Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 623
इदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
भृञामित्
Aṣṭādhyāyī 7.4.76
Vṛtti Varadarājācārya

भृञ् माङ् ओहाङ् एषां त्रयाणामभ्यासस्य इत्स्यात् श्लौ।

मिमीते। मिमाते। मिमते। ममे। माता। मास्यते। मिमीताम्। अमिमीत।

मिमीत। मासीष्ट।

अमास्त। अमास्यत। ओहाङ् गतौ॥७॥

जिहीते। जिहाते।

जिहते। जहे। हाता। हास्यते। जिहीताम्। अजिहीत। जिहीत। हासीष्ट। अहास्त।

अहास्यत। डुभृञ् धारणपोषणयोः॥८॥

विभर्ति। विभृतः। विभ्रति। विभृते।

विभ्रते। विभ्रते। विभराञ्चकार, वभार। वभर्थ। वभृव। वभृम। विभराञ्चक्रे, वभ्रे।

भर्तासि, भर्तासे। भरिष्यति, भरिष्यते। विभर्तु। विभराणि। विभृताम्। अविभः।

अविभ्रृताम्। अविभरुः। अविभृत। विभृयात्। विभ्रीत। भ्रियात्, भृषीष्ट। अभार्षीत्,

अभृत।

अभरिष्यत्, अभरिष्यत। डुदाञ् दाने॥९॥

ददाति। दत्तः। ददति। दत्ते।

ददाते। ददते। ददौ, ददे। दातासि, दातासे। दास्यति, दास्यते। ददातु।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६२३- भृञामित्। भृञां षष्ठ्यन्तम्, इत् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। णिजां त्रयाणां गुणः श्लौ से त्रयाणाम् और श्लौ और अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य की अनुवृत्ति आती है।

श्लु के परे होने पर भृञ्, माङ् और ओहाङ् धातुओं के अभ्यास को ह्रस्व इकार आदेश होता है।

यह सूत्र श्लु के परे होने पर अभ्यास को इकार करता है। अतः लिट् में नहीं लगेगा।

मिमीते। मा धातु से लट्, त, शप्, श्लु, द्वित्व आदि करके अभ्याससंज्ञा करके ह्रस्व करने पर ममा+त बना है। भृञामित् से अभ्यास म के अकार के स्थान पर इकार आदेश होकर मिमा+त बना। हलादि त के परे होने पर ई हल्यघोः से मा के आकार के स्थान पर ईकार आदेश होकर मिमी+त बना। आत्मनेपद होने के कारण टित आत्मनेपदानां टेरे से एत्व होकर मिमीते सिद्ध हुआ। अजादि आताम् के परे होने पर श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार का लोप होता है, मिमाते। झ के स्थान पर अत् आदेश होने के बाद यह भी अजादि ही है। अतः आकार का लोप होता है। मिम्+अते=मिमते। हलादि कित्, ङित् परे रहते तो ई हल्यघोः से ईत् होता है।

लट्- मिमीते, मिमाते, मिमते, मिमीषे, मिमाथे, मिमीध्वे, मिमे, मिमीवहे, मिमीमहे।

लिट् में- ममा+ए बनने के बाद आतो लोप इटि च से आकार का लोप होकर ममे बनता है। इसी तरह आगे भी होता है। रूप- ममे, ममाते, ममिरे, ममिषे, ममाथे, ममिध्वे, ममे, ममिवहे, ममिमहे।

लुट्- माता, मातारौ, मातारः। लृट्- मास्यते, मास्येते, मास्यन्ते आदि।

लोट्- मिमीताम्, मिमाताम्, मिमताम्, मिमीष्व, मिमाथाम्, मिमीध्वम्, मिमै, मिमावहै, मिमामहै।

लङ्- अमिमीत, अमिमाताम्, अमिमत, अमिमीथाः, अमिमाथाम्, अमिमीध्वम्, अमिमि, अमिमीवहि, अमिमीमहि। विधिलिङ्- मिमीत, मिमीयाताम्, मिमीरन्, मिमीथाः, मिमीयाथाम्, मिमीध्वम्, मिमीय, मिमीवहि, मिमीमहि। आशीर्लिङ्- मासीष्ट, मासीयास्ताम्, मासीरन्, मासीष्टाः, मासीयास्थाम्, मासीध्वम्, मासीय, मासीवहि, मासीमहि। लुङ्- अमास्त, अमासाताम्, अमासत, अमास्थाः, अमासाथाम्, अमाध्वम्, अमासि, अमास्वहि, अमास्महि। लृङ्- अमास्यत, अमास्येताम्, अमास्यन्त।

