Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 629
अङो विकल्पार्थं विधिसूत्रम्
इरितो वा
Aṣṭādhyāyī 3.1.57
Vṛtti Varadarājācārya

इरितो धातोश्च्लेरङ् वा परस्मैपदेषु।

अनिजत्, अनैक्षीत्। अनिक्त। अनेक्ष्यत्, अनेक्ष्यत।

इति जुहोत्यादयः॥१४॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६२९- इरितो वा। इर् इत् यस्य स इरित्, तस्माद् इरितः। इरितः पञ्चम्यन्तं, वा अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। धातोरेकाचो हलादेः क्रियासमभिहारे यङ् से धातोः, च्लेः सिच् से च्लेः, अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ् से अङ् और पुषादिद्युताद्यलृदितः परस्मैपदेषु से परस्मैपदेषु की अनुवृत्ति आती है। जिस धातु में इर् की इत्संज्ञा हुई हो वह इरित् धातु कहलाता है।

इरित् धातु से परे च्लि के स्थान पर विकल्प से अङ् आदेश हो जाता है परस्मैपद परे होने पर।

णिजिर् में इर् की इत्संज्ञा होकर निज् बना है। अतः इससे लुङ् में विकल्प से अङ् होता है।

अनिजत्, अनैक्षीत्। लुङ् के तिप् में अनिज्+च्लि+त् बना है। च्लि के स्थान पर सिच् आदेश प्राप्त था। उसे बाधकर के इरितो वा से वैकल्पिक अङ् आदेश हुआ। अनिज्+अत्, वर्णसम्मेलन होकर अनिजत् बना। अङ् न होने के पक्ष में सिच् होकर अनिज्+स्+ईत् है। वदव्रजहलन्तस्याचः से नि के इकार की वृद्धि, जकार को कुत्व, गकार को चर्त्व, सकार को षत्व, क्षत्व करके अनैक्षीत् बन जाता है। आत्मनेपद में लिङ्सिचावात्मनेपदेषु से सिच् को कित् होकर गुण का निषेध और झलो झलि से झल् परे होने पर सिच् के सकार का लोप होता है, अन्यत्र नहीं। आत्मनेपद में अङ् प्राप्त ही नहीं है।

लुङ् के रूप- परस्मैपद में अङ्पक्ष में- अनिजत्, अनिजताम्, अनिजन्, अनिजः, अनिजतम्, अनिजत, अनिजम्, अनिजाव, अनिजाम। अङ् न होने पर- अनैक्षीत्, अनैक्ताम्, अनैक्षुः, अनैक्षीः, अनैक्तम्, अनैक्त, अनैक्षम्, अनैक्ष्व, अनैक्ष्म। आत्मनेपद में- अनिक्त, अनिक्षाताम्, अनिक्षत, अनिक्थाः, अनिक्षाथाम्, अनिग्ध्वम्, अनिक्षि, अनिक्ष्वहि, अनिक्ष्महि। लृङ्- अनेक्ष्यत्, अनेक्ष्यत।

परीक्षा

द्रष्टव्यः- सभी प्रश्न अनिवार्य हैं और उनके अंक भी दिये गये हैं।

१- अपनी पुस्तिका में हु धातु के सारे रूप लिखें।

२- हु धातु के लिट् के सभी रूपों की सिद्धि करें।

१५

३- हु धातु के लुङ् के सभी रूपों की सिद्धि करें।

१५

४- हा-धातु के सभी रूप उतारें

५- भीह्नीभृहुवां श्लुवच्च की व्याख्या करें।

६- ई हल्यघोः और श्नाभ्यस्तयोरातः में बाध्यबाधकभाव स्पष्ट करें।

७- अदादि और जुहोत्यादि का अन्तर करके एक पेज का लेख लिखें।

१०

८- भृजामित् के अभाव में तीनों धातुओं के कैसे रूप बनते? स्पष्ट करें

९- जुह्वति में यदि हुश्नुवोः सार्वधातुके न लगता तो क्या रूप बनता?

१०- इरितो वा की पूर्ण व्याख्या करें।

११- जुहोत्यादिगणीय सभी धातुओं के लिट् लकार के रूप लिखें।

२५

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में

गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का

जुहोत्यादिप्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ दिवादयः