द्विरुक्तस्य झषन्तस्य धाञो बशो भष् स्यात्तथोः स्ध्वोश्च परतः।
धत्तः। दधति। दधासि। धत्थः। धत्थ। धत्ते। दधाते। दधते। धत्से।
धद्ध्वे। ध्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च। धेहि। अदधात्, अधत्त। दध्यात्,
दधीत। धेयात्, धासीष्ट। अधात्। अधित। अधास्यत्। अधास्यत।
डुधाञ् धारणपोषणयोः। डुधाञ् धातु धारण करना और पोषण करना अर्थों में है। डु और ञ् की इत्संज्ञा होती है, धा शेष रहता है। ञित् होने से उभयपदी है। अनिद् है। धा-रूप होने से घुसंज्ञक भी है। श्लु होने पर द्वित्व आदि होकर दधस्तथोश्च से त, थ, स् और ध्व के परे होने पर अभ्यास के दकार को भष् करके धकार हो जाता है। शेष प्रक्रिया लगभग दा धातु की तरह ही है।
दधाति। दा धातु ददाति की तरह दधाति बन जाता है किन्तु अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर धा के स्थान पर दकार भी होता है।
६२६- दधस्तथोश्च। तश्च थ् च तथौ। तकारादकार उच्चारणार्थः। तयोः तथोः। दधः षष्ठ्यन्तं, तथोः सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। एकाचो बश् भष् झषन्तस्य स्ध्वोः से एकाचः को छोड़कर सभी पद अनुवृत्त होते हैं।
तकार, थकार, सकार और ध्व के परे होने पर द्वित्व किये गये झषन्त धाञ् धातु के बश् के स्थान पर भष् आदेश होता है।
द्वित्व के बाद धाञ्, उसका झषन्त होना, उससे परे तकार, थकार, सकार और ध्व का होना इस सूत्र की प्रवृत्ति में कारण है।
धत्तः। धा+तस् के बाद शप्, श्लु, द्वित्व और अभ्यास को ह्रस्व करके ध+धा+तस् बना। अभ्यास के धकार के स्थान पर अभ्यासे चर्च से जश् करके दधा+तस् बना। श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार के लोप होने पर दध्+तस् बना। अब झपन्त मिलने के कारण अभ्यास के दकार के स्थान पर दधस्तथोश्च से भष् आदेश होकर धकार हुआ, धध्+तस् बना। द्वितीय धकार को जश्त्व करके खरि च से चर्त्व करने पर तकार हुआ- धत्+तस् बना। वर्णसम्मेलन होकर सकार का रुत्वविसर्ग करने पर धत्तः सिद्ध हुआ। इसी तरह की ही प्रक्रिया प्रायः धकार, सकार आदि के परे रहने पर भी होती है। आकार के लोप न होने की स्थिति में झपन्त नहीं मिलता, अतः तकारादि के परे होने पर भी भष् आदेश नहीं होता।
लट् के रूप- ( परस्मैपद ) दधाति, धत्तः, दधति, दधासि, धत्थः, धत्थ, दधामि, दध्वः, दध्मः। ( आत्मनेपद ) धत्ते, दधाते, दधते, धत्से, दधाथे, धद्ध्वे, दधे, दध्वहे, दध्महे।
लिट् के परस्मैपद में पा-धातु की तरह ही रूप बनते हैं। आत्मनेपद में आतो लोप इटि च से आकार का लोप होता है। ( परस्मैपद ) दधौ, दधतुः, दधुः, दधिथ-दधाथ, दधथुः, दध, दधौ, दधिव, दधिम। ( आत्मनेपद ) दधे, दधाते, दधिरे, दधिपे, दधाथे, दधिध्वे, दधे, दधिवहे, दधिमहे। लृट्- धाता, धातारौ, धातारः, धातासि। धातासे, धातासाथे, धाताध्वे आदि। लृट्- धास्यति, धास्यतः, धास्यन्ति। धास्यते, धास्यते, धास्यन्ते आदि। लोट्- ( परस्मैपद ) दधातु-धत्तात्, धत्ताम्, दधतु, धेहि-धत्तात्, धत्तम्, धत्त, दधानि, दधाव, दधाम। ( आत्मनेपद ) धत्ताम्, दधाताम्, दधताम्, धत्स्व, दधाथाम्, धद्ध्वम्, दधै, दधावहै, दधामहै। लङ्- ( परस्मैपद ) अदधात्, अधत्ताम्, अदधुः, अदधाः, अधत्तम्, अधत्त, अदधाम्, अधद्व, अधद्य। ( आत्मनेपद ) अधत्त, अदधाताम्, अदधत, अधत्थाः, अदधाथाम्, अधद्ध्वम्, अदधि, अदध्वहि, अदध्महि। विधिलिङ्- ( परस्मैपद ) दध्यात्, दध्याताम्, दध्युः, दध्याः, दध्यातम्, दध्यात, दध्याम्, दध्याव, दध्याम। ( आत्मनेपद ) दधीत, दधीयाताम्, दधीरन्, दधीथाः, दधीयाथाम्, दधीध्वम्, दधीय, दधीवहि, दधीमहि।
आशीर्लिङ् में यासुट् के आर्धधातुक कित् होने के कारण एर्लिङि से घुसंज्ञक दा के आकार के स्थान पर एकार आदेश होकर धेयात् आदि रूप बनते हैं। ( परस्मैपद ) धेयात्, धेयास्ताम्, धेयासुः, धेयाः, धेयास्तम्, धेयास्त, धेयासम्, धेयास्व, धेयास्म। ( आत्मनेपद ) धासीष्ट, धासीयास्ताम्, धासीरन्, धासीष्ठाः, धासीयास्थाम्, धासीध्वम्, धासीय, धासीवहि, धासीमहि।
अधात्। अधित। परस्मैपद में अधा+स्+त् बना है। घुसंज्ञक होने के कारण गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु से सिच् का लुक् होता है जिससे अधात् सिद्ध हो जाता है। झि में आतः से झि के स्थान पर जुस् आदेश और उस्यपदान्तात् से पररूप होकर अधुः बनता है। आत्मनेपद में अधा+स्+त होने के बाद स्थाध्वोरिच्च से धा के आकार को इकार और सिच् को किद्वद्भाव कर दिए जाने के बाद सिच् को निमित्त मान कर होने वाले गुण का निषेध करके ह्रस्वादङ्गात् से सकार का लोप करने पर अधित बन जाता है। जहाँ पर झल् परे न हो वहाँ सकार का लोप नहीं होता।
लुङ्- ( परस्मैपद ) अधात्, अधाताम्, अधुः, अधाः, अधातम्, अधात, अधाम्, अधाव, अधाम। ( आत्मनेपद ) अधित, अधिषाताम्, अधिषत, अधिथाः, अधिषाथाम्, अधिद्वम्, अधिषि, अधिष्वहि, अधिष्महि। लृङ्- अधास्यत्, अधास्यत।