शपोऽपवादः। सुनोति। सुनुतः। हुश्नुवोरिति यण्। सुन्वन्ति। सुन्वः, सुनुवः। सुनुते। सुन्वाते। सुन्वते। सुन्वहे, सुनुवहे। सुषाव, सुषुवे। सोता। सुनु। सुनुवानि। सुनवै। सुनुयात्। सूयात्।
षुञ् अभिषवे॥१॥
धातु-प्रकरण में स्वादिप्रकरण पाँचवाँ है। सु धातु आदि में होने के कारण यह स्वादिप्रकरण कहलाता है। जैसे स्वादि में धातु और प्रत्ययों के बीच में विकरण के रूप में शप्, अदादि में शप् होकर उसका लुक, जुहोत्यादि में शप् होकर श्नु और दिवादि में श्यन् हुए उसी प्रकार स्वादि में शप् को बाधकर श्नु होता है। श्नु में शकार की लक्ष्यव्यवहारिकता से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप होकर केवल नु बचता है। नु यह शित् है, अतः उसकी तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा होती है। सार्वधातुक होते हुए भी अपितु है, अतः इसको सार्वधातुकमपितु से ङिद्धद्वाव हो जाता है। ङित् होने से इसके परे होने पर पूर्व इक् को मानकर होने वाली गुण-वृद्धि का विङ्ति च से निषेध होता है। इसलिए श्नु के परे होने पर पूर्व को गुण और वृद्धि दोनों ही नहीं होते। श्नु करने के पहले भी गुणवृद्धि नहीं कर सकते, क्योंकि स्वादिभ्यः श्नुः से श्नु और गुण-वृद्धि एक साथ प्राप्त होते हैं, श्नु के नित्य होने के कारण पहले नित्यकार्य श्नु ही हो जाता है। एक परिभाषा है- परनित्यान्तरङ्गापवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः, अर्थात् पूर्वसूत्र से परसूत्र बलवान् होता है, पर से नित्य, नित्य से अन्तरङ्ग और अन्तरङ्ग से अपवाद सूत्र बलवान् होते हैं। तुलना में जो सूत्र बलवान् होता है, वही पहले लगता है। यहाँ पर नित्य का तात्पर्य नित्य से कार्य करना नहीं है अपितु कृताकृतप्रसङ्गी नित्यः, अर्थात् अन्य सूत्र से किसी काम के कर दिए जाने के बाद भी लगे और कार्य न किए जाने पर भी लगे, उसे नित्य कहा गया है। श्नु करने वाला सूत्र गुण-वृद्धि के होने पर भी लगेगा और गुणवृद्धि न होने पर भी लगेगा। अतः नु नित्य है, इसलिए गुण-वृद्धि के पहले होता है। श्नु के परे तिष् आदि सार्वधातुक हैं और तिष्, सिष् एवं मिष् ङित् नहीं होते हैं, अतः उनके परे श्नु के उकार को अवश्य सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण हो जाता है।
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षुञ् अभिषवे। यह धातु अभिषव अर्थ में है। आचार्यों ने अभिषव के चार अर्थ किये हैं- स्नान कराना, निचोड़ना, स्नान करना और सुरासन्धान अर्थात् शराब बनाना। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश होता है। जकार की इत्संज्ञा होती है। सु बचता है। जित् होने के कारण स्वरितजितः कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी है। एकाच उपदेशेऽनुदात्तात् से इट् निषेध होने के कारण अनिट् भी है।
६४६- स्वादिभ्यः श्नुः। स्वादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, श्नुः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। कर्तरि शप् से कर्तरि और सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।
कर्ता अर्थ में हुए सार्वधातुकसंज्ञक प्रत्यय के परे होने पर स्वादिगणपठित धातुओं से शप् का बाधक श्नु प्रत्यय होता है।
शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप करके केवल नु शेष बचता है। शित् होने के कारण इसकी भी सार्वधातुकसंज्ञा होती है।
सुनोति। षुञ् धातु में जकार का लोप, षकार के स्थान पर सकार करने के बाद सु बचा। उससे लट् लकार और उसके स्थान पर पहले परस्मैपद का प्रयोग हुआ तो तिप् आया, सार्वधातुकसंज्ञा करके शप् प्राप्त था, उसे बाधकर स्वादिभ्यः श्नुः से श्नु हुआ। शकार की इत्संज्ञा, सु+नु+ति बना। नु की सार्वधातुकसंज्ञा करके सार्वधातुकार्थधातुकयोः से सु के उकार को गुण प्राप्त था किन्तु क्ङिति च से गुणनिषेध हुआ, क्योंकि सार्वधातुकमपित् से नु को ङिद्ध्याव हुआ है। ति को सार्वधातुक मानकर नु के ही उकार को गुण हुआ- सुनोति।
सुनुतः। द्विवचन में तस्, शेष प्रक्रिया पूर्ववत् हुई। तस् अपित् है, अतः ङिद्ध्याव होकर नु को प्राप्त गुण का निषेध, सकार को रुत्वविसर्ग करके सुनुतः सिद्ध हुआ।