ओहाङ् गतौ। ओहाङ् धातु जाना अर्थ में है। ओ की उपदेशोऽजनुनासिक इत् से और ङकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। केवल हा शेष रहता है। ङित् होने के कारण आत्मनेपदी है। अनिट् भी है। श्लु होने पर भृञामित् से अभ्यास को इकार आदेश होता है। मा-धातु के रूप बनाने के बाद इसकी प्रक्रिया में कोई कठिनाई नहीं है। द्वित्व और अभ्याससंज्ञा करके हा को कुहोश्चुः से चुत्व और अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर जकार हो जाता है।

लट्- जिहीते, जिहाते, जिहते, जिहीषे, जिहाथे, जिहीध्वे, जिहे, जिहीवहे, जिहीमहे।

लिट्- जहे, जहाते, जहिरे, जहिषे, जहाथे, जहिद्वे-जहिध्वे, जहे, जहिवहे, जहिमहे।

लुट्- हाता, हातारौ, हातारः। लृट्- हास्यते, हास्येते, हास्यन्ते। लोट्- जिहीताम्, जिहाताम्,

जिहताम्, जिहीष्व, जिहाथाम्, जिहीध्वम्, जिहै, जिहावहै, जिहामहै। लङ्- अजिहीत, अजिहाताम्, अजिहत, अजिहीथाः, अजिहाथाम्, अजिहीध्वम्, अजिहि, अजिहीवहि, अजिहीमहि। विधिलिङ्- जिहीत, जिहीयाताम्, जिहीरन् आदि। आशीर्लिङ्- हासीष्ट, हासीयास्ताम्, हासीरन्, हासीष्टाः आदि। लङ्- अहास्त, अहासाताम्, अहासत, अहास्थाः, अहासाथाम्, अहाध्वम्, अहासि, अहास्वहि, अहास्महि। लङ्- अहास्यत, अहास्येताम्, अहास्यन्त आदि।

डु-भृञ् धारणपोषणयोः। डुभृञ् धातु धारण करना और पोषण करना अर्थों में है। आदिर्ञिटुडवः से डु की इत्संज्ञा और जकार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है। भृ शेष रहता है। जित् होने के कारण स्वरितजित कर्त्रभिप्राये क्रियाफले से उभयपदी है। डु की इत्संज्ञा का फल आगे कृदन्त में डिवतः क्विः आदि सूत्रों में मिलेगा। सार्वधातुक लकारों में शप्, श्लु, द्वित्व, अभ्यास के ऋकार के स्थान पर भृञामित् से इत्व, रपर्, हलादि शेष आदि कार्य होते हैं।

बिभर्ति। भृ से लट्, परस्मैपद में तिप्, शप्, श्लु, द्वित्व करके भृभृ+ति बना। अभ्यास के ऋकार के स्थान पर भृञामित् से रपर सहित इकार आदेश, हलादि शेष, अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर बिभृ+ति बना। भृ को सार्वधातुक गुण होकर बिभर्ति सिद्ध हुआ। तस् आदि में सार्वधातुकमपित् से डित् होने के कारण गुण नहीं होता- बिभृतः। झि के झकार को अत् आदेश बिभृ+अति बना है। गुणाभाव है, अतः यण् होकर बिभृ+र्+अति बना। वर्णसम्मेलन होकर बिभृति सिद्ध हुआ। आत्मनेपद में तो पित् के अभाव में सभी डित् हैं, अतः गुण का प्रसंग ही नहीं है।

लट्- (परस्मैपद) बिभर्ति, बिभृतः, बिभृति, बिभर्षि, बिभृथः, बिभृथ, बिभर्मि, बिभृवः, बिभृम। (आत्मनेपद) बिभृते, बिभृति, बिभृते, बिभृषे, बिभृथे, बिभृध्वे, बिभृे, बिभृवहे, बिभृमहे।

बिभराञ्चकार। लिट् में भीहीभृहुवां श्लुवच्च से वैकल्पिक आम् और श्लुवद्भाव होता है। आम् होने के पक्ष में भृ+आम, भृ+भृ+आम, भर्+भृ+आम, भ+भृ+आम, ब+भृ+आम होने के बाद भृञामित् से अभ्यास के अकार को इकार आदेश होकर बिभृ+आम् बना। आम् के परे भृ को गुण होकर अर् आदेश, बिभर्+आम्=बिभराम् बना। इसके बाद कृ, भू, अस् का अनुप्रयोग आदि कार्य होते हैं।

