ऋदन्तात्संयोगादेः परयोर्लिङ्सिचोरिड्वा स्यात्तङि।
स्तरिषीष्ट, स्तृषीष्ट।
अस्तरिष्ट, अस्तृत।धूञ् कम्पने॥४॥
धूनोति,
धूनुते। दुधाव। स्वरतीति वेट्। दुधविथ, दुधोथ।
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६५०- ऋतश्च संयोगादेः। संयोगः आदिर्यस्य स संयोगादिः, तस्य संयोगादेः। ऋतः
पञ्चम्यन्तं, च अव्ययपदं, संयोगादेः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। लिङ्सिचावात्मनेपदेषु
इस सूत्र के सभी पदों की तथा इट् सनि वा से इट् और सनि की अनुवृत्ति होती है।
संयोग जिस के आदि में हो ऐसे ऋदन्त धातु से परे लिङ् और सिच् को
विकल्प से इट् आगम होता है आत्मनेपद में।
स्तरिषीष्ट, स्तृषीष्ट। आशीर्लिङ् के आत्मनेपद में सीयुट् आदि होकर स्तृ+सी+स्+त बना है। अनिट् धातु होने के कारण इट् प्राप्त नहीं था किन्तु ऋतश्च संयोगादेः के विशेष विधान से विकल्प से इट् हो गया। स्तृ+इ+सी+स्+त बना। स्तृ को सार्वधातुकगुण, इकार से परे सकार को षत्व, ईकार से परे सकार को भी षत्व, षकार से परे तकार को ष्टुत्व करके स्तरिषीष्ट बनता है। इट् न होने के पक्ष में उश्च इस सूत्र से लिङ् को कित्व हो जाने के कारण विङ्ति च से गुण का निषेध हुआ। अतः स्तृषीष्ट ही बना रहा। इस तरह दो रूप बन गये।
आशीर्लिङ्, आत्मनेपद, इट्पक्ष- स्तरिषीष्ट, स्तरिषीयास्ताम्, स्तरिषीरन् आदि। इट् के अभाव में उश्च से कित् होने के कारण गुणनिषेध हो जाता है। स्तृषीष्ट, स्तृषीयास्ताम्, स्तृषीरन् आदि।
लुङ्, परस्मैपद- अस्तार्षीत्, अस्तार्ष्टाम्, अस्तार्षुः, अस्तार्षीः, अस्तार्ष्टम्, अस्तार्ष्ट, अस्तार्षम्, अस्तार्ष्व, अस्तार्ष्म। आत्मनेपद में- उश्च से कित् होने के कारण गुणवृद्धि नहीं होती है और ह्रस्वादङ्गात् से झल् के परे रहते सकार का लोप होता है। अस्तृत, अस्तृषाताम्, अस्तृषत, अस्तृथाः, अस्तृषाथाम्, अस्तृढ्वम्, अस्तृषि, अस्तृष्वहि, अस्तृष्महि। लृङ्- अस्तरिष्यत्, अस्तरिष्यत।
धूञ् कम्पने। धूञ् धातु कँपाना अर्थ में है। ञकार की इत्संज्ञा होने से उभयपदी है। स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा से यह धातु वेट् है।
लट्, परस्मैपद- धूनोति, धूनुतः, धून्वन्ति, धूनोषि, धूनुथः, धूनुथ, धूनोमि, धून्वः-धूनुवः, धून्मः-धूनुमः। आत्मनेपद- धूनुते, धून्वाते, धून्वते, धूनुषे, धून्वाथे, धूनुध्वे, धून्वे, धून्वहे-धूनुवहे, धून्महे-धूनुमहे। लिट्, परस्मैपद- दुधाव, दुधुवतुः, दुधुवुः। थल् में स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा से वैकल्पिक इट् होकर दुधविथ-दुधोथ दो रूप बनते हैं।