Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 628
गुणनिषेधकं विधिसूत्रम्
नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके
Aṣṭādhyāyī 7.3.87
Vṛtti Varadarājācārya

लघूपधगुणो न स्यात्। नेनिजानि। नेनिक्ताम्। अनेनेक्। अनेनिक्ताम्।

अनेनिजुः। अनेनिजम्। अनेनिक्त। नेनिज्यात्। नेनिजीत। निज्यात्। निक्षीष्ट।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अजादि पित् सार्वधातुक के परे होने पर अभ्यस्त को लघूपधगुण नहीं होता। लोट् में लृट् की तरह ही कार्य होने के बाद लोट् के विशेष कार्य करके नेनेक्तु-नेनिक्तात्, नेनिक्ताम् आदि रूप बनते हैं किन्तु हि के अपित् होने के कारण ङित् हो जाता है, अतः गुण का निषेध हो जाता है और हुझल्भ्यो हेर्धिः से हि के स्थान पर धि आदेश करके जकार को कुत्व करके नेनिग्धि बन जाता है। उत्तमपुरुष के एकवचन में नेनिज्+आनि बनने के बाद लघूपधगुण प्राप्त था, उसका नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से निषेध हो जाता है, जिससे नेनिजानि बन जाता है। आत्मनेपद के उत्तमपुरुष में भी इसी सूत्र से लघूपधगुण का निषेध किया जाता है और अन्यत्र ङित्त्व के कारण स्वतः निषेध होता है। लोट् ( परस्मैपद ) के रूप- नेनेक्तु, नेनिक्तात्, नेनिक्ताम्, नेनिजतु, नेनिग्धि-नेनिक्तात्, नेनिक्तम्, नेनिक्त, नेनिजानि, नेनिजाव, नेनिजाम। ( आत्मनेपद ) नेनिक्ताम्, नेनिजाताम्, नेनिज्ताम्, नेनिक्ष्व, नेनिजाथाम्, नेनिग्ध्वम्, नेनिजै, नेनिजावहै, नेनिजामहै।

लङ् के तिप् में अनेनिज्+त् बनने के बाद लघूपधगुण, तकार का हल्ड्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप, जकार को चोः कुः से कुत्व करके गकार, उसको वावसाने से चर्त्व करके ककार करके अनेनेक्, अनेनेग् ये दो रूप बनते हैं। सिप् में भी यही रूप बनते हैं। झि को सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च से जुस् आदेश होकर अनेनिजुः बनता है। मिप् में अमादेश होने के बाद नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से गुणनिषेध होकर अनेनिजम् बनता है। आत्मनेपद में ङित्त्व के कारण सर्वत्र गुणनिषेध होता है।

लङ्- ( परस्मैपद ) अनेनेक्-अनेनेग्, अनेनिक्ताम्, अनेनिजुः, अनेनेक्-अनेनेग्, अनेनिक्तम्, अनेनिक्त, अनेनिजम्, अनेनिज्व, अनेनिज्म। ( आत्मनेपद ) अनेनिक्त, अनेनिजाताम्, अनेनिजत, अनेनिक्थाः, अनेनिजाथाम्, अनेनिग्ध्वम्, अनेनिजि, अनेनिज्वहि, अनेनिज्महि।

विधिलिङ्- परस्मैपद में- यासुट् के ङित् होने के कारण लघूपधगुण नहीं होता और आत्मनेपद में तो त, आताम् सभी ङित् हैं ही। ( परस्मैपद ) नेनिज्यात्, नेनिज्याताम्, नेनिज्युः आदि। ( आत्मनेपद ) नेनिजीत, नेनिजीयाताम्, नेनिजीरन्, नेनिजीथाः आदि।

आशीर्लिङ् में यासुट् के कित् होने से लघूपधगुण का निषेध और आत्मनेपद में लिङ्सिद्धावात्मनेपदेषु से झलादि लिङ् के कित् हो जाने के कारण गुण का निषेध हो जाता है। रूप- निज्यात्, निज्यास्ताम् निज्यासुः आदि। आत्मनेपद में- निक्षीष्ट, निक्षीयास्ताम्, निक्षीरन् आदि।