Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 16
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VṛttiGovind
LSK 649
खयां शिष्यार्थं विधिसूत्रम्
शर्पूर्वाः खयः
Aṣṭādhyāyī 7.4.61
Vṛtti Varadarājācārya

अभ्यासस्य शर्पूर्वाः खयः शिष्यन्तेऽन्ये हलो लुप्यते। तस्तार।

तस्तरतुः। तस्तरे। गुणोऽर्तीति गुणः। स्तर्यात्।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६४९- शर्पूर्वाः खयः। शर् पूर्वो येषां ते शर्पूर्वाः। शर्पूर्वाः प्रथमान्तं, खयः प्रथमान्तं,

द्विपदमिदं सूत्रम्। हलादिः शेषः से वचनविपरिणाम करके शेषाः एवम् अत्र लोपोऽभ्यासस्य

से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।

जिस अभ्यास में पूर्व में शर् हो, उस अभ्यास के खय् का ही शेष होता

है, अन्य हल् लुप्त हो जाते हैं।

स्मरण रहे कि हलादिः शेषः यह सूत्र किसी भी आदि हल् का शेष करता है

किन्तु यह उसका बाधक है। यदि खय् के पहले शर् हो तो आदि हल् का शेष न होकर

शर् से परे विद्यमान खय् का शेष होता है।

तस्तार। स्तृ से लिट्, तिप्, णल्, द्वित्व होकर स्तृ+स्तृ+अ बना। इसके बाद

उरत्ह से अर् होकर स्तर्+स्तृ+अ बना। हलादिः शेषः से आदि सकार का शेष और अन्त्य

तर् का लोप हो रहा था किन्तु पूर्व में सकार शर् है और उससे परे खय् तकार है, अतः

उसे बाधकर शर्पूर्वाः खयः से तकार का शेष और सकार और रेफ का लोप हो गया।

त+स्तृ+अ बना। ऋतश्च संयोगादेर्गुणः से ऋकार को गुण होकर अत उपधायाः से वृद्धि

होकर तस्तार सिद्ध हुआ। अतुस् आदि में भी यही प्रक्रिया होती है। गुण सभी जगह किन्तु

णित् को छोड़कर अन्यत्र वृद्धि नहीं होती। तस्तरतुः, तस्तरुः आदि। आत्मनेपद में भी

लगभग यही प्रक्रिया है।

लिट्, परस्मैपद- तस्तार, तस्तरतुः, तस्तरुः, तस्तर्थ, तस्तरतुः, तस्तर, तस्तार-तस्तर,

तस्तरिव, तस्तरिम। आत्मनेपद- तस्तरे, तस्तराते, तस्तरिरे, तस्तरिषे, तस्तराथे, तस्तरिढ्वे-तस्तरिध्वे,

तस्तरे, तस्तरिवहे, तस्तरिमहे।

लुट् में गुण होता है। स्तर्ता, स्तर्तारौ, स्तर्तारः, स्तर्तासि, स्तर्तासे। लृट् में-

ऋद्धनोः स्ये से इट् का आगम होकर स्तरिष्यति, स्तरिष्यते। लोट्- स्तृणोतु-स्तृणुतात्,

स्तृणुताम्। लङ्- अस्तृणोत्, अस्तृणुत। विधिलिङ्- स्तृणुयात्, स्तृण्वीत। आशीर्लिङ् के

परस्मैपद में गुणोऽर्तिसंयोगाद्योः से गुण होकर स्तर्यात् बनता है। आत्मनेपद में अग्रिम

सूत्र की प्रवृत्ति होती है।