एषामात्त्वं स्याल्ल्यपि चादशित्येज्निमित्ते। दाता। दास्यति।
वार्तिकम्- स्थाध्वोरित्त्वे दीडः प्रतिषेधः। अदास्त। डीड् विहायसा गतौ॥१६॥
डीयते।
डिड्ये। डयिता। पीड् पाने॥१७॥
पीयते। पेता। अपेष्ट।
माड् माने॥१८॥
मायते। ममे। जनी प्रादुर्भावे॥१९॥
.....
६३९- मीनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च। मीनातिश्च मिनोतिश्च दीङ् च तेषामितरेतरद्वन्द्वो मीनातिमिनोतिदीङः, तेषां मीनातिमिनोतिदीङाम्। मीनातिमिनोतिदीङां षष्ठ्यन्तं, ल्यपि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। आदेच उपदेशेऽशिति यह पूरा सूत्र अनुवर्तित होता है।
ल्यप् के विषय में या एच् करने में निमित्त शिद्धिन्न प्रत्यय के विषय में क्र्यादि के मीञ्, स्वादि के मिञ् और दिवादि के दीङ् धातुओं को आकार अन्तादेश होता है।
एच् करने में निमित्त का तात्पर्य यह है जिसे निमित्त मानकर धातु में गुण, वृद्धि आदि होकर एच् अर्थात् ए, ओ, ऐ, औ बन जाता हो, वह वर्ण एच् निमित्तक है। एच् का निमित्त होते हुए शित् नहीं होना चाहिए। लुट्, लृट्, आशीर्लिङ्, लुङ्, लृङ् में स्य, तास् आदि एज्निमित्तक हैं। अतः इन लकारों में आत्त्व हो जाता है। जिस लकार में श्यन् होता है, वहाँ शित् होने के कारण नहीं होता।
दाता। दी से लुट्, त, तास्, डा आदि करके दी+ता बना। ता इस आर्थधातुक को मानकर धातु के ईकार को गुण होकर एकार बनता है। अतः एज्निमित्तक है ता। उसके परे होने पर मीनातिमिनोतिदीङां ल्यपि च से धातु के ईकार के स्थान पर आकार आदेश होकर दाता सिद्ध हुआ।
लुट् में- दाता, दातारौ, दातारः, दातासे आदि। इसी तरह लृट् में- दास्यते, दास्येते, दास्यन्ते आदि। लोट्- दीयताम्, दीयेताम्, दीयन्ताम् आदि। लङ्- अदीयत, अदीयेताम्, अदीयन्त। विधिलिङ्- दीयेत, दीयेयाताम्, दीयेरन् आदि। आशीर्लिङ्- दासीष्ट, दासीयास्ताम्, दासीरन् आदि।
स्थाध्वोरित्त्वे दीङः प्रतिषेध। यह भाष्य वार्तिक है। स्थाध्वोरिच्च से होने वाला इत्त्व दीङ् धातु में नहीं होता है।
लुङ् में- अदा+स्+त बनने के बाद दा-रूप मानकर दाधा ध्वदाप् से घुसंज्ञा और स्थाध्वोरिच्च से इत्त्व प्राप्त होता है किन्तु स्थाध्वोरित्त्वे दीङः प्रतिषेधः से निषेध हो जाने से इत्व नहीं हुआ। अतः अदास्त ही रह गया। रूप- अदास्त, अदासाताम्, अदासत, अदास्थाः, अदासाथाम्, अदाध्वम्, अदासि, अदास्वहि, अदास्महि। लृङ्- अदास्यत, अदास्येताम्, अदास्यन्त आदि।
डीङ् विहायसा गतौ। डीङ् धातु आकाशमार्ग से जाना अर्थात् उड़ना अर्थ में है। डकार की इत्संज्ञा होने से आत्मनेपदी है। ऊदृदन्तैः इस कारिका में आने के कारण सेट् है।
लट्- डीयते, डीयेते, डीयन्ते आदि। उत् उपसर्ग के लगने से उड़डीयते आदि रूप बनते हैं। लिट्- डिङ्ये, डिङ्याते, डिङ्यिरे आदि। लुट्- डयिता, डयितारौ, डयितारः आदि। लृट्- डयिष्यते, डयिष्येते, डयिष्यन्ते। लोट्- डीयताम्, डीयेताम्, डीयन्ताम् आदि। लङ्- अडीयत, अडीयेताम्, अडीयन्त। विधिलिङ्- डीयेत, डीयेयाताम्, डीयेरन्। आशीर्लिङ्- डयिषीष्ट, डयिषीयास्ताम्, डयिषीरन्। लुङ्- अडयिष्ट, अडयिषाताम्, अडयिषत, अडयिष्ठाः, अडयिषाथाम्, अडयिढ्वम्-अडयिध्वम्, अडयिषि, अडयिष्वहि, अडयिष्महि। लृङ्- अडयिष्यत, अडयिष्येताम्, अडयिष्यन्त।
पीङ् पाने। पीङ् धातु पीना अर्थ में है। डित् होने से आत्मनेपदी है। अनिट् है।
लट्- पीयते, पीयेते, पीयन्ते। लिट्- पिष्ये, पिष्याते, पिष्यिरे। लुट्- पेता, पेतारौ,
पेतारः, पेतासे। लृट्- पेष्यते, पेष्येते, पेष्यन्ते। लोट्- पीयताम्, पीयेताम्, पीयन्ताम्। लङ्-
अपीयत, अपीयेताम्, अपीयन्त। विधिलिङ्- पीयेत, पीयेयाताम्, पीयेरन्। आशीर्लिङ्-
पेषीष्ट, पेषीयास्ताम्, पेषीरन्। लुङ्- अपेष्ट, अपेषाताम्, अपेषत, अपेष्ठाः, अपेषाथाम्,
अपेष्टवम्, अपेषि, अपेष्वहि, अपेष्महि। लृङ्- अपेष्यत, अपेष्येताम्, अपेष्यन्त।
माङ् माने। माङ् धातु मापना अर्थ में है। डकार की इत्संज्ञा होने से आत्मनेपदी
है। अनिट् है।
लट्- मायते, मायेते, मायन्ते। लिट् में- ममे, ममाते, ममिरे, ममिषे, ममाथे। लुट्-
माता, मातारौ, मातारः, मातासे। लृट्- मास्यते, मास्येते, मास्यन्ते। लोट्- मायताम्, मायेताम्,
मायन्ताम्। लङ्- अमायत, अमायेताम्, अमायन्त। विधिलिङ्- मायेत, मायेयाताम्, मायेरन्।
आशीर्लिङ्- मासीष्ट, मासीयास्ताम्, मासीरन्। लुङ्- अमास्त, अमासाताम्, अमासत। लृङ्-
अमास्यत, अमास्येताम्, अमास्यन्त।
जनी प्रादुर्भावे। जनी धातु उत्पन्न होना अर्थ में है। ईकार की इत्संज्ञा होती है।
इसी धातु से जन, जननी, जनक, जाति, जन्मन्, जाया आदि शब्द बनते हैं। अनुदात्त की
इत्संज्ञा होने के कारण यह आत्मनेपदी है। सेट् है।