सुन्वन्ति। सु धातु से झि, अन्त् आदेश करके अन्ति बना, श्नु आदि करके सु+नु+अन्ति बना। अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से उवङ् आदेश प्राप्त था, उसे बाधकर हुश्नुवोः सार्वधातुके से नु के उकार के स्थान पर यण् आदेश व् हो गया, सुन्व्+अन्ति बना, वर्णसम्मेलन हुआ- सुन्वन्ति।
सुनोषि। सुनोति की तरह सुनोसि बनाकर सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व कर देने पर सुनोषि बन जाता है। इसी तरह सुनोमि भी बनाइये। सुनुतः की तरह सुनुथः, सुनुथ, सुनुवः, सुनुमः भी बना सकते हैं किन्तु वस् और मस् के परे होने पर लोपश्चास्यान्यतरस्याम् म्वोः से उकार का वैकल्पिक लोप करके सुन्वः, सुनुवः एवं सुन्मः, सुनुमः एसे दो-दो रूप बतने हैं। इस तरह से सु धातु के लट् के परस्मैपद में- सुनोति, सुनुतः, सुन्वन्ति। सुनोपि, सुनुथः, सुनुथ। सुनोमि, सुन्वः-सुनुवः, सुन्मः-सुनुमः।
आत्मनेपद में कोई पित् नहीं है, अतः सार्वधातुकमपित् से सभी ङित् हैं। फलतः सभी में गुण का निषेध रहेगा ही। परस्मैपद की तरह ही रूप बनाइये किन्तु अच् परे होने पर हुश्नुवोः सार्वधातुके से यण् और टित आत्मनेपदानां टेरे एत्व करना भी न भूलें। सुनुते, सुन्वाते, सुन्वते। सुनुषे, सुन्वाथे, सुनुध्वे। सुन्वे, सुन्वहे-सुनुवहे, सुन्महे-सुनुमहे।
लिट् में द्वित्वादि कार्य होकर आदेशप्रत्यययोः से द्वितीय सकार को षत्व हो जाता है। यह भी ध्यान रहे कि लिट् आर्धधातुक लकार है, अतः अजादि-प्रत्ययों के परे हुश्नुवोः सार्वधातुके से यण् न होकर अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से उवङ् ही होता है। प्रक्रिया आप स्वयं करिये। सरलता से रूपसिद्धि कर सकेंगे।
लिट् में परस्मैपद के रूप- सुषाव, सुषुवतुः, सुषुवुः। सुषविथ-सुषोथ, सुषुवथुः, सुषुव। सुषाव-सुषव, सुषुविव, सुषुविम। आत्मनेपद में- सुषुवे, सुषुवाते, सुषुविरे। सुषुविषे, सुषुवाथे, सुषुविद्वे-सुषुविध्वे। सुषुवे, सुषुविवहे, सुषुविमहे।
लृट् में आर्धधातुक परे होने के कारण गुण हो जाता है। परस्मैपद के रूप- सोता, सोतारौ, सोतारः। सोतासि, सोतास्थः, सोतास्थ। सोतास्मि, सोतास्वः, सोतास्मः। आत्मनेपद में- सोता, सोतारौ, सोतारः। सोतासे, सोतासाथे, सोताध्वे। सोताहे, सोतास्वहे, सोतास्महे।
लृट्- परस्मैपद में- सोष्यति, सोष्यतः, सोष्यन्ति। सोष्यसि, सोष्यथः, सोष्यथं। सोष्यामि, सोष्यावः, सोष्यामः। आत्मनेपद में- सोष्यते, सोष्येते, सोष्यन्ते। सोष्यसे, सोष्येथे, सोष्यध्वे। सोष्ये, सोष्यावहे, सोष्यामहे।
लोट्- सुनोतु-सुनुतात्, सुनुताम्, सुन्वन्तु।
सुनुहि। लोट्, मध्यमपुरुष के एकवचन में सारी प्रक्रिया पूर्ववत् ही है, उतश्च प्रत्ययादसंयोगपूर्वात् से हि का लुक् करके सुनु, तातङ् होने के पक्ष में सुनुतात् ये दो रूप बन जाते हैं। इस प्रकार से लोट् के परस्मैपद में रूप बने- सुनोतु-सुनुतात्, सुनुताम्, सुन्वन्तु। सुनु-सुनुतात्, सुनुतम्, सुनुत। सुनवानि, सुनवाव, सुनवाम। आत्मनेपद में- सुनुताम्, सुन्वाताम्, सुन्वाताम्। सुनुष्व, सुन्वाथाम्, सुनुध्वम्। सुनवै, सुनवावहे, सुनवामहे।
लङ्- ( परस्मैपद ) असुनोत्, असुनुताम्, असुन्वन्। असुनोः, असुनुतम्, असुनुत। असुनवम्, असुनुव-असुन्व, असुनुम-असुन्म। आत्मनेपद में- असुनुत, असुन्वाताम्, असुन्वत। असुनुथाः, असुन्वाथाम्, असुनुध्वम्। असुन्वि, असुन्वहि-असुनुवहि, असुन्महि-असुनुमहि।
विधिलिङ्- ( परस्मैपद ) सुनुयात्, सुनुयाताम्, सुनुयुः। सुनुयाः, सुनुयातम्, सुनुयात। सुनुयाम्, सुनुयाव, सुनुयाम। आत्मनेपद- सुन्वीत, सुन्वीयाताम्, सुन्वीरन्। सुन्वीथाः, सुन्वीयाथाम्, सुन्वीध्वम्। सुन्वीय, सुन्वीवहि, सुन्वीमहि।
आशीर्लिङ्- ( परस्मैपद ) अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ करके सूयात्, सूयास्ताम्, सूयासुः। सूयाः, सूयास्तम्, सूयास्त। सूयासम्, सूयास्व, सूयास्म। आत्मनेपद- सीयुट् और सुट् करके- सोषीष्ट, सोषीयास्ताम्, सोषीरन्। सोषीष्ठाः, सोषीयास्थाम्, सोषीद्ववम्। सोषीय, सोषीवहि, सोषीमहि।