Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 17
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VṛttiGovind
LSK 652
श-विधायकं विधिसूत्रम्
तुदादिभ्यः शः
Aṣṭādhyāyī 3.1.77
Vṛtti Varadarājācārya

शपोऽपवादः। तुदति, तुदते। तुतोद। तुतोदिथ। तुतुदे। तोत्ता। अतौत्सीत्।

अतुत्त। णुद प्रेरणे॥२॥

तुदति, तुदते।

तुतोद। तोत्ता। भ्रस्ज पाके॥३॥

ग्रहिज्येति सम्प्रसारणम्। सस्य श्चुत्वेन शः। शस्य जश्त्वेन जः।

भृज्जति। भृज्जते।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

तुद व्यथने॥१॥

धातु-प्रकरण में तुदादिप्रकरण छठा है। तुद् धातु आदि में होने के कारण यह तुदादिप्रकरण कहाता है। जैसे भ्वादि में धातु और प्रत्ययों के बीच में विकरण के रूप में शप्, अदादि में शप् होकर उसका लुक्, जुहोत्यादि में शप् होकर श्लु, दिवादि में श्यन् और स्वादि में श्नु हुए, उसी प्रकार तुदादि में शप् को बाधकर श होता है। श में शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप होकर केवल अ बचता है। अ शित् है, अतः उसकी तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा होती है किन्तु सार्वधातुक होते हुए भी वह अपित् है, अतः इसको सार्वधातुकमपित् से डिद्वद्भाव हो जाता है। डित् होने से इसके पूर्व इक् को प्राप्त गुण और वृद्धि का विडन्ति च से निषेध होता है। इसलिए श के परे होने पर पूर्व को गुण और वृद्धि दोनों ही नहीं होते। श करने के पहले भी गुणवृद्धि नहीं कर सकते, क्योंकि तुदादिभ्यः शः से श और गुण-वृद्धि एक साथ प्राप्त होते हैं, श के नित्य होने के कारण पहले नित्यकार्य श ही हो जाता है। परनित्यान्तरङ्गापवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः, अर्थात् पूर्वसूत्र से परसूत्र बलवान् होता है, पर से नित्य, नित्य से अन्तरङ्ग और अन्तरङ्ग से अपवाद सूत्र बलवान् होते हैं। तुलना में जो सूत्र बलवान् होता है, वही पहले लगता है। यहाँ पर नित्य का तात्पर्य नित्य से कार्य करना नहीं है अपितु कृताकृतप्रसङ्गी नित्यः, अर्थात् अन्य सूत्र से किसी काम के कर दिए जाने के बाद भी लगे और कार्य न किए जाने पर भी लगे, उसे नित्य कहा गया है। श करने वाला सूत्र गुण-वृद्धि के होने पर भी लगेगा और न होने पर भी लगेगा। अतः श नित्य है, गुण-वृद्धि के पहले ही लगता है।

तुद व्यथने। तुद धातु दुःख देना, सताना, चुभोना आदि अर्थ में हैं। तुद में

.....

स्वरित अकार की इत्संज्ञा होने के कारण स्वरितजितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी है। एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से इट् निषेध होने के कारण अनिट् भी है किन्तु लिट् में इट् हो जाता है।

६५२- तुदादिभ्यः शः। तुदादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, शः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कर्तरि शप् से कर्तरि और सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।

कर्ता अर्थ में हुए सार्वधातुकसंज्ञक प्रत्यय के परे होने पर तुदादिगणपठित धातुओं से शप् का बाधक श प्रत्यय होता है।

शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप करके केवल अ शेष बचता है। शित् होने के कारण इसकी भी सार्वधातुकसंज्ञा होती है। शप् और श में अन्तर इतना ही है कि शप् पित् है, श पित् नहीं है। पित् और अपित् का फल आप जानते ही हैं।

तुदति। तुद् से लट्, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् प्राप्त, उसे बाधकर तुदादिभ्यः शः से श, अनुबन्धलोप, तुद्+अ+ति बना। श वाला अ अपित् सार्वधातुक है, अतः सार्वधातुकमपित् से ङिद्धद्भाव होने से तुद् के उकार के स्थान पर पुगन्तलघूपधस्य च से प्राप्त लघूपधगुण का विङति च से निषेध हुआ। वर्णसम्मेलन करके तुदति सिद्ध हुआ।

