्जः षष्ठ्यन्तं, रोपधयोः षष्ठ्यन्तं, रम् प्रथमान्तम्, अन्यतरस्याम् सप्तम्यन्तम्,
अनेकपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुके का अधिकार है।
आर्धधातुक के परे होने पर भ्रस्ज् धातु के रेफ और उपधा के स्थान पर
विकल्प से रम् आगम होता है।
रम् में अकार उच्चारणार्थक है और मकार की इत्संज्ञा होती है, र् शेष रहता है।
कौमुदीकार यहाँ पर एक शंका उपस्थापित कर उसका समाधान करते हैं, वह यह कि मित्
करने से यह प्रतीत होता है कि यह आगम है और रोधपयोः इस पद में स्थानषष्ठी निर्देश
होने के कारण यह प्रतीत होता है कि यह आदेश है। यदि आदेश है तो मित् का कोई
प्रयोजन नहीं है, क्योंकि मित् अन्त्य अच् के बाद करने के लिए होता है और यदि आगम है तो रेफ और उपधा के स्थान पर यह कहना भी ठीक नहीं है। अब यहाँ आगम मानकर अन्त्य अच् के बाद करें या आदेश मानकर रेफ और उपधा के स्थान पर करें, यह तो शंका है। उत्तर यह देते हैं कि आचार्य के व्यवहार को देखकर दोनों कार्य करना चाहिए। एक तो यह कि मित् होने के कारण अन्त्य अच् को रम् आगम हो जाय और दूसरा रोपधयोः कहने से रेफ और उपधा का हटना भी हो जाय। इस तरह यह आगम भी सिद्ध होगा और आदेश भी। भ्रस्ज् में अन्त्य अच् है भ्+र्+अ का अकार। अतः अकार के बाद और सकार के पहले रम् वाला र् बैठेगा साथ ही रेफ है अकार के पहले का रेफ तथा उपधा है अन्त्य अल् जकार से पहले का सकार। इस तरह रेफ और सकार ये दोनों हटेंगे। इतना सब करने का फल यह हुआ कि एक तो सकार हट गया और दूसरा अकार के पहले का रेफ हटकर अकार के बाद आगम वाला रेफ बैठ गया। एक रेफ का हटना और दूसरा रेफ का आना हुआ। अन्तर यह हुआ कि पहले रेफ अकार के पहले था और अब रेफ अकार के बाद है। इस तरह भर्ज् बन गया। यह कार्य वैकल्पिक है। अतः ऐसा न होने के पक्ष में तो भ्रस्ज् रहता है ही।
बभर्ज्। भ्रस्ज् से लिट्, तिप्, णल् आदि करके भ्रस्ज् अ बना है। भ्रस्जो रोपधयो रमन्यतरस्याम् से रम् आगम और रेफ तथा उपधाभूत सकार की निवृत्ति करके भर्ज् बना। इसका द्वित्व, हलादिशेष करके भभर्ज् बना। अभ्यास के भकार के स्थान पर अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर बभर्ज्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर बभर्ज् सिद्ध हुआ। इसी तरह बभर्ज्तुः, बभर्जुः भी बन जाते हैं। थल् में भारद्वाज नियम से वैकल्पिक इट् आगम होकर बभर्जिथ बनता है। इट् न होने के पक्ष में बभर्ज्+थ में झल् परे मिलता है। अतः ब्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से जकार के स्थान पर षकार आदेश, उसको जश्त्व, थकार को ष्टुत्व होकर बभर्ष्ठ बनता है। अब रम् आगम न होने के पक्ष में रूप देखते हैं- भ्रस्ज् को द्वित्व होकर हलादिशेष होने पर बभ्रस्ज् है। सकार को श्चुत्व और जश्त्व करके जकार ही बनता है। बभ्रज्ज्+अ=बभ्रज्ज सिद्ध होता है।
लिट्, परस्मैपद, रमागमपक्ष, - बभर्ज्, बभर्ज्तुः, बभर्जुः, बभर्जिथ-बभर्ष्ठ, बभर्जथुः, बभर्ज्, बभर्ज्, बभर्जिव, बभर्जिम। रमागम न होने पर- बभ्रज्ज्, बभ्रज्ज्तुः, बभ्रज्जुः, बभ्रज्जिथ-बभ्रष्ठ, बभ्रज्जथुः, बभ्रज्ज्, बभ्रज्ज्, बभ्रज्जिव, बभ्रज्जिम। आत्मनेपद, रमागमपक्ष- बभर्ज्, बभर्ज्ति, बभर्जिरे, बभर्जिषे, बभर्ज्यथे, बभर्जिध्वे, बभर्ज्, बभर्जिवहे, बभर्जिमहे। रमागम न होने पर- बभ्रज्ज्, बभ्रज्ज्ति, बभ्रज्जिरे, बभ्रज्जिषे, बभ्रज्ज्यथे, बभ्रज्जिध्वे, बभ्रज्ज्, बभ्रज्जिवहे, बभ्रज्जिमहे।
लुट्- रमागमे- भर्ष्ठ, भर्ष्टरौ, भर्ष्टरिः, भर्ष्टसि, भर्ष्टसे। आगमाभावे- भ्रष्टा, भ्रष्टारौ, भ्रष्टारः, भ्रष्टासि, भ्रष्टासे।
लृट्- स्य, रम् आगम करके भर्ज्+स्यति, जकार को षकार आदेश, उसके स्थान पर षढोः कः सि से ककार आदेश, ककार से परे सकार को षत्व करके क्षत्व होने पर भक्ष्यति, भक्ष्यते बनता है। रम् आगम न होने के पक्ष में भ्रक्ष्यति, भ्रक्ष्यते।
