अनयोरमागमः स्याज्झलादावकिति। स्रष्टा। स्रक्ष्यते। सृक्षीष्ट।
असृष्ट। असृक्षाताम्। मृष तितिक्षायाम्॥२६॥
मृष्यति, मृष्यते। ममर्ष। ममर्षिथ। ममृषिषे। मर्षितासि।
मर्षिष्यति, मर्षिष्यते। णह बन्धने॥२७॥
नह्यति, नह्यते। ननाह। नेहिथ, ननद्ध। नेहे। नद्धा। नत्स्यति। अनात्सीत्, अनद्ध।
इति दिवादयः॥१५॥
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६४५- सृजिदृशोर्झल्यमकिति। सृजिश्च दृश् च तयोरितरेतरद्वन्द्वः सृजिदृशौ, तयोः सृजिदृशोः। न कित् अकित्, तस्मिन्। सृजिदृशोः षष्ठ्यन्तं, झलि सप्तम्यन्तम्, अम् प्रथमान्तम्, अकिति सप्तम्यन्तम् अनेकपदमिदं सूत्रम्।
कित्-भिन्न झलादि प्रत्यय परे हो तो सृज् और दृश् धातुओं को अम् आगम होता है।
स्रष्टा। सृज् से लुट्, तासि, डा, टि का लोप करके सृज्+ता बना है। सृजिदृशोर्झल्यमकिति से अम् आगम हुआ। अनुबन्धलोप होकर अकार के मित् होने से अन्त्य अच् के बाद बैठा तो सृ+अ+ज्+ता बना। सृ+अ में यण् होकर सर्+अ=स्र, स्रज्+ता बना। जकार के स्थान पर व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयज- राजभ्राजच्छषां षः से षकार आदेश होकर स्रष्+ता बना। वर्णसम्मेलन होकर स्रष्टा सिद्ध हो गया। स्रष्टा, स्रष्टारौ, स्रष्टारः।
स्रक्ष्यते। लृट् में भी अम् आगम, यण्, षकारादेश करके स्रष्+स्यत बना है। षढोः कः सि से षकार के स्थान पर ककार आदेश, ककार से परे सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व, ककार और षकार के संयोग से ककार होकार स्रक्ष्यते सिद्ध होता है। स्रक्ष्यते, स्रक्ष्यन्ते।
लोट्- सृज्यताम्, सृज्येताम्, सृज्यन्ताम्। लङ्- असृज्यत, असृज्येताम्, असृज्यन्त। विधिलिङ्- सृज्येत, सृज्येयाताम्, सृज्येरन्। आशीर्लिङ्- लिङ्सिचावात्मनेपदेषु से कित् होने के कारण सृजिदृशोर्झल्यमकिति से अम् नहीं होगा- सृक्षीष्ट, सृक्षीयास्ताम्, सृक्षीरन्। लुङ्- असृष्ट, असृक्षाताम्, असृक्षत, असृष्ठाः, असृक्षाथाम्, असृड्ढ्वम्, असृक्षि, असृक्ष्वहि, असृक्ष्महि। लृङ्- अस्रक्ष्यत, अस्रक्ष्येताम्, अस्रक्ष्यन्त।
मृष तितिक्षायाम्। मृष धातु तितिक्षा अर्थात् सहना अर्थ में है। स्वरित अन्त्य अकार की इत्संज्ञा होती है। स्वरितेत् होने से स्वरितजित कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी हो जाता है। अनुदात्तधातुओं में परिगणित न होने से सेट् है।
लट्- मृष्यति, मृष्यतः, मृष्यन्ति। मृष्यते, मृष्येते, मृष्यन्ते। लिट्- ममर्ष, ममृषतुः, ममृषुः, ममर्षिथ। ममृषे, ममृषाते, ममृषिरे। लृट्- मर्षिता, मर्षितारौ, मर्षितारः, मर्षितासि, मर्षितासे। लृट्- मर्षिष्यति, मर्षिष्यते। लोट्- मृष्यतु-मृष्यतात्, मृष्यताम्, मृष्यन्तु। मृष्यताम्, मृष्येताम्, मृष्यन्ताम्। लङ्- अमृष्यत्, अमृष्यताम्, अमृष्यन्। अमृष्यत, अमृष्येताम्, अमृष्यन्त। विधिलिङ्- मृष्येत्, मृष्येताम्, मृष्येयुः। मृष्येत, मृष्येयाताम्, मृष्येरन्। आशीर्लिङ्- मृष्यात्,
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मृष्यास्ताम्, मृष्यासुः। मृषीष्ट, मृषीयास्ताम्, मृषीरन्। लृङ्- अमर्षीत्, अमर्षिष्टाम्, अमर्षिषुः।
अमर्षिष्ट, अमर्षिषाताम्, अमर्षिषत। लृङ्- अमर्षिष्यत्, अमर्षिष्यत।
णह बन्धने। णह धातु बाँधना अर्थ में है। स्वरित अन्त्य अकार की इत्संज्ञा होती है। अतः उभयपदी है। णो नः से नकार आदेश होता है। अनिट् है।
लृङ्- नह्यति, नह्यते। लिट्- ननाह, नेहतुः, नेहुः, नेहिथ, नेहथुः, नेह, ननाह-ननह, नेहिव, नेहिम। नेहे, नेहाते, नेहिरे, नेहिषे, नेहाथे, नेहिढ्वे-नेहिध्वे, नेहे, नेहिवहे, नेहिमहे। लृङ्- नहो धः से हकार के स्थान पर धकार आदेश और झषस्तथोर्धोऽधः से तकार के स्थान पर धकार आदेश होने के बाद पूर्व धकार को जश्त्व होकर-नद्धा, नद्धासि, नद्धासे। लृङ्- नत्स्यति, नत्स्यते। लोट्- नह्यतु-नह्यतात्, नह्यताम्। लृङ्- अनह्यत्, अनह्यत। विधि लिङ्- नह्येत्, नह्येत। आशीर्लिङ्- नह्यात्, नत्सीष्ट। लृङ्- अनात्सीत्, अनाद्धाम्, अनात्सुः, अनात्सीः, अनाद्धम्, अनाद्ध, अनात्सम्, अनात्स्व, अनात्स्म। अनद्ध, अनत्साताम्, अनत्सत, अनद्धाः, अनत्साथाम्, अनद्ध्वम्, अनत्सि, अनत्स्वहि, अनत्स्महि। लृङ्- अनत्स्यत्, अनत्स्यत।
परीक्षा
द्रष्टव्यः- सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।
१-
अपनी पुस्तिका में दिव्, षिव्, पुप् और जन् धातु के सारे रूप लिखें।
२०
२-
दिव् धातु के सभी लकारों में प्रथमपुरुष एकवचन के रूपों की सिद्धि सूत्रों को लगाकर करें।
१५
३-
जुहोत्यादिप्रकरण और दिवादिप्रकरण की तुलना करें।
१०
४-
नृत् धातु के सभी रूपों को पुस्तिका में उतारें।
५
श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में
गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का
दिवादिप्रकरण पूर्ण हुआ।
अथ स्वादयः