अनयोरुपधाया वृद्धिर्न स्याच्चिणि ज्याति कृति च।
अजनि, अजनिष्ट। दीपी दीप्तौ॥२०॥
दीप्यते। दिदीपे।
अदीपि, अदीपिष्ट। पद गतौ॥२१॥
पद्यते। पदे। पत्ता। पत्सीष्ट।
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६४३- जनिवध्योश्च। जनिश्च वधिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो जनिवधी, तयोर्जनिवध्योः। जनिवध्योः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत उपधायाः से उपधायाः, मृजेर्वृद्धिः से वृद्धिः, नोदात्तोपदेशस्य मान्तस्यानाचमेः से न, आतो युक् चिण्कृतोः से चिण्कृतोः और अचो ज्याति से ज्याति की अनुवृत्ति आती है।
चिण् के परे होने पर अथवा कृत्संज्ञक जित् या णित् के परे होने पर जन् और वध् धातुओं की उपधा की वृद्धि नहीं होती है।
अजनि, अजनिष्ट। जन् से लुङ्, अट्, त, च्लि करके उसके स्थान पर दीपजनबुधपूरितायिप्यायिभ्योऽन्यतरस्याम् से वैकल्पिक चिण् आदेश करने पर अजन्+इत बना। चिणो लुक् से त का लुक् हुआ, अजन्+इ बना। चिण् के इकार को णित् मानकर
अत उपधायाः से वृद्धि प्राप्त होने पर जनिवध्योश्च से निषेध हुआ। इस तरह अजनि सिद्ध हुआ। चिण् न होने के पक्ष में सिच् आदेश होकर उसको इट् का आगम करके अजन्+इस्+त है। इकार से पर सकार को षत्व और षकार से पर तकार को ष्टुत्व करके अजन्+इष्ट=अजनिष्ट सिद्ध हुआ। इस तरह दो रूप बने। आताम् आदि में कहीं भी चिण् नहीं होता। अतः सिच् होकर एक ही रूप बनते हैं।
लृङ्- अजनि-अजनिष्ट, अजनिषाताम्, अजनिषत, अजनिष्ठाः, अजनिषाथाम्, अजनिढ्वम्, अजनिषि, अजनिष्वहि, अजनिष्महि। लृङ्- अजनिष्यत, अजनिष्येताम् आदि।
दीपी दीप्तौ। दीपी धातु चमकना अर्थ में है। ईकार की इत्संज्ञा होती है। ईदित् होने से निष्ठासंज्ञक प्रत्यय के परे रहते श्वीदितो निष्ठायाम् से इट् का निषेध होता है, अन्यत्र इट् होता है। अनुदात्तेत् होने से आत्मनेपदी है। अन्य रूप सामान्य ही हैं, केवल लृङ् के एकवचन में दीपजनबुधपूरितायिष्यायिभ्योऽन्यतरस्याम् से चिण् होकर चिणो लुक् से त का लुक् होकर अदीपि, अदीपिष्ट ये दो रूप बनते हैं।
लट्- दीप्यते, दीप्येते, दीप्यन्ते। लिट्- दिदीपे, दिदीपाते, दिदीपिरे। लुट्- दीपिता, दीपितारौ, दीपितारः। लृट्- दीपिष्यते, दीपिष्येते, दीपिष्यन्ते। लोट्- दीप्यताम्, दीप्येताम्, दीप्यन्ताम्। लङ्- अदीप्यत, अदीप्येताम्, अदीप्यन्त। विधिलिङ्- दीप्येत, दीप्येयाताम्, दीप्येरन्। आशीर्लिङ्- दीपिषीष्ट, दीपिषीयास्ताम्, दीपिषीरन्। लुङ्- अदीपि-अदीपिष्ट, अदीपिषाताम्, अदीपिषत, अदीपिष्ठाः, अदीपिषाथाम्, अदीपिष्वम्, अदीपिषि, अदीपिष्वहि, अदीपिष्महि। लृङ्- अदीपिष्यत, अदीपिष्येताम्, अदीपिष्यन्त।
पद गतौ। पद धातु जाना अर्थ में है। अनुदात्त अकार की इत्संज्ञा होती है, पद शेष रहता है। अनुदात्तेत् होने से आत्मनेपदी और अनुदात्तों में परिगणित होने से अनिट् है। इसी धातु में उपसर्ग आदि लगकर उत्पत्तिः, सम्पत्तिः, विपत्तिः आदि रूप बनते हैं।
लट्- पद्यते, पद्येते, पद्यन्ते। लिट्- पेदे, पेदाते, पेदिरे। लुट्- पत्ता, पत्तारौ, पत्तारः। लृट्- पत्स्यते, पत्स्येते, पत्स्यन्ते। लोट्- पद्यताम्, पद्येताम्, पद्यन्ताम्। लङ्-अपद्यत, अपद्येताम्, अपद्यन्त। विधिलिङ्- पद्येत, पद्येयाताम्, पद्येरन्। आशीर्लिङ्- पत्सीष्ट, पत्सीयास्ताम्, पत्सीरन्।