शपोऽपवादः। हलि चेति दीर्घः। दीव्यति। दिदेव। देविता। देविष्यति।
दीव्यतु। अदीव्यत्। दीव्येत्। दीव्यात्। अदेवीत्। अदेविष्यत्।
एवं षिवु तन्तुसन्ताने॥२॥
नृती गात्रविक्षेपे॥३॥
नृत्यति। ननर्त। नर्तिता।
दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु॥१॥
तिङन्त का चतुर्थ प्रकरण दिवादि है। जैसे भ्वादि में धातु और प्रत्ययों के बीच में विकरण के रूप में शप्, अदादि में शप् होकर उसका लुक् और जुहोत्यादि में शप् होकर उसके स्थान पर श्लु हुए, उसी प्रकार दिवादि में शप् को बाधकर श्यन् होता है। श्यन् में नकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा तथा शकार की लशक्वतद्धिते से इत्संज्ञा और तस्य लोपः से लोप होकर केवल य बचता है। य शित् है, अतः उसकी तिङ्शित्सार्वधातुकम् से सार्वधातुकसंज्ञा होती है। सार्वधातुक होते हुए अपितु भी है, अतः इसको सार्वधातुकमपित् से ङिद्धद्भाव हो जाता है। ङित् होने से इसके परे होने पर पूर्व इक् को होने वाली गुणवृद्धि का विङति च से निषेध होता है। इसलिए श्यन् के परे होने पर पूर्व को गुण और वृद्धि दोनों ही नहीं होते। श्यन् करने के पहले भी गुणवृद्धि नहीं कर सकते, क्योंकि दिवादिभ्यः श्यन् से श्यन् और गुण-वृद्धि एक साथ प्राप्त होते हैं, श्यन् के नित्य होने के कारण पहले नित्यकार्य श्यन् ही हो जाता है। एक परिभाषा है- परनित्यान्तरङ्गापवादानामुत्तरोत्तरं बलीयः, अर्थात् पूर्वसूत्र से परसूत्र बलवान् होता है, पर से नित्य, नित्य से अन्तरङ्ग और अन्तरङ्ग से अपवादसूत्र। तुलना में जो सूत्र बलवान् होता है, वही पहले लगता है। यहाँ पर नित्य का तात्पर्य नित्य से कार्य करना नहीं है अपितु कृताकृतप्रसङ्गी नित्यः, अर्थात् अन्य सूत्र से किसी काम के कर दिए जाने के बाद भी लगे और कार्य न किए जाने पर भी लगे, उसे नित्य कहा गया है। श्यन् करने वाला सूत्र गुण-वृद्धि के होने पर भी लगेगा और न हुए हों तब भी लगेगा। अतः श्यन् नित्य है, फलतः गुण-वृद्धि के पहले ही लगता है।
दिवु क्रीडाविजिगीषाव्यवहारद्युतिस्तुतिमोदमदस्वप्नकान्तिगतिषु। दिवु धातु में उकार की इत्संज्ञा हो जाती है, दिव् ही बचता है। आत्मनेपद-निमित्तक न होने से परस्मैपदी
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है। इसके अनेक अर्थ हैं। जैसे- क्रीड़ा=खेलना, विजिगीषा=जीतने की इच्छा करना, व्यवहार= क्रय-विक्रय रूप व्यवहार करना, द्युति=चमकना, स्तुति=स्तुति करना, मोद=प्रसन्न होना, मद=मदमत्त होना, स्वप्न=सोना, कान्ति=इच्छा करना और गति=गमन करना। प्रसंग के अनुसार अर्थ किये जाते हैं।
३३०- दिवादिभ्यः श्यन्। दिव् आदिर्येषां ते दिवादयः, तेभ्यो दिवादिभ्यः। दिवादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, श्यन् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में कर्तरि शप् से कर्तरि और सार्वधातुके यक् से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।