लोट्- भृज्ज्तु-भृज्ज्तात्, भृज्ज्ताम्, भृज्ज्तु। भृज्ज्ताम्, भृज्जेताम्, भृज्जन्ताम्।
लङ्- अभृज्ज्त्, अभृज्ज्ताम्, अभृज्ज्न्। अभृज्ज्त, अभृज्जेताम्, अभृज्जन्त।
विधिलिङ्- भृज्जेत्, भृज्जेताम्, भृज्जेयुः। भृज्जेत, भृज्जेयाताम्, भृज्जेरन्।
..... विडन्ति रमागमं बाधित्वा सम्प्रसारणं पूर्वविप्रतिषेधेन। यह वार्तिक है। कित् डित् आर्धधातुक के परे रम् आगम को बाधकर पूर्वविप्रतिषेध से सम्प्रसारण होता है।
आशीर्लिङ् आर्धधातुक है और यहाँ यासुट् को कित् होता है। आर्धधातुक कित् होने के कारण ग्रहिन्यावयिव्यधिवष्टिविचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां डिति च से सम्प्रसारण और भ्रस्जो रोपधयो रमन्यतरस्याम् से रम् आगम एक साथ प्राप्त है। दोनों सूत्र अपनी अपनी जगहों पर चरितार्थ हो चुके हैं। ऐसी स्थिति में विप्रतिषेधे परं कार्यम् के नियम से परकार्य रम् का आगम प्राप्त हो रहा है। यदि रम् आगम होगा तो अनिष्ट रूप बनेगा। अतः कात्यायन ने इस वार्तिक का आरम्भ किया। इसके नियमानुसार रम् को बाध कर सम्प्रसारण होता है।
भृज्ज्यात्। भ्रस्ज् से आशीर्वाद अर्थ में लिङ्, तिप्, आर्धधातुकसंज्ञा, यासुट्, उसको कित्व करके भ्रस्ज्+यास्+त् बना। वार्तिक के नियम से रम् को बाधकर सम्प्रसारण ऋकार आदेश करने पर भृस्ज्+यात् बना। सकार को श्चुत्व और जश्त्व करने पर भृज्ज्यात् सिद्ध हुआ। भृज्ज्यात्, भृज्ज्यास्ताम्, भृज्ज्यासुः। आत्मनेपद के आशीर्लिङ् में कित् या डित् न होने के कारण सम्प्रसारण नहीं होता अपितु वैकल्पिक रम् आगम होकर भर्ज्+सीस्+त बना है। जकार को षत्व, षकार को सकार के परे होने पर कत्व, ककार से परे सकार को षत्व, ककार और षकार के संयोग में कत्व करके भर्क्षीस्+त बना। ईकार से परे सकार को षत्व और षकार से परे तकार को ष्टुत्व करके भर्क्षीष्ट सिद्ध हुआ। भर्क्षीष्ट, भर्क्षीयास्ताम्, भर्क्षीरन्। रम् आगम न होने के पक्ष में भ्रक्षीष्ट, भ्रक्षीयास्ताम्, भ्रक्षीरन्।
लुङ्, परस्मैपद में रमागम होने पर- अभार्क्षीत्, अभार्ष्टाम्, अभार्क्षुः, अभार्क्षीः, अभार्ष्टाम्, अभार्ष्ट, अभार्क्षम्, अभार्क्षव, अभार्क्षम। रम् न होने पर- अभ्राक्षीत्, अभ्राष्टाम्, अभ्राक्षुः, अभ्राक्षीः, अभ्राष्टम्, अभ्राष्ट, अभ्राक्षम्, अभ्राक्षव, अभ्राक्षम। आत्मनेपद में रम् आगम होने पर- अभर्ज्+स्+त बना है। झलो झलि से सकार का लोप, जकार को षत्व और षकार से परे तकार को ष्टुत्व करके अभर्ष्ट बनता है। आताम् में झल् परे न मिलने पर सकार का लोप नहीं होता। अतः षत्व, कत्व, षत्व, कत्व करके अभार्क्षीताम् बनता है। रमागम के पक्ष में- अभर्ष्ट, अभर्क्षीताम्, अभर्क्षत, अभर्ष्टाः, अभर्क्षीयाम्, अभर्द्वम्, अभर्क्षि, अभर्क्षवहि, अभर्क्षमहि। रम् न होने पर- अभ्रष्ट, अभ्रक्षाताम्, अभ्रक्षत, अभ्रष्टाः, अभ्रक्षायाम्, अभ्रद्वम्, अभ्रक्षि, अभ्रक्षवहि, अभ्रक्षमहि।
लृङ्, परस्मैपद, रमागम- अभर्क्ष्यत्, अभर्क्ष्यताम्, अभर्क्ष्यन्। रम् के अभाव में- अभ्रक्ष्यत्, अभ्रक्ष्याताम्, अभ्रक्ष्यन्। आत्मनेपद- अभर्क्ष्यत्, अभ्रक्षत।
कृष विलेखने। कृष धातु विलेखन अर्थात् हल चलाना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होकर कृष् बचता है। भ्वादि के कृष् धातु का खींचना अर्थ है जिसके कर्षति आदि रूप बनते हैं। इस प्रकरण के कृष् धातु के कृषति आदि बनते हैं। स्वरित अकार की इत्संज्ञा होने से यह उभयपदी है और अनुदात्तों में परिगणित होने से अनिट् है किन्तु क्रादिनियम से लिट् में इट् हो जाता है।
लट्- कृषति, कृषतः, कृषन्ति। कृषते, कृषेते, कृषन्ते। लिट्- चकर्ष, चकृषतुः, चकृषुः। चकृषे, चकृषाते, चकृषिरे।