लिट्- आम् और कृ के अनुप्रयोग के पक्ष में- बिभराञ्चकार, बिभराञ्चक्रतुः, बिभराञ्चक्रु आदि। आत्मनेपद में- बिभराञ्चक्रे, बिभराञ्चक्राते, बिभराञ्चक्रिरे आदि। भू के अनुप्रयोग में- बिभराम्बभूव, बिभराम्बभूवतुः, बिभराम्बभूवुः आदि। अस् के अनुप्रयोग में- बिभरामास, बिभरामासतुः, बिभरामासुः आदि। आम्, श्लुवद्भाव न होने के पक्ष में- बभार, बभ्रतुः, बभ्रुः, बभर्थ, बभ्रथुः, बभ्र, बभार-बभर, बभृव, बभृम। आत्मनेपद में- बभ्रे, बभ्राते, बभ्रिरे, बभृषे, बभ्राथे, बभृढ्वे, बभ्रे, बभृवहे, बभृमहे। लृट्- भर्ता, भर्तारौ, भर्तारः, भर्तासि, भर्तासे। लृट् में ऋद्धनोः स्ये से इट् हो जाता है। भरिष्यति, भरिष्यते। लोट्- (परस्मैपद) बिभर्तु-बिभृतात्, बिभृताम्, बिभृतु, बिभृहि-बिभृतात्, बिभृतम्, बिभृत, बिभराणि, बिभराव, बिभराम। (आत्मनेपद) बिभृताम्, बिभ्राताम्, बिभ्रताम्, बिभृष्व, बिभ्राथाम्, बिभृध्वम्, बिभरै, बिभरावहै, बिभरामहै। लङ्- (परस्मैपद) अबिभः, अबिभृताम्, अबिभरुः, अबिभः, अबिभृतम्, अबिभृत, अबिभरम्, अबिभृव, अबिभृम। (आत्मनेपद) अबिभृत, अबिभ्राताम्, अबिभ्रत, अबिभृथाः, अबिभ्राथाम्, अबिभृध्वम्, अबिभ्रि, अबिभृवहि, अबिभृमहि। विधिलिङ्- (परस्मैपद) बिभृयात्, बिभृयाताम्, बिभृयुः, बिभृयाः, बिभृयातम्, बिभृयात,

विभृयाम्, विभृयाव, विभृयाम। (आत्मनेपद) विभ्रीत, विभ्रीयाताम्, विभ्रीरन्, विभ्रीथाः,

विभ्रीयाथाम्, विभ्रीध्वम्, विभ्रीय, विभ्रीवहि, विभ्रीमहि।

आशीर्लिङ्- ( परस्मैपद ) रिङ् शयग्लिङ्क्षु से ऋ को रिङ् होकर भ्रियात्,

भ्रियास्ताम्, भ्रियासु, भ्रियाः, भ्रियास्तम्, भ्रियास्त, भ्रियासम्, भ्रियास्व, भ्रियास्म। ( आत्मनेपद )

भृषीष्ट, भृषीयास्ताम्, भृषीरन्, भृषीष्ठाः, भृषीयास्थाम्, भृषीध्वम्, भृषीय, भृषीवहि, भृषीमहि।

लृङ्- परस्मैपद में सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि होती है किन्तु आत्मनेपद

में उश्च से सिच् को कित् किये जाने के कारण वृद्धि नहीं होती और त, थास्, ध्वम् में

ह्रस्वादङ्गात् से सिच् का लोप हो जाता है। रूप- ( परस्मैपद ) अभार्षीत्, अभार्ष्टाम्,

अभार्षुः, अभार्षीः, अभार्ष्टम्, अभार्ष्ट, अभार्षम्, अभार्ष्व, अभार्ष्म। ( आत्मनेपद ) अभृत,

अभृषाताम्, अभृषत, अभृष्ठाः, अभृषाथाम्, अभृद्वम्, अभृषि, अभृष्वहि, अभृष्महि।

लृङ्- अभरिष्यत्, अभरिष्यत।

यहाँ तक भृञामित् के तीनों धातुओं का वर्णन हो गया। अब आगे के धातुