Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 15
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VṛttiGovind
LSK 638
युटागमविधायकं विधिसूत्रम्
दीङो युडचि क्ङिति
Aṣṭādhyāyī 6.4.63
Vṛtti Varadarājācārya

दीडः परस्याजादेः विडत आर्धधातुकस्य युट्।

वार्तिकम्- वुग्युटावुवड्यणोः सिद्धौ वक्तव्यौ। दिदीये।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

षूङ् प्राणिप्रसवे। षूङ् धातु प्राणियों को पैदा करना अर्थ में है। धातु के आदि षकार के स्थान पर धात्वादेः षः सः से सकार आदेश होता है। ङकार भी इत्संज्ञक है। सू बचता है। ङकारानुबन्ध के कारण आत्मनेपदी और स्वरतिसूतिसूयतिधूञूदितो वा से वलादि में वेट् है किन्तु लिट् में श्रयुकः किति से नित्य से इट् का निषेध प्राप्त होने पर क्रादिनियम से नित्य से इट् हो जाता है।

लट्- सूयते, सूयेते, सूयन्ते, सूयसे, सूयेथे, सूयध्वे, सूये, सूयावहे, सूयामहे।

- लिट्- में ए, आते, इरे, आथे, इट् ये स्वतः ही अजादि है और से, ध्वे, वहे, महे में इट् होने के कारण अजादि है। अतः अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से उवङ् आदेश होता है। द्वितीय सकार को षत्व हो जाता है। रूप- सुषुवे, सुषुवाते, सुषुविरे, सुषुविषे, सुषुवाथे, सुषुविढ्वे-सुषुविध्वे, सुषुवे, सुषुविवहे, सुषुविमहे।

लृट्- इट् होने के पक्ष में सविता, सवितारौ, सवितारः, सवितासे आदि और इट् न होने के पक्ष में सोता, सोतारौ, सोतारः, सोतासे आदि। इसी तरह लृट् में- सविष्यते, सविष्येते, सविष्यन्ते, सोष्यते, सोष्येते, सोष्यन्ते आदि। लोट्- सूयताम्, सूयेताम्, सूयन्ताम्, सूयस्व, सूयेथाम्, सूयध्वम्, सूये, सूयावहे, सूयामहे। लङ्- असूयत, असूयेताम्, असूयन्त, असूयथाः, असूयेथाम्, असूयध्वम्, असूये, असूयावहि, असूयामहि। विधिलिङ्- सूयेत, सूयेयाताम्, सूयेरन् आदि। आशीर्लिङ्- इट् के पक्ष में- सविषीष्ट, सविषीयास्ताम्, सविषीरन्, सविषीष्ठाः, सविषीयास्थाम्, सविषीढ्वम्-सविषीध्वम्, सविषीय, सविषीवहि, सविषीमहि। इट् के अभाव में- सोषीष्ट, सोषीयास्ताम्, सोषीरन् आदि। लुङ् के इट्पक्ष में- असविष्ट, असविषाताम्, असविषत, असविष्ठाः, असविषाथाम्, असविढ्वम्-असविध्वम्, असविषि, असविष्वहि, असविष्महि। इट् न होने पर- असोष्ट, असोषाताम्, असोषत, असोष्ठाः, असोषाथाम्, असोढ्वम्, असोषि, असोष्वहि, असोष्महि। लृङ्- असविष्यत, असोष्यत।

दूङ् परितापे। दूङ् धातु परिताप अर्थात् दुःखी होना अर्थ में है। ङकार की इत्संज्ञा होने से आत्मनेपदी है और ऊदन्त होने से सेट् है।

लट्- दूयते, दूयेते, दूयन्ते आदि। लिट्- दुदुवे, दुदुवाते, दुदुविरे आदि। लृट्- दविता, दवितारौ, दवितारः, दवितासे आदि। लृट्- दविष्यते, दविष्येते, दविष्यन्ते आदि। लोट्- दूयताम्, दूयेताम्, दूयन्ताम् आदि। लङ्- अदूयत, अदूयेताम्, अदूयन्त आदि। विलिलिङ्- दूयेत, दूयेयाताम्, दूयेरन् आदि। आशीर्लिङ्- दविषीष्ट, दविषीयास्ताम्, दविषीरन् आदि। लुङ्- अदविष्ट, अदविषाताम्, अदविषत आदि। लृङ्- अदविष्यत, अदविष्येताम् आदि।

दीड् क्षये। दीड् धातु नष्ट होना अर्थ में है। यह भी डकार की इत्संज्ञा हो जाने के कारण आत्मनेपदी है और अनिट् कारिका के अनुसार अनिट् भी किन्तु लिट् में क्रादिनियम से नित्य से इट् होता है।

लट्- दूयते, दूयते, दूयन्ते आदि।

६३८- दीडो युडचि विडति। क् च ड च वडौ, तौ इतौ यस्य तत् विडत्, तस्मिन् विडति। दीडः पञ्चम्यन्तं, युट् प्रथमान्तम्, अचि सप्तम्यन्तं, विडति सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुके का अधिकार है।

दीड् से परे अजादि कित्, डित् आर्धधातुक को युट् आगम होता है।

उकार और टकार की इत्संज्ञा होकर केवल य् बचता है और टित् होने के कारण अजादि आर्धधातुक का आदि-अवयव होकर बैठता है।

वुग्युटावुवड्यणोः सिद्धौ वक्तव्यौ। यह वार्तिक है। उवड् और यण् की कर्तव्यता में वुक् और युट् को सिद्ध कहना चाहिए।

भाष्य में यह वार्तिक असिद्धवदत्राभात् सूत्र में पठित है। षष्ठाध्याय के चतुर्थपाद के बाइसवें सूत्र से पाद की समाप्ति पर्यन्त के सूत्र आभीय सूत्र कहलाते हैं और उक्त सूत्र से एक आभीय की कर्तव्यता में दूसरा आभीय असिद्ध कर दिया जाता है। इसी क्रम में दीडो युडचि विडति इस आभीय के द्वारा किया गया युट् आगम एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य इस आभीय की कर्तव्यता में असिद्ध होने से यण् की प्राप्ति होती है। इसलिए आचार्य को वार्तिक के द्वारा कहना पड़ा कि उवड् और यण् की कर्तव्यता में वुक् और युट् असिद्ध नहीं होते अर्थात् सिद्ध ही होते हैं। युट् के सिद्ध होने से अजादि न मिलने के कारण यण् और वुक् के सिद्ध होने से अजादि न मिलने से उवड् नहीं होता।

दिदीये। लिट् के तिप् में दिदी+ए बनने के बाद दीडो युडचि विडति से युट् आगम होकर दिदी+य्+ए बना। अब आभीयशास्त्र के द्वारा किया गया युट् असिद्धवदत्राभात् के नियम से आभीयशास्त्र एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य की दृष्टि में असिद्ध था तो वुग्युटावुवड्यणोः सिद्धौ वक्तव्यौ से सिद्ध हुआ अर्थात् आगे यकार दिखाई दिया। अब अजादि न मिलने के कारण यण्

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नहीं हो सका। वर्णसम्मेलन होकर दिदीये सिद्ध हुआ। लिट् के रूप- दिदीये, दिदीयाते, दिदीयिरे, दिदीयिषे, दिदीयाथे, दिदीयिढ्वे-दिदीयिध्वे, दिदीये, दिदीयिवहे, दिदीयिमहे।