मुच्लिप्विद्लुप्सिच्कृत्खिद्पिशां नुम् स्यात् शे परे।
मुञ्चति, मुञ्चते। मोक्ता। मुच्यात्। मुक्षीष्ट। अमुचत्, अमुक्त। अमुक्षाताम्।
लुप्लृ छेदने॥७॥
लुम्पति, लुम्पते। लोप्ता। अलुपत्। अलुप्ता।
विद्लृ लाभे॥८॥
विन्दति, विन्दते। विवेद, विविदे।
व्याघ्रभूतिमते सेट्। वेदिता। भाष्यमतेऽनिट्। परिवेत्ता।
षिच्च क्षरणे॥९॥
सिञ्चति, सिञ्चते।
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६६५- शे मुचादीनाम्। मुच् आदौ येषां ते मुचादयः, तेषां मुचादीनाम्। शे सप्तम्यन्तं,
मुचादीनां षष्ठ्यन्तं द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में इदितो नुम् धातोः से नुम् की अनुवृत्ति
आती है।
शप्रत्यय के परे होने पर मुच्, लिप्, विद्, लुप्, सिच्, कृत्, खिद् और
पिश् धातुओं को नुम् का आगम होता है।
नुम् में उकार और मकार की इत्संज्ञा तथा लोप होने पर केवल नकार शेष रहता
है।
मुञ्चति। मुच् धातु से लट्, तिप्, श, मुच्+अ+ति बना। शे मुचादीनाम् से नुम्,
अनुबन्धलोप, मित् होने के कारण मिदचोऽन्त्यात्परः की सहायता से अन्त्य अच् मु के उकार
के बाद बैठा- मुन्च् बना, नकार को नश्चापदान्तस्य झलि से अनुस्वार और अनुस्वारस्य
ययि परसवर्णः से परसवर्ण होकर जकार बन गया, मुञ्च्+अ+ति बना, वर्णसम्मेलन हुआ-
मुञ्चति।
लट्-लकार परस्मैपद में- मुञ्चति, मुञ्चतः, मुञ्चन्ति। मुञ्चसि, मुञ्चथः,
मुञ्चथ। मुञ्चामि, मुञ्चावः, मुञ्चामः। आत्मनेपद में- मुञ्चते, मुञ्चेते, मुञ्चन्ते। मुञ्चसे,
मुञ्चेथे, मुञ्चध्वे। मुञ्चे, मुञ्चावहे, मुञ्चामहे।
लिट् में- श न होने के कारण नुम् भी नहीं होता है। परस्मैपद में- मुमोच,
मुमुचतुः, मुमुचुः। मुमोचिथ, मुमुचथुः, मुमुच। मुमोच, मुमुचिव, मुमुचिम। आत्मनेपद में-
मुमुचे, मुमुचाते, मुमुचिरे। मुमुचिषे, मुमुचाथे, मुमुचिध्वे। मुमुचे, मुमुचिवहे, मुमुचिमहे।
लुट् में लघूपधगुण और चकार के स्थान पर चोः कुः से कुत्व होकर ककार हो जाता है। परस्मैपद- मोक्ता, मोक्तारौ, मोक्तारः। मोक्तासि, मोक्तास्थः, मोक्तास्थ। मोक्तास्मि, मोक्तास्वः, मोक्तास्मः। आत्मनेपद में- मोक्ता, मोक्तारौ, मोक्तारः। मोक्तासे, मोक्तासाथे, मोक्ताध्वे। मोक्ताहे, मोक्तास्वहे, मोक्तास्महे।
