पदेश्चिलेश्चिण् स्यात्तशब्दे परे। अपादि। अपत्साताम्। अपत्सत।
विद सत्तायाम्॥२२॥
विद्यते।
वेत्ता। अवित्त। बुध अवगमने॥२३॥
बुध्यते। बोद्धा। भोत्स्यते। भुत्सीष्ट। अबोधि, अबुद्ध। अभुत्साताम्।
युध सम्प्रहारे॥२४॥
युध्यते। युयुधे। योद्धा। अयुद्ध।
सृज विसर्गे॥२५॥
सृज्यते। ससृजे। ससृजिषे।
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६४४- चिण् ते पदः। चिण् प्रथमान्तं, ते सप्तम्यन्तं, पदः पञ्चम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। च्लेः सिच् से च्लेः की अनुवृत्ति आती है।
पद धातु से परे च्लि के स्थान पर चिण् आदेश होता है त-शब्द के परे होने पर।
इस सूत्र से विधीयमान चिण् नित्य है।
अपादि। पद् से लुङ्, अट् का आगम, त, च्लि करके उसके स्थान पर चिण् ते पदः से नित्य से चिण् आदेश होकर अपद्+इत बना। अत उपधायाः से पकारोत्तरवर्ती अकार की वृद्धि और चिणो लुक् से त का लुक् करके अपादि बना। ताम् आदि में चिण् नहीं होगा।
लुङ् के रूप- अपादि, अपत्साताम्, अपत्सत, अपत्थाः, अपत्साथाम्, अपद्ध्वम्, अपत्सि, अपत्स्वहि, अपत्स्महि। लृङ्- अपत्स्यत, अपत्स्येताम्, अपत्स्यन्त।
विद सत्तायाम्। विद धातु सत्ता अर्थात् होना, विद्यमान रहना, पाया जाना अर्थ में है। अकार की इत्संज्ञा होकर विद् शेष रहता है। अनुदात्तेत् होने के कारण आत्मनेपदी है। अनुदात्तों में पढ़े जाने से अनिट् है किन्तु लिट् में क्रादिनियम से सर्वत्र इट् होता है। लट्- विद्यते, विद्येते, विद्यन्ते। लिट्- विविदे, विविदाते, विविदिरे। लुट्- वेत्ता, वेत्तारौ, वेत्तारः। लृट्- वेत्स्यते, वेत्स्येते, वेत्स्यन्ते। लोट्- विद्यताम्, विद्येताम्, विद्यन्ताम्। लङ्- अविद्यत, अविद्येताम्, अविद्यन्त। विधिलिङ्- विद्येत, विद्येयाताम्, विद्येरन्। आशीर्लिङ्- वित्सीष्ट, वित्सीयास्ताम्, वित्सीरन्। लुङ् के त में झलो झलि से सकार का लोप होता है। अवित्त, अवित्साताम्, अवित्सत, अवित्थाः, अवित्साथाम्, अविद्ध्वम्, अवित्सि, अवित्स्वहि, अवित्स्महि। लृङ्- अवित्स्यत, अवित्स्येताम्, अवित्स्यन्त।
बुध अवगमने। बुध धातु जानना अर्थ में है। अनुदात्त अकार की इत्संज्ञा होकर बुध् शेष रहता है। अनिट् और आत्मनेपदी है। स्य, सीयुट् और सिच् के सकार के परे होने पर एकाचो बशो भष् झषन्तस्य स्ध्वोः से बकार के स्थान पर भष् आदेश होकर भकार हो जाता है। तासि के तकार को झषस्तथोर्धोऽधः से धकार आदेश होकर बुध् के पूर्व धकार को झलां जश् झशि से जश्त्व होकर दकार बनता है। लुङ् के त में दीपजनबुध पूरितायिष्यायिभ्योऽन्यतरस्याम् से चिण् होता है। उसके बाद चिणो लुक् से त का लुक् होता है। लघूपधगुण होता है। चिण् न होने के पक्ष में सिच् के सकार का झलो झलि से लोप होता है।
लट्- बुध्यते, बुध्येते, बुध्यन्ते। लिट्- बुबुधे, बुबुधाते, बुबुधिरे। लुट्- बोद्धा, बोद्धारौ, बोद्धारः। लृट्- भोत्स्यते, भोत्स्येते, भोत्स्यन्ते। लोट्- बुध्यताम्, बुध्येताम्, बुध्यन्ताम्। लङ्- अबुध्यत, अबुध्येताम्, अबुध्यन्त। विधिलिङ्- बुध्येत, बुध्येयाताम्, बुध्येरन्। आशीर्लिङ्- भुत्सीष्ट, भुत्सीयास्ताम्, भुत्सीरन्। लुङ्- अबोधि-अबुद्ध, अभुत्साताम्, अभुत्सत, अबुद्धाः, अभुत्साथाम्, अभुद्ध्वम्, अभुत्सि, अभुत्स्वहि, अभुत्स्महि। लृङ्- अभोत्स्यत, अभोत्स्येताम्, अभोत्स्यन्त।
युध सम्प्रहारे। युध धातु युद्ध करना अर्थ में है। अनुदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है। युध् शेष रहता है। आत्मनेपदी एवं अनिट् है। चिण् और भष्माव का विषय नहीं है।
लट्- युध्यते, युध्येते, युध्यन्ते। लिट्- युयुधे, युयुधाते, युयुधिरे। लुट्- योद्धा, योद्धारौ, योद्धारः। लृट्- योत्स्यते, योत्स्येते, योत्स्यन्ते। लोट्- युध्यताम्, युध्येताम्, युध्यन्ताम्। लङ्- अयुध्यत, अयुध्येताम्, अयुध्यन्त। विधिलिङ्- युध्येत, युध्येयाताम्, युध्येरन्। आशीर्लिङ्- युत्सीष्ट, युत्सीयास्ताम्, युत्सीरन्। लुङ्- अयुद्ध, अयुत्साताम्, अयुत्सत, अयुद्धाः, अयुत्साथाम्, अयुद्ध्वम्, अयुत्सि, अयुत्स्वहि, अयुत्स्महि। लृङ्- अयोत्स्यत, अयोत्स्येताम्, अयोत्स्यन्त।
सृज विसर्गे। सृज धातु छोड़ना अर्थ में है। तुदादिगण में पठित सृज धातु का निर्माण करना, रचना करना, सृजना करना आदि अर्थ है किन्तु दिवादिगणीय इस धातु का तो छोड़ना अर्थ ही उचित है।
लट्- सृज्यते, सृज्येते, सृज्यन्ते। लिट्- ससृजे, ससृजाते, ससृजिरे।