अनयोरिदन्तादेशः सिच्च कित्स्यादात्मनेपदे।
अदित।
अदास्यत्, अदास्यत। डुधाञ् धारणपोषणयोः॥१०॥
दधाति।
६२५- स्थाघ्वोरिच्च। स्थाश्च घुश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः स्थाघू, तयोः स्थाघ्वोः। स्थाघ्वोः षष्ठ्यन्तम्, इत् प्रथमान्तं, च अव्ययपदं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। हनः सिच् से सिच्, असंयोगाल्लिट्
कित् से कित् और लिङ्सिचावात्मनेपदेषु से आत्मनेपदेषु की अनुवृत्ति आती है।
अलोऽन्त्यस्य की भी उपस्थिति होती है।
स्था तथा घुसंज्ञक धातुओं के अन्य अल् के स्थान पर ह्रस्व इकार आदेश होता है तथा सिच् को किद्वद्भाव होता है आत्मनेपद के परे होने पर।
अदात्। अदित। परस्मैपद में अदा+स्+त् बना है। घुसंज्ञक होने के कारण गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु से सिच् का लुक् होता है जिससे अदात् सिद्ध हो जाता है। झि में आतः से झि के स्थान पर जुस् आदेश और उस्यपदान्तात् से पररूप होकर अदुः बनता है। आत्मनेपद में अदा+स्+त् होने के बाद स्थाध्वोरिच्च से दा के आकार को इकार और सिच् को किद्वद्भाव कर दिए जाने के बाद सिच् को निमित्त मान कर होने वाले गुण का निषेध करके ह्रस्वादङ्गात् से सकार का लोप करने पर अदित बन जाता है। जहाँ पर झल् परे न हो वहाँ सकार का लोप नहीं होता।
लुङ्-( परस्मैपद ) अदात्, अदाताम्, अदुः, अदाः, अदातम्, अदात, अदाम्, अदाव, अदाम। ( आत्मनेपद ) अदित, अदिषाताम्, अदिषत, अदिथाः, अदिषाथाम्, अदिद्वम्, अदिषि, अदिष्वहि, अदिष्महि। लृङ्- अदास्यत्, अदास्यत।