लट् के परस्मैपद में- तुदति, तुदतः, तुदन्ति। तुदसि, तुदथः, तुदथ। तुदामि, तुदावः तुदामः। आत्मनेपद- तुदते, तुदेते, तुदन्ते। तुदसे, तुदेथे, तुदध्वे। तुदे, तुदावहे, तुदामहे।

लिट् में तिप्, णल्, द्वित्व, हलादिशेष, लघूपधगुण करके रूप सिद्ध होते हैं। परस्मैपद में- तुतोद, तुतुदतुः, तुतुदुः। तुतोदिथ, तुतुदथुः, तुतुद। तुतोद, तुतुदिव, तुतुदिम। आत्मनेपद में- तुतुदे, तुतुदाते, तुतुदिरे। तुतुदिषे, तुतुदाथे, तुतुदिध्वे। तुतुदे, तुतुदिवहे, तुतुदिमहे।

लृट् में- तासि के तकार के परे रहते तुद् के दकार को खरि च से चर्त्व करना है। परस्मैपद में- तोत्ता, तोत्तारौ, तोत्तारः। तोत्तासि, तोत्तास्थः, तोत्तास्थ। तोत्तास्मि, तोत्तास्वः, तोत्तास्मः। आत्मनेपद में- तोत्ता, तोत्तारौ, तोत्तारः। तोत्तासे, तोत्तासाथे, तोत्ताध्वे। तोत्ताहे, तोत्तास्वहे, तोत्तास्महे।

लृट्, परस्मैपद में- तोत्स्यति, तोत्स्यतः, तोत्स्यन्ति। तोत्स्यसि, तोत्स्यथः, तोत्स्यथ। तोत्स्यामि, तोत्स्यावः, तोत्स्यामः। आत्मनेपद में- तोत्स्यते, तोत्स्येते, तोत्स्यन्ते। तोत्स्यसे, तोत्स्येथे, तोत्स्यध्वे। तोत्स्ये, तोत्स्यावहे, तोत्स्यामहे।

लोट्, परस्मैपद में- तुदतु-तुदतात्, तुदताम्, तुदन्तु। तुद-तुदतात्, तुदतम्, तुदत। तुदानि, तुदाव, तुदाम। आत्मनेपद में- तुदताम्, तुदेताम्, तुदन्ताम्। तुदस्व, तुदेथाम्, तुदध्वम्। तुदे, तुदावहे, तुदामहे।

लङ्, परस्मैपद में- अतुदत्, अतुदताम्, अतुदन्। अतुदः, अतुदतम्, अतुदत। अतुदम्, अतुदाव, अतुदाम। आत्मनेपद में- अतुदत, अतुदेताम्, अतुदन्त। अतुदथाः, अतुदेथाम्, अतुदध्वम्। अतुदे, अतुदावहि, अतुदामहि।

विधिलिङ्, परस्मैपद- तुदेत्, तुदेताम्, तुदेयुः। तुदेः, तुदेतम्, तुदेत। तुदेयम्, तुदेव, तुदेम। आत्मनेपद- तुदेत, तुदेयाताम्, तुदेरन्। तुदेथाः, तुदेयाथाम्, तुदेध्वम्। तुदेय, तुदेवहि, तुदेमहि।

आशीर्लिङ्, परस्मैपद- तुद्यात्, तुद्यास्ताम्, तुद्यासुः। तुद्याः, तुद्यास्तम्, तुद्यास्त। तुद्यासम्, तुद्यास्व, तुद्यास्म। आत्मनेपद- तुत्सीष्ट, तुत्सीयास्ताम्, तुत्सीरन्। तुत्सीष्ठाः, तुत्सीयास्थाम्, तुत्सीध्वम्। तुत्सीय, तुत्सीवहि, तुत्सीमहि।

अतौत्सीत्। तुद् से लुङ्, अट् आगम, तिप्, च्लि, सिच्, इकार का लोप करके अतुद्+सत् बना। अस्तिसिचोऽपृक्ते से ईट् आगम करके अतुद्+स्+ईत् बना। वदव्रजहलन्तस्याचः से तुद् के उकार की वृद्धि हो जाती है। अतौद्+स्+ईत् बना। दकार को चर्त्व करके अतौत्+स्+ईत् बना, वर्णसम्मेलन हुआ- अतौत्सीत्।

