नुम् स्यात्। ननंष्ठ। नेशिव, नेश्व। नेशिम, नेश्म। नशिता, नंष्टा।
नशिष्यति, नङ्क्ष्यति। नश्यतु। अनश्यत्। नश्येत्। नश्यात्। अनशत्।
षूङ् प्राणिप्रसवे॥१३॥
सूयते। सुषुवे। क्रादिनियमादिट्। सुषुविषे।
सुषुविवहे। सुषुविमहे। सविता, सोता।
दुङ् परितापे॥१४॥ दीङ् क्षये॥१५॥
दीयते।
६३७- मस्जिनशोर्झलि। मस्जिश्च नश् च तयोरितरेतरद्वन्द्वो मस्जिनशौ, तयोर्मस्जिनशोः। मस्जिनशोः षष्ठ्यन्तं, झलि सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इदितो नुम् धातोः से नुम् की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है, जिससे प्रत्ययः पद आक्षिप्त होता है और झलि से झलादि प्रत्यय यह अर्थ निकलता है।
झलादि प्रत्यय के परे होने पर मस्ज् और नश् धातुओं को नुम् आगम होता है।
ननाश। लिट्, तिप्, णल्, अ, नश् को द्वित्व, हलादिशेष होकर ननश्+अ=ननाश। तस् और झि में एत्वाभ्यासलोप होकर नेशतुः, नेशुः बनते हैं।
नेशिथ, ननंष्ठ। लिट् के सिप् में ननश्+थ बनने के बाद आर्धधातुकस्येड् वलादेः से नित्य से इट् प्राप्त था, उसे बाधकर रधादिभ्यश्च से विकल्प से इट् हुआ। इट् से युक्त थल् के परे होने पर थलि च सेटि से एत्वाभ्यासलोप हुआ- नेश्+इथ बना। वर्णसम्मेलन होकर नेशिथ सिद्ध हुआ। इट् होने पर झलादि न मिलने के कारण नुम् नहीं हुआ। इट् न होने के पक्ष में एत्वाभ्यासलोप भी प्राप्त नहीं है। अतः ननश्+थ है। मस्जिनशोर्झलि से नुम् का आगम, मित् होने के कारण अन्त्य अच् नकारोत्तरवर्ती अकार के बाद और शकार के पहले बैठा। ननश्+थ बना। नकार को नश्चापदान्तस्य झलि से अनुस्वार, शकार को व्रश्चभ्रस्जसृजमृजयजराजभ्राजच्छशां षः से षकार आदेश, षकार से परे थकार को ष्टुना ष्टुः से ष्टुत्व से ठकार आदेश होकर ननंष्ठ सिद्ध हुआ। इस तरह दो रूप बन गये- नेशिथ, ननंष्ठ।
लिट् के रूप- ननाश, नेशतुः, नेशुः, नेशिथ-ननंष्ठ, नेशथुः, नेश, ननाश-ननश, नेशिव, नेशिम। लुट् में इट्पक्ष और इट् के अभाव पक्ष में दो-दो रूप बनते हैं। नशिता, नशितारौ, नशितारः एवं नंष्टा, नंष्टारौ, नंष्टारः।
लृट् में- रधादिभ्यश्च से इट् होने के पक्ष में नशिष्यति और इट् के अभाव में नुम् का आगम होकर ननश्+स्यति बना है। नकार को अनुस्वार, शकार को षकार आदेश
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और सि के सकार के परे रहते षकार को षढोः कः सि से ककार आदेश होकर नंक्+स्यति बना। ककार से परे सकार को षत्व करके क्षसंयोगे क्षः होकर नंक्ष्यति बना। क्ष्य में विद्यमान ककार के परे होने पर अनुस्वारस्य ययि परसवर्णः से परसवर्ण होकर ङकार हुआ। इस तरह से नङ्क्ष्यति बना। इट् के पक्ष में नशिष्यति, नशिष्यतः, नशिष्यन्ति आदि। इट् न होने के पक्ष में- नङ्क्ष्यति, नङ्क्ष्यतः, नङ्क्ष्यन्ति।
लोट्- नश्यतु-नश्यतात्, नश्यताम्, नश्यन्तु आदि। लङ्- अनश्यत्, अनश्यताम्, अनश्यन् आदि। विधिलिङ्- नश्येत्, नश्येताम्, नश्येयुः। आशीर्लिङ्- झलादि न होने के कारण नुम् का आगम नहीं हुआ। नश्यात्, नश्यास्ताम्, नश्यासुः आदि। लुङ्- पुषादिद्युताद्यूनृदितः परस्मैपदेषु से च्लि के स्थान पर अङ् आदेश होकर- अनशत्, अनशताम्, अनशन्, अनशः, अनशतम्, अनशत, अनशम्, अनशाव, अनशाम। लृङ्- अनशिष्यत्, अनङ्क्ष्यत्।