कर्ता अर्थ में हुए सार्वधातुक प्रत्यय के परे होने पर दिवादिगण में पढ़े गये धातुओं से परे श्यन् प्रत्यय होता है।
यह सूत्र कर्तरि शप् का अपवाद है।
दीव्यति। दिव् धातु से लट्, तिप्, सार्वधातुकसंज्ञा, शप् प्राप्त, उसे बाधकर दिवादिभ्यः श्यन् से श्यन्, शकार और नकार का लोप, दिव्+य+ति बना। दिव् में इकार की अलोऽन्त्यात्पूर्व उपधा से उपधासंज्ञा हुई और उसको हलि च से दीर्घ हुआ- दीव्+य+ति बना, वर्णसम्मेलन हुआ- दीव्यति।
लट् के रूप- दीव्यति, दीव्यतः, दीव्यन्ति, दीव्यसि, दीव्यथः, दीव्यथ, दीव्यामि, दीव्यावः, दीव्यामः।
लिट्-लकार में कोई विशेषता नहीं है। धातु सेट् अर्थात् इट् होने के योग्य है, अतः वलादि-आर्धधातुक के परे होने पर इट् आगम हो जाता है। पित् प्रत्ययों में लघूपधगुण होता है किन्तु अपितों में असंयोगाल्लिट् कित् से कित्व होने के कारण किङ्ति च से उसका निषेध होता है। प्रक्रिया का दिग्दर्शन मात्र देखें- दिव् लिट्, दिव् तिप्, दिव् णल्, दिव् अ, दिव् दिव् अ, दि दिव् अ, दि देव् अ, दिदेव। अपितु में गुण नहीं होगा- दिदिवतुः, दिदिवुः आदि।
लिट् के रूप- दिदेव, दिदिवतुः, दिदिवुः। दिदेविथ, दिदिवथुः, दिदिव। दिदेव, दिदिविव, दिदिविम।
लुट् में दिव् लुट्, दिव् ति, दिव् तास् ति, दिव् इ तास् ति, देव् इ तास् ति, देव् इ तास् डा, देव् इ त् आ, वर्णसम्मेलन देविता सिद्ध हुआ। हल् परे न होने के कारण हलि च से दीर्घ नहीं हुआ। इस तरह रूप बनते हैं- देविता, देवितारौ, देवितारः। देवितासि, देवितास्थः, देवितास्थ। देवितास्मि, देवितास्वः, देवितास्मः।
लृट् में- देविष्यति, देविष्यतः, देविष्यन्ति। देविष्यसि, देविष्यथः, देविष्यथ। देविष्यामि, देविष्यावः, देविष्यामः।
लोट् में- लट् की तरह श्यन्, हलि च से दीर्घ होकर सिद्ध होते हैं- दीव्यतु-दीव्यतात्, दीव्यताम्, दीव्यन्तु। दीव्य-दीव्यतात्, दीव्यतम्, दीव्यत। दीव्यानि, दीव्याव, दीव्याम।
लङ् में- अट्, श्यन्, दीर्घ करके रूप बनाइये- अदीव्यत्, अदीव्यताम्, अदीव्यन्। अदीव्यः, अदीव्यतम्, अदीव्यत। अदीव्यम्, अदीव्याव, अदीव्याम।
विधिलिङ् में- श्यन् होकर भ्वादिगण की तरह यासुट्, लिङ् सलोपोऽनन्त्यस्य से प्राप्त सलोप को बाधकर अतो येयः से इय् आदेश, यकारलोप आदि कार्य होते हैं। दीव्येत्, दीव्येताम्, दीव्येयुः। दीव्येः, दीव्येतम्, दीव्येत। दीव्येयम्, दीव्येव, दीव्येम।
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आशीर्लिङ् में- यासुद् के कित् होने के कारण लघूपधगुण निषिद्ध हो जाता है। केवल हलि च से उपधादीर्घ होकर बनते हैं- दीव्यात्, दीव्यास्ताम्, दीव्यासुः। दीव्याः, दीव्यास्तम्, दीव्यास्त। दीव्यासम्, दीव्यास्व, दीव्यास्म।
लुङ् लकार में भ्वादिगणीय असेधीत् की तरह रूप बनाइये- अदेवीत्, अदेविष्टाम्, अदेविषुः। अदेवीः, अदेविष्टम्, अदेविष्ट। अदेविषम्, अदेविष्व, अदेविष्म।
लृङ् में- अदेविष्यत्, अदेविष्यताम्, अदेविष्यन्। अदेविष्यः, अदेविष्यतम्, अदेविष्यत। अदेविष्यम्, अदेविष्याव, अदेविष्याम।