अतौत्ताम्। तुद् से लुङ्, अट् आगम, तस्, ताम् आदेश, च्लि, सिच् करके अतुद्+स्+ताम् बना। वदव्रजहलन्तस्याचः से तुद् के उकार की वृद्धि हो जाती है। अतौद्+स्+ ताम् बना। सकार का झलो झलि से लोप हुआ, अतौद् के दकार को खरि च से चर्त्व होकर अतौत्+ताम् बना, वर्णसम्मेलन हुआ- अतौत्ताम्। ताम्, तम्, त, थास् और ध्वम् में सकार का झलो झलि से लोप होता है। आत्मनेपद में वृद्धि प्राप्त ही नहीं होती है। इस तरह रूप सिद्ध होते हैं- परस्मैपद में- अतौत्सीत्, अतौत्ताम्, अतौत्सुः। अतौत्सीः, अतौत्तम्, अतौत्ताम्। अतौत्सम्, अतौत्स्व, अतौत्स्म। आत्मनेपद में- अतुत्त, अतुत्साताम्, अतुत्सत। अतुत्थाः, अतुत्साथाम्, अतुद्ध्वम्। अतुत्सि, अतुत्स्वहि, अतुत्स्महि।

लृङ्, परस्मैपद में- अतोत्स्यत्, अतोत्स्यताम्, अतोत्स्यन्। अतोत्स्यः, अतोत्स्यतम्, अतोत्स्यत। अतोत्स्यम्, अतोत्स्याव, अतोत्स्याम। आत्मनेपद में- अतोत्स्यत, अतोत्स्येताम्, अतोत्स्यन्त। अतोत्स्यथाः, अतोत्स्येथाम्, अतोत्स्यध्वम्। अतोत्स्ये, अतोत्स्यावहि, अतोत्स्यामहि।

णुद प्रेरणे। णुद धातु प्रेरणा करना, फेंकना, परे हटाना, दूर करना आदि अर्थ में है। दकारोत्तरवर्ती अकार की इत्संज्ञा होती है। णकार के स्थान पर णो नः इस सूत्र से नकार आदेश होकर नुद् बन जाता है। यह धातु भी उभयपदी है। नुद् के रूप भी तुद् धातु की तरह ही चलते हैं।

लट् के परस्मैपद में- नुदति, नुदतः, नुदन्ति। नुदसि, नुदथः, नुदथ। नुदामि, नुदावः नुदामः। आत्मनेपद में- नुदते, नुदेते, नुदन्ते। नुदसे, नुदेथे, नुदध्वे। नुदे, नुदावहे, नुदामहे। लिट्, परस्मैपद में- नुनोद, नुनुदतुः, नुनुदुः। नुनोदिथ, नुनुदथुः, नुनुद। नुनोद, नुनुदिव, नुनुदिम। आत्मनेपद में- नुनुदे, नुनुदाते, नुनुदिरे। नुनुदिषे, नुनुदाथे, नुनुदिध्वे। नुनुदे, नुनुदिवहे, नुनुदिमहे। लृट्, परस्मैपद में- नोत्ता, नोत्तारौ, नोत्तारः। नोत्तासि, नोत्तास्थः, नोत्तास्थ। नोत्तास्मि, नोत्तास्वः, नोत्तास्मः। आत्मनेपद में- नोत्ता, नोत्तारौ, नोत्तारः। नोत्तासे, नोत्तासाथे, नोत्ताध्वे। नोत्ताहे, नोत्तास्वहे, नोत्तास्महे। लृट्, परस्मैपद में- नोत्स्यति, नोत्स्यतः, नोत्स्यन्ति। नोत्स्यसि, नोत्स्यथः, नोत्स्यथ। नोत्स्यामि, नोत्स्यावः, नोत्स्यामः। आत्मनेपद में- नोत्स्यते, नोत्स्येते, नोत्स्यन्ते। नोत्स्यसे, नोत्स्येथे, नोत्स्यध्वे। नोत्स्ये, नोत्स्यावहे, नोत्स्यामहे। लोट्, परस्मैपद में- नुदतु-नुदतात्, नुदताम्, नुदन्तु। नुद-नुदतात्, नुदतम्, नुदत। नुदानि, नुदाव, नुदाम। आत्मनेपद में- नुदताम्, नुदेताम्, नुदन्ताम्। नुदस्व, नुदेथाम्, नुदध्वम्। नुदे, नुदावहे, नुदामहे। लङ्, परस्मैपद में- अनुदत्, अनुदताम्, अनुदन्। अनुदः, अनुदतम्, अनुदत। अनुदम्, अनुदाव, अनुदाम। आत्मनेपद में- अनुदत, अनुदेताम्, अनुदन्त। अनुदथाः, अनुदेथाम्, अनुदध्वम्। अनुदे, अनुदावहि, अनुदामहि।

