Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 627
गुणविधायकं विधिसूत्रम्
निजां त्रयाणां गुणः श्लौ
Aṣṭādhyāyī 7.4.75
Vṛtti Varadarājācārya

णिजिर् शौचपोषणयोः॥११॥

वार्तिकम्- इर इत्संज्ञा वाच्या।

.....

णिज्-विज्-विषामभ्यासस्य गुणः स्यात् श्लौ। नेनेक्ति। नेनिक्तः। नेनिजति।

नेनिक्ते। निनेज, निनिजे। नेक्ता। नेक्ष्यति, नेक्ष्यते। नेनेक्तु। नेनिग्धि।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

णिजिर् शौचपोषणयोः। णिजिर् धातु शुद्ध होना और पोषण करना अर्थों में

है। इसमें इर् की अग्रिम वार्तिक से इत्संज्ञा होती है। आदि णकार के स्थान पर णो नः से नकार आदेश होता है। निज् से लट् आदि होते हैं। स्वरितेत् होने से उभयपदी है। अनुदात्त धातुओं की कोटि में आता है।

इर इत्संज्ञा वाच्या। यह वार्तिक है। धातुओं में विद्यमान इर् की इत्संज्ञा होती है।

यद्यपि हलन्त्यम् से रेफ की और उपदेशेऽजनुनासिक इत् से इकार की इत्संज्ञा करने पर भी काम चल सकता था फिर भी ऐसा नहीं किया गया, क्योंकि ऐसा करने पर धातु इदित् हो जाता और इदितो नुम् धातोः से नुम् होने का प्रसंग बन जाता। उसे रोकने के लिए सीधे इर् इस समुदाय की इत्संज्ञा की गई। अतः इदित् भी नहीं माना गया। दूसरी बात यह भी है कि इरित् धातुओं के सम्बन्ध में इरितो वा आदि सूत्रों की प्रसक्ति भी होती है।

६२७- णिजां त्रयाणां गुणः श्लौ। णिजां षष्ठ्यन्तं, त्रयाणां षष्ठ्यन्तं, गुणः प्रथमान्तं, श्लौ सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।

णिज्, विज् और विष् इन तीन धातुओं के अभ्यास को गुण होता है, श्लु के परे होने पर।

इको गुणवृद्धी की उपस्थिति से इक् को ही गुण होता है।

नेनेक्ति। निज् से लट्, तिप्, शप्, श्लु करके द्वित्व, अभ्यासंज्ञा, हलादिशेष करके निनिज्+ति बना। अभ्याससंज्ञक नि के इकार को णिजां त्रयाणां गुणः श्लौ से गुण और अनभ्यास में लघूपधगुण होकर नेनेज्+ति बना। जकार को चोः कुः से कुत्व करके गकार और गकार को खरि च से चर्त्व होने पर नेनेक्ति सिद्ध हुआ। इस तरह श्लु में सर्वत्र उक्त सूत्र से गुण होता है किन्तु अपितु में डित् होने का कारण लघूपधगुण नहीं हो पाता।

लट् ( परस्मैपद )- नेनेक्ति, नेनिक्तः, नेनिजति, नेनेक्षि, नेनिक्थः, नेनिक्थ, नेनेज्मि, नेनिज्वः, नेनिज्मः। ( आत्मनेपद ) नेनिक्ते, नेनिजाते, नेनिजते, नेनिक्षे, नेनिजाथे, नेनिग्ध्वे, नेनिजे, नेनिज्वहे, नेनिज्महे।

लिट् में शप्-श्लु आदि नहीं होते। अतः अभ्यास का गुण भी नहीं होता। ( परस्मैपद ) निनेज, निनिजतुः, निनिजुः, निनेजिथः, निनिजथुः, निनिज, निनेज, निनिजिव, निनिजिम। ( आत्मनेपद ) निनिजे, निनिजाते, निनिजिरे, निनिजिषे, निनिजाथे, निनिजिध्वे, निनिजे, निनिजिवहे, निनिजिमहे। लुट्- नेक्ता, नेक्तारौ, नेक्तारः, नेक्तासि, नेक्तासे।

लृट् में जकार को कुत्व होकर गकार और गकार को चर्त्व होकर ककार करके ककार से परे स्य के सकार को षत्व और क् और ष् के संयोग में क्षु होता है। नेक्ष्यति, नेक्ष्यते। ६२८- नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके। न अव्ययपदम्, अभ्यस्तस्य षष्ठ्यन्तम्, अचि सप्तम्यन्तं, पिति सप्तम्यन्तं, सार्वधातुके सप्तम्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। पुगन्तलघूपधस्य च से लघूपधस्य और मिदेर्गुणः से गुणः की अनुवृत्ति आती है।