Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 16
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VṛttiGovind
LSK 651
इण्निषेधकं विधिसूत्रम्
श्र्युकः किति
Aṣṭādhyāyī 7.2.11
Vṛtti Varadarājācārya

श्रिञ् एकाच उगन्ताच्च गित्कितोरिण् न।

परमपि स्वरत्यादि विकल्पं बाधित्वा पुरस्तात् प्रतिषेधकाण्डारम्भ-

सामर्थ्यादनेन निषेधे प्राप्ते क्रादिनियमान्नित्यमिद।

दुधुविवि। दुधुवे। अधावीत्, अधविष्ट, अधोष्ट। अधविष्यत्, अधोष्यत्।

अधविष्यताम्, अधोष्यताम्। अधविष्यत, अधोष्यत।

इति स्वादयः॥१६॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६५१- श्रुकः विकति। श्रिश्च उक्च तयोः समाहारद्वन्द्वः श्रुक्, तस्मात् श्रुकः। ग् च क् च क्कौ, तौ इतौ यस्य तत् विकत्, तस्मिन् विकति। श्रुकः पञ्चम्यन्तं, विकति सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से एकाचः और नेड् वशि कृति से न तथा इट् की अनुवृत्ति आती है। उक् प्रत्याहार है।

श्रिञ् धातु से परे या एकाच् उगन्त धातु से परे गित् और कित् प्रत्ययों को इट् आगम नहीं होता है।

आर्धधातुकस्येद् वलादेः यह सूत्र इद् का विधायक औत्सर्गिक सूत्र है और श्रुकः किंकिति सूत्र उसका निषेधक है तथा स्वरतिसूतिसूयतिधूञ्जूदितो वा यह विकल्प से इद् का विधान करता है। धूञ् धातु के लिट् के वस् में पहले तो नित्य से इद् प्राप्त था, उसे बाधकर विकल्प से प्राप्त हुआ और श्रुकः किंकिति निषेध भी प्राप्त हुआ है अर्थात् एक तरफ श्रुकः किंकिति से इद् का निषेध प्राप्त है तो दूसरी तरफ स्वरतिसूतिसूयतिधूञ्जूदितो वा से वैकल्पिक इद् प्राप्त है। ये दोनों सूत्र अपने-अपने कार्यों में चरितार्थ हो चुके हैं। जैसे भूतः, भूतवान् में इद् का निषेध और धोता, धविता में इद् का विकल्प। दोनों में कोई भी निरवकाश नहीं है। ऐसी स्थिति में विप्रतिषेधे परं कार्यम् से परकार्य इद् का विकल्प होना चाहिए था किन्तु ऐसा न होकर कुछ भिन्न ही होता है। देखिये मूल में-

परमपि स्वरत्यादिनिषेधं बाधित्वा पुरस्तात् प्रतिषेधकाण्डारम्भसामर्थ्यादनेन निषेधे प्राप्ते क्रादिनियमान्नित्यमिद। अर्थात् स्वरतिसूतिसूयतिधूञ्जूदितो वा यह सूत्र यद्यपि श्रुकः किंकिति से पर है तथापि विधिकाण्ड से पूर्व निषेधकाण्ड को प्रारम्भ करने से निषेध की प्रधानता समझनी चाहिए। अतः निषेध ही प्रवृत्त होगा, विकल्प नहीं। इस तरह यहाँ भी निषेध प्राप्त हुआ किन्तु इसमें भी क्रादिनियम की प्रबलता से नित्य से इद् हो जाता है।

तात्पर्य यह है कि अष्टाध्यायी के सप्तम अध्याय के द्वितीयपाद मे नेद् वशि कृति, एकाच उपदेशेऽनुदात्तात्, श्रुकः किंकिति आदि इद् के निषेधक सूत्रों को पहले पढ़कर के बाद में इद्विधायक या वैकल्पिक इद् विधायक सूत्र पढ़े गये हैं। नियम तो यह होना चाहिए कि पहले विधि हो और बाद में उसका निषेध। विधान से पूर्व निषेध करना युक्तिसंगत नहीं बैठता। फिर भी पाणिनि जी ने ऐसा किया है, वह जरूर किसी कारणवश ही होगा। इससे यह सिद्ध होता है कि इद् और इद् के निषेध के सम्बन्ध में यदि कहीं विकल्प और निषेध युगपत् प्राप्त हैं तो वहाँ निषेध को ही प्राथमिकता देनी चाहिए। इस तरह वस्, मस् में क्रानिदनियम से इद् होकर दुधुविव, दुधुविम ये रूप सिद्ध होते हैं।

लिट्- दुधाव, दुधुवतुः, दुधुवुः, दुधविथ-दुधोथ, दुधुवथुः, दुधुव, दुधाव-दुधव, दुधुविव, दुधुविम। आत्मनेपद- दुधुवे, दुधुवाते, दुधुविरे।

लुट्- इट्पक्षे- धविता, धवितारौ, धवितारः, धवितासि, धवितासे। इडभावे- धोता, धोतारौ, धोतारः, धोतासि, धोतासे।

लृट्- इट्पक्षे- धविष्यति, धविष्यते। इडभावे- धोष्यति, धोष्यते।

लोट्- धूनोतु-धूनुतात्, धूनुताम्, धून्वन्तु। धूनुताम्, धून्वाताम्, धून्वताम्।

लङ्- अधूनोत्, अधूनुताम्, अधून्वन्, अधूनोः। अधूनुत, अधून्वाताम्, अधून्वत।

विधिलिङ्- धूनुयात्, धूनुयाताम्, धूनुयुः। धून्वीत, धून्वीयाताम्, धून्वीरन्।

आशीर्लिङ्- धूयात्, धूयास्ताम्, धूयासुः। आत्मनेपद में इद् होने पर धविषीष्ट, धविषीयास्ताम्, धविषीरन् और इट् न होने पर धोषीष्ट, धोषीयास्ताम्, धोषीरन्।

लुङ्- परस्मैपद में स्वरतिसूतिसूयतिधूञ्जूदितो वा से विकल्प से इद् प्राप्त था, उसे बाधकर के स्तुसुधूञ्भ्यः परस्मैपदेषु से नित्य से इद् होकर अधावीत् बनता है। अधावीत्, अधाविष्टाम्, अधाविषुः, अधावीः, अधाविष्टम्, अधाविष्ट, अधाविषम्, अधाविष्व, अधाविष्म। आत्मनेपद में तो विकल्प से ही इद् होता है। अधविष्ट, अधविषाताम्, अधविषत। अधोष्ट, अधोषाताम्, अधोषत।

.....

लृङ्- अधविष्यत्, अधोष्यत्। अधविष्यत, अधोष्यत।

आप पाणिनीयघ्टाध्यायी का एक-एक अध्याय के क्रम से मासिक पारायण कर ही रहे होंगे, ऐसा हमें विश्वास है।

परीक्षा

द्रष्टव्य:- सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।

१-

अपनी पुस्तिका में सुज् और चिज् धातु के सारे रूप लिखें।

१०

२-

सुज् धातु के सभी लकारों में प्रथमपुरुष एकवचन के रूपों की सिद्धि सूत्रों को लगाकर करें।

१५

३-

चिज् धातु के लृङ् लकार के सभी रूपों की सिद्धि दिखाइये।

१५

४-

दिवादि-प्रकरण और स्वादि-प्रकरण की तुलना करें।

१०

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का स्वादिप्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ तुदादयः