विधिलिङ्, परस्मैपद- नुदेत्, नुदेताम्, नुदेयुः। नुदेः, नुदेतम्, नुदेत। नुदेयम्, नुदेव, नुदेम। आत्मनेपद- नुदेत, नुदेयाताम्, नुदेरन्। नुदेथाः, नुदेयाथाम्, नुदेध्वम्। नुदेय, नुदेवहि, नुदेमहि। आशीर्लिङ्, परस्मैपद- नुद्यात्, नुद्यास्ताम्, नुद्यासुः। नुद्याः, नुद्यास्तम्, नुद्यास्त। नुद्यासम्, नुद्यास्व, नुद्यास्म। आत्मनेपद- नुत्सीष्ट, नुत्सीयास्ताम्, नुत्सीरन्। नुत्सीष्टाः, नुत्सीयास्थाम्, नुत्सीध्वम्। नुत्सीय, नुत्सीवहि, नुत्सीमहि। लृङ्, परस्मैपद में- अनौत्सीत्,

अनौत्ताम्, अनौत्सुः। अनौत्सीः, अनौत्तम्, अनौत्त। अनौत्सम्, अनौत्स्व, अनौत्स्म। आत्मनेपद

में- अनुत्त, अनुत्साताम्, अनुत्सत। अनुत्थाः, अनुत्साथाम्, अनुद्ध्वम्। अनुत्सि, अनुत्स्वहि,

अनुत्स्महि। लृङ्, परस्मैपद में- अनोत्स्यत्, अनोत्स्यताम्, अनोत्स्यन्। अनोत्स्यः, अनोत्स्यतम्,

अनोत्स्यत। अनोत्स्यम्, अनोत्स्याव, अनोत्स्याम। आत्मनेपद- अनोत्स्यत, अनोत्स्येताम्, अनोत्स्यन्त।

अनोत्स्यथाः, अनोत्स्येथाम्, अनोत्स्यध्वम्। अनोत्स्ये, अनोत्स्यावहि, अनोत्स्यामहि।

भ्रस्ज पाके। भ्रस्ज धातु भुनना अर्थ में है। स्वरित अकार की इत्संज्ञा होती है।

स्वरितेत् होने के कारण उभयपदी है। अनुदात्तों में परिगणना होने के कारण अनिट् है किन्तु

लिट् में क्रादिनियम से इट् होता है साथ ही भारद्वाजनियम से थल् में विकल्प से इट् होता

है।

भृज्जति। भ्रस्ज् से लट्, परस्मैपद, तिप्, श आदि करके भ्रस्ज्+अति बना।

सार्वधातुकमपित् से श वाला अकार डित् हो जाता है। अतः ग्रहिन्यावयिव्यधिवष्टि-

विचतिवृश्चतिपृच्छतिभृज्जतीनां डिति च से भ्रस्ज् के रेफ के स्थान पर सम्प्रसारण

ऋकार होकर भ्+ऋ+अस्ज् बना। ऋ+अ में सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप एकादेश होकर

ऋकार ही हुआ, भृस्ज् बना। सकार को जकार के योग में स्तोः श्चुना श्चुः से श्चुत्व

होकर शकार और उसको झलां जश् झशि से जश्त्व होकर जकार बना। इस तरह

भृज्ज्+अति बना। वर्णसम्मेलन होकर भृज्जति सिद्ध हुआ।

लट्- भृज्जति, भृज्जतः, भृज्जन्ति। भृज्जते, भृज्जेते, भृज्जन्ते।