अनयोर्जादेशः स्याच्छिति। जायते। जज्ञे। जनिता। जनिष्यते।
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६४०- ज्ञाजनोर्जा। ज्ञाश्च जन् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो ज्ञाजनौ, तयोः ज्ञाजनोः। ज्ञाजनोः षष्ठ्यन्तं,
जा लुप्तप्रथमाकं पदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। ष्ठिवुक्लमुचमां शिति से शिति की अनुवृत्ति आती
है।
शित् प्रत्यय के परे होने पर ज्ञा और जन् धातुओं के स्थान पर जा आदेश
होता है।
अनेकाल् होने के कारण सर्वादेश हो जाता है।
जायते। जन् से लट्, त, श्यन् आदि होकर जन्+यते बना है। ज्ञाजनोर्जा से जा
सर्वादेश होकर जायते बन गया। जायते, जायेते, जायन्ते। जायसे, जायेथे, जायध्वे, जाये,
जायावहे, जायामहे।
जज्ञे। लिट् में श्यन् न होने से अशित् होने के कारण जा आदेश नहीं हुआ।
द्वित्वादि होकर जजन्+ए बना है। गमहनजनखनघसां लोपः क्डित्यनडि से उपधालोप
होकर जज्+न्+ए बना। जकार से परे नकार को श्चुत्व होकर जकार हुआ, जज्ज्+ए बना।
जकार और जकार के संयोग से ज्ञ बन गया, जज्ज्+ए, वर्णसम्मेलन होकर जज्ञे सिद्ध हुआ।
लिट् के रूप- जज्ञे, जज्ञाते, जज्ञिरे, जज्ञिषे, जज्ञाथे, जज्ञिध्वे, जज्ञे, जज्ञिवहे, जज्ञिमहे।
लुट्- जनिता, जनितारौ, जनितारः। लृट्- जनिष्यते, जनिष्येते, जनिष्यन्ते। लोट्- जायताम्,
जायेताम्, जायन्ताम्, जायस्व, जायेथाम्, जायध्वम्, जायै, जायावहै, जायामहै। लङ्- अजायत,
अजायेताम्, अजायन्त, अजायथाः, अजायेथाम्, अजायध्वम्, अजाये, अजायावहि, अजायामहि।
विधिलिङ्- जायेत, जायेयाताम्, जायेरन्, जायेथाः, जायेयाथाम्, जायेध्वम्, जायेय, जायेवहि, जायेमहि। आशीर्लिङ्- जनिषीष्ट, जनिषीयास्ताम्, जनिषीरन्, जनिषीष्ठाः, जनिषीयास्थाम्, जनिषीध्वम्, जनिषीय, जनिषीवहि, जनिषीमहि।