मोक्ष्यति। मुच् से लृट्, ति, स्य, करके मुच्+स्यति बना। पुगन्तलघूपधस्य च से गुण होकर मोच्+स्यति बना। चकार के स्थान पर चोः कुः से कुत्व करके ककार हुआ। ककार से परे स्य के सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व होकर मोक्+ष्यति बना। ककार और षकार के संयोग होने पर क्ष बन जाता है। मोक्ष्यति बना। इस प्रकार लृट् के रूप बने- परस्मैपद में- मोक्ष्यति, मोक्ष्यतः, मोक्ष्यन्ति। मोक्ष्यसि, मोक्ष्यथः, मोक्ष्यथ। मोक्ष्यामि, मोक्ष्यावः, मोक्ष्यामः। आत्मनेपद में- मोक्ष्यते, मोक्ष्येते, मोक्ष्यन्ते। मोक्ष्यसे, मोक्ष्यथे, मोक्ष्यध्वे। मोक्ष्ये, मोक्ष्यावहे, मोक्ष्यामहे। लोट्, परस्मैपद में- मुञ्चतु-मुञ्चतात्, मुञ्चताम्, मुञ्चन्तु। मुञ्च-मुञ्चतात्, मुञ्चताम्, मुञ्चत। मुञ्चानि, मुञ्चाव, मुञ्चाम। आत्मनेपद में- मुञ्चताम्, मुञ्चेताम्, मुञ्चन्ताम्। मुञ्चस्व, मुञ्चेथाम्, मुञ्चध्वम्। मुञ्चै, मुञ्चावहै, मुञ्चामहै। लङ्, परस्मैपद में- अमुञ्चत्, अमुञ्चताम्, अमुञ्चन्। अमुञ्चः, अमुञ्चतम्, अमुञ्चत, अमुञ्चम्, अमुञ्चाव, अमुञ्चाम। आत्मनेपद में- अमुञ्चत, अमुञ्चेताम्, अमुञ्चन्त। अमुञ्चथाः, अमुञ्चेथाम्, अमुञ्चध्वम्। अमुञ्चे, अमुञ्चावहि, अमुञ्चामहि। विधिलिङ्, परस्मैपद में- मुञ्चेत्, मुञ्चेताम्, मुञ्चेयुः। मुञ्चेः, मुञ्चेतम्, मुञ्चेत। मुञ्चेयम्, मुञ्चेव, मुञ्चेम। आत्मनेपद में- मुञ्चेत, मुञ्चेयाताम्, मुञ्चेरन्। मुञ्चेथाः, मुञ्चेयाथाम्, मुञ्चेध्वम्। मुञ्चेय, मुञ्चेवहि, मुञ्चेमहि। आशीर्लिङ्, परस्मैपद में- मुच्यात्, मुच्यास्ताम्, मुच्यासुः। मुच्याः, मुच्यास्तम्, मुच्यास्त। मुच्यासम्, मुच्यास्व, मुच्यास्म। आत्मनेपद में- कुत्व, सीयुट् के सकार को षत्व और क्ष-संयोग में क्षत्व करके बनाइये- मुक्षीष्ट, मुक्षीयास्ताम्, मुक्षीरन्। मुक्षीष्ठाः, मुक्षीयास्थाम्, मुक्षीध्वम्। मुक्षीय, मुक्षीवहि, मुक्षीमहि।
लुङ्, परस्मैपद में- तिप्, अट्, च्लि, उसके स्थान पर पुषादिद्युताद्यलृदितः परस्मैपदेषु से अङ् होकर अमुच्+अ+त् बना, वर्णसम्मेलन हुआ- अमुचत्। अमुचत्, अमुचताम्, अमुचन्। अमुचः, अमुचतम्, अमुचत। अमुचम्, अमुचाव, अमुचाम। आत्मनेपद में- अङ् नहीं होता है किन्तु सिच् हो जाता है, क्योंकि पुषादिद्युताद्यलृदितः परस्मैपदेषु यह सूत्र परस्मैपद में ही करता है। अमुच्+स्+त में झलो झलि से सकार का लोप और चकार को कुत्व होकर अमुक्त बनता है। जहाँ झल् परे न मिलने के कारण सकार का लोप नहीं हो पाता, वहाँ कुत्व होकर सकार को षत्व और क्षत्व होकर अमुक्षाताम् आदि बनते हैं। इस तरह रूप बनते हैं- अमुक्त, अमुक्षाताम्, अमुक्षत। अमुक्थाः, अमुक्षाथाम्, अमुग्ध्वम्। अमुक्षि, अमुक्ष्वहि, अमुक्ष्महि।
