दारूपा धारूपाश्च धातवो घुसंज्ञाः स्युर्दाप्दैपौ विना। ध्वसोरित्येत्वम्।
देहि। दत्तम्। अददात्, अदत्त। दद्यात्, ददीत। देयात्, दासीष्ट। अदात्।
अदाताम्, अदुः।
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६२४- दाधा घ्वदाप्। दाश्च दाश्च दाश्च तेषामेकशेषो दाः, धाश्च धाश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वो धौ, दाश्च धौ च तेषामितरेतरद्वन्द्वो दाधाः। न दाप्, अदाप्। दाधाः प्रथमान्तं, घु लुप्तप्रथमाकम्, अदाप् प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्।
दा-रूप वाले तथा धा-रूप वाले धातुओं की घुसंज्ञा होती है दाप् और दैप् को छोड़कर।
जो धातु स्वयं दा एवं धा के रूप में हों या आदेश आदि होकर दा एवं धा के रूप में आ जाती हों, ऐसी धातुओं की घुसंज्ञा की जाती है। कुछ धातु स्वतः दा एवं धा रूप वाली हैं और कुछ धातुओं में लोप, आदेश आदि होकर दा एवं धा के रूप में आ जाते हैं। उन सभी का यहाँ पर ग्रहण है किन्तु दाप् धातु में पकार के लोप तथा दैप् धातु में पकार के लोप एवं आदेच उपदेशेऽशिति से आत्व होकर दा के रूप में आने वाले
इन दो धातुओं की घुसंज्ञा नहीं होती। घुसंज्ञा के अनेक प्रयोजन हैं, जैसे- घुमास्थागापाजहातिसां हलि, घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च, एर्लिङि, गातिस्थाघुपाभूभ्यः सिचः परस्मैपदेषु, स्थाघ्वोरिच्च, ई हल्यघोः आदि। यह दा धातु इस सूत्र से घुसंज्ञक है।
देहि, दत्तात्। दा से लोट, सिप्, शप्, श्लु, द्वित्व, अभ्यास को ह्रस्व करके ददा+सि बना है। सि के स्थान पर सेर्ह्यपिच्च से हि आदेश करके ददा+हि बना। घुसंज्ञक होने के कारण घ्वसोरेद्धावभ्यासलोपश्च से घु के आकार को एत्व और अभ्याससंज्ञक द का लोप होकर देहि सिद्ध हुआ। हि के स्थान पर तातङ् होने के पक्ष में श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार का लोप होकर दत्तात् बनता है। शेष रूप सरल ही हैं।
लोट्-( परस्मैपद ) ददातु-दत्तात्, दत्ताम्, ददतु, देहि-दत्तात्, दत्तम्, दत्त, ददानि, ददाव, ददाम। ( आत्मनेपद ) दत्ताम्, ददाताम्, ददताम्, दत्स्व, ददाथाम्, दद्ध्वम्, ददै, ददावहै, ददामहै। लङ्- ( परस्मैपद ) अददात्, अदत्ताम्, अददुः, अददाः, अदत्तम्, अदत्त, अददाम्, अदद्व, अदद्म। ( आत्मनेपद ) अदत्त, अददाताम्, अददत, अदत्थाः, अददाथाम्, अदद्ध्वम्, अददि, अदद्वहि, अदद्महि। विधिलिङ्- ( परस्मैपद ) दद्यात्, दद्याताम्, दद्युः, दद्याः, दद्यातम्, दद्यात, दद्याम्, दद्याव, दद्याम। ( आत्मनेपद ) ददीत, ददीयाताम्, ददीरन्, ददीथाः, ददीयाथाम्, ददीध्वम्, ददीय, ददीवहि, ददीमहि।
आशीर्लिङ् में यासुट् के आर्धधातुक कित् होने के कारण एर्लिङि से घुसंज्ञक दा के आकार के स्थान पर एकार आदेश होकर देयात् आदि रूप बनते हैं। ( परस्मैपद ) देयात्, देयास्ताम्, देयासुः, देयाः, देयास्तम्, देयास्त, देयासम्, देयास्व, देयास्म। ( आत्मनेपद ) दासीष्ट, दासीयास्ताम्, दासीरन्, दासीष्ठाः, दासीयास्थाम्, दासीध्वम्, दासीय, दासीवहि, दासीमहि।