षिवु धातु तन्तुसन्ताने- धागे का विस्तार करना अर्थात् सीना अर्थ में है। उकार की इत्संज्ञा और लोप होता है। धात्वादेः षः सः से षकार के स्थान पर सकार आदेश होकर सिव् बन जाता है। इसके बाद की पूरी प्रक्रिया दिव् धातु की तरह ही होती है।
लट् के रूप- सीव्यति, सीव्यतः, सीव्यन्ति। सीव्यसि, सीव्यथः, सीव्यथ। सीव्यामि, सीव्यावः, सीव्यामः।
लिट् में द्वित्व आदि करके सिसिव् अ के बाद द्वितीय सि के सकार को आदेशप्रत्यययोः से षत्व होता है और पित् में उपधागुण और अपित् में निषेध होकर निम्नलिखित रूप सिद्ध होते हैं- सिषेव, सिषिवतुः, सिषिवुः। सिषेविथ, सिषिवथुः, सिषिव। सिषेव, सिषिविव, सिषिविम।
लृट् में- सेविता, सेवितारौ, सेवितारः। सेवितासि, सेवितास्थः, सेवितास्थ। सेवितास्मि, सेवितास्वः, सेवितास्मः। लृट् में- सेविष्यति, सेविष्यतः, सेविष्यन्ति। सेविष्यसि, सेविष्यथः, सेविष्यथ। सेविष्यामि, सेविष्यावः, सेविष्यामः। लोट् में- सीव्यतु-सीव्यतात्, सीव्यताम्, सीव्यन्तु। सीव्य-सीव्यतात्, सीव्यतम्, सीव्यत। सीव्यानि, सीव्याव, सीव्याम। लृङ् में- असीव्यत्, असीव्यताम्, असीव्यन्। असीव्यः, असीव्यतम्, असीव्यत। असीव्यम्, असीव्याव, असीव्याम। विधिलिङ् में- सीव्येत्, सीव्येताम्, सीव्येयुः। सीव्येः, सीव्येतम्, सीव्येत। सीव्येयम्, सीव्येव, सीव्येम। आशीर्लिङ् में- सीव्यात्, सीव्यास्ताम्, सीव्यासुः। सीव्याः, सीव्यास्तम्, सीव्यास्त। सीव्यासम्, सीव्यास्व, सीव्यास्म। लृङ् में- असेवीत्, असेविष्टाम्, असेविषुः। असेवीः, असेविष्टम्, असेविष्ट। असेविषम्, असेविष्व, असेविष्म। लृङ् में- असेविष्यत्, असेविष्यताम्, असेविष्यन्। असेविष्यः, असेविष्यतम्, असेविष्यत। असेविष्यम्, असेविष्याव, असेविष्याम।
नृती गात्रविक्षेपे। नृती धातु गात्रविक्षेप अर्थात् नाचना अर्थ में है। ईकार की इत्संज्ञा होती है। नृत् शेष रहता है। गुण होने पर नर्त् और श्यन् होने पर नृत्य बन जाता है।
नृत् के लट् में रूप- नृत्यति, नृत्यतः, नृत्यन्ति। नृत्यसि, नृत्यथः, नृत्यथ। नृत्यामि, नृत्यावः, नृत्यामः।
लिट् लकार में- नृत् तिप्, उसके स्थान पर णल् आदेश करके अनुबन्धलोप करने पर नृत्+अ बना। द्वित्व करने पर नृत् नृत् अ बना। नृ नृत् मे उरत् से अर् होने पर नर् नृत् अ बना। हलादिशेष होकर न नृत् अ बनने के बाद पुगन्तलघूपधस्य च से उपधाभूत नृ के ऋकार के स्थान पर रपर सहित गुण होकर न नर्त् अ बना, वर्णसम्मेलन होकर ननर्त् सिद्ध हुआ।
यह गुण केवल तिप्, सिप् और मिप् में होगा क्योंकि शेष में तो असंयोगाल्लिट् कित् से किद्वद्भाव होकर विङ्ति च से गुण का निषेध हो जाता है। इसलिए ननृत्+अतुस्
आदि में वर्णसम्मेलन होकर निम्नलिखित रूप सिद्ध हो जाते हैं- ननर्त, ननृततुः, ननृतुः।
ननर्तिथ, ननृतथुः ननृत। ननर्त, ननृतिव, ननृतिम।
लृट् में- नर्तिता, नर्तितारौ, नर्तितारः। नर्तितासि, नर्तितास्थः, नर्तितास्थ। नर्तितास्मि,
नर्तितास्वः, नर्तितास्मः।