लुङ्, परस्मैपद में- अमोक्ष्यत्, अमोक्ष्यताम्, अमोक्ष्यन्। अमोक्ष्यः, अमोक्ष्यतम्, अमोक्ष्यत। अमोक्ष्यम्, अमोक्ष्याव, अमोक्ष्याम। आत्मनेपद में- अमोक्ष्यत, अमोक्ष्येताम्, अमोक्ष्यन्त। अमोक्ष्यथाः, अमोक्ष्येथाम्, अमोक्ष्यध्वम्। अमोक्ष्ये, अमोक्ष्यावहि, अमोक्ष्यामहि।
लुप्लृ छेदने। लुप्लृ धातु काटना अर्थ में है। स्वरित लृकार की इत्संज्ञा होती है और लुप् शेष रहता है। अनिट् होने पर भी लिट् में क्रादिनियम से इट् हो जाता है। इसकी प्रक्रिया मुच् धातु की तरह ही है किन्तु जहाँ श परे मिलता है, वहाँ शे मुचादीनाम् से नुम् होकर नकार को अनुस्वार परसवर्ण होकर लुम्प् बन जाता है।
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लुप्पति, लुम्पते। लुलोप, लुलुपे। लोप्ता, लोप्तासि, लोप्तासे। लोप्स्यति, लोप्स्यते।
लुम्पतु, लुम्पताम्। अलुम्पत्, अलुम्पत। लुम्पेत्, लुम्पेत। लुप्पात्, लुप्सीष्ट। अलुपत्,
अलुप्त। अलोप्स्यत्, अलोप्स्यत।
विद्लृ लाभे। विद्लृ धातु प्राप्त करना अर्थ में है। इसके लृ की इत्संज्ञा होती है,
विद् शेष रहता है। उभयपदी है। इसके अनिट् होने में मतभेद है। व्याघ्रभूति आचार्य इसे सेट्
मानते हैं और भाष्यकार के मत में यह अनिट् है।
विन्दति। विद् से लट्, तिप्, श, शे मुचादीनाम् से नुम् करके विन्द्+अति बना,
वर्णसम्मेलन हुआ- विन्दति।
लट्, परस्मैपद में- विन्दति, विन्दतः, विन्दन्ति। विन्दसि, विन्दथः, विन्दथ।
विन्दामि, विन्दावः, विन्दामः। आत्मनेपद में- विन्दते, विन्देते, विन्दन्ते। विन्दसे, विन्देथे,
विन्दध्वे। विन्दे, विन्दावहे, विन्दाम हे। लिट्, परस्मैपद में- विवेद, विविदतुः, विविदुः।
विवेदिथ, विविदथुः, विविद। विवेद, विविदिव, विविदिम। आत्मनेपद में- विविदे, विविदाते,
विविदिरे। विविदिषे, विविदाथे, विविदिध्वे। विविदे, विविदिवहे, विविदिमहे। लुट्, परस्मैपद
में- (भाष्यमत में अनिट्) वेत्ता, वेत्तारौ, वेत्तारः। वेत्तासि, वेत्तास्थः, वेत्तास्थ। वेत्तास्मि,
वेत्तास्वः, वेत्तास्मः। आत्मनेपद में- वेत्ता, वेत्तारौ, वेत्तारः। वेत्तासे, वेत्तासाथे, वेत्ताध्वे। वेत्ताहे,
वेत्तास्वहे, वेत्तास्महे। व्याघ्रभूति के मत में- सेट् होने से वेदिता, वेदितारौ आदि भी हो
सकते हैं। लृट्, परस्मैपद में- वेत्स्यति, वेत्स्यतः, वेत्स्यन्ति। वेत्स्यसि, वेत्स्यथः, वेत्स्यथ।
वेत्स्यामि, वेत्स्यावः, वेत्स्यामः। आत्मनेपद में- वेत्स्यते, वेत्स्येते, वेत्स्यन्ते। वेत्स्यसे, वेत्स्येथे,
वेत्स्यध्वे। वेत्स्ये, वेत्स्यावहे, वेत्स्यामहे। लोट्, परस्मैपद में- विन्दतु-विन्दतात्, विन्दताम्,
विन्दन्तु। विन्द-विन्दतात्, विन्दतम्, विन्दत। विन्दानि, विन्दाव, विन्दाम। आत्मनेपद में-
विन्दताम्, विन्देताम्, विन्दन्ताम्। विन्दस्व, विन्देथाम्, विन्दध्वम्। विन्दै, विन्दावहै, विन्दामहै।
लङ्, परस्मैपद में- अविन्दत्, अविन्दताम्, अविन्दन्। अविन्दः, अविन्दतम्, अविन्दत।
अविन्दम्, अविन्दाव, अविन्दाम। आत्मनेपद में- अविन्दत, अविन्देताम्, अविन्दन्त। अविन्दथाः,
अविन्देथाम्, अविन्दध्वम्। अविन्दे, अविन्दावहि, अविन्दामहि। विधिलिङ्, परस्मैपद में-
विन्देत्, विन्देताम्, विन्देयुः। विन्देः, विन्देतम्, विन्देत। विन्देयम्, विन्देव, विन्देम। आत्मनेपद
में- विन्देत, विन्देयाताम्, विन्देरन्। विन्देथाः, विन्देयाथाम्, विन्देध्वम्। विन्देय, विन्देवहि,
विन्देमहि। आशीर्लिङ्, परस्मैपद में- विद्यात्, विद्यास्ताम्, विद्यासुः। विद्याः, विद्यास्तम्,
विद्यास्त। विद्यासम्, विद्यास्व, विद्यास्म। आत्मनेपद में- वित्सीष्ट, वित्सीयास्ताम्, वित्सीरन्।
वित्सीष्टाः, वित्सीयास्थाम्, वित्सीध्वम्। वित्सीय, वित्सीवहि, वित्सीमहि। लुङ्, परस्मैपद
में- अविदत्, अविदताम्, अविदन्। अविदः, अविदतम्, अविदत। अविदम्, अविदाव, अविदाम।
आत्मनेपद में- अवित्त, अवित्साताम्, अवित्सत। अवित्थाः, अवित्साथाम्, अविद्ध्वम्।
अवित्सि, अवित्स्वहि, अवित्स्महि। लृङ्, परस्मैपद में- अवेत्स्यत्, अवेत्स्यताम्, अवेत्स्यन्।
अवेत्स्यः, अवेत्स्यतम्, अवेत्स्यत। अवेत्स्यम्, अवेत्स्याव, अवेत्स्याम। आत्मनेपद में- अवेत्स्यत,
अवेत्स्येताम्, अवेत्स्यन्त। अवेत्स्यथाः, अवेत्स्येथाम्, अवेत्स्यध्वम्। अवेत्स्ये, अवेत्स्यावहि,
अवेत्स्यामहि।
परिवेत्ता। परिपूर्वक विद् धातु से तृच् प्रत्यय होकर अनिट् की स्थिति में परिवेत्ता
बनता है। बड़े भाई के अविवाहित रहते हुए जब छोटा भाई विवाह कर ले, उसे परिवेत्ता
कहते हैं।
षिच क्षरणे। षिच धातु सींचना अर्थ में है। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश होत. है और चकारोत्तरवर्ती स्वरित अकार इत्संज्ञक है। अतः यह उभयपदी है और अनुदात्तों में परिगणित होने के कारण अनिद् है किन्तु लिट् में क्रादिनियम से इट् हो जाता है। मुचादि में आने के कारण शे मुचादीनाम् से श के परे रहते नुम् आगम होता है। लट्- सिञ्चति, सिञ्चते। लिट्- सिषेच, सिषिचे। लृट्- सेक्ता, सेक्तासि, सेक्तासे। लृट्- सेक्ष्यति, सेक्ष्यते। लोट्- सिञ्चतु-सिञ्चतात्, सिञ्चताम्। लङ्- असिञ्चत्, असिञ्चत। विधिलिङ्- सिञ्चेत्, सिञ्चेत। आशीर्लिङ्- सिच्यात्, सिक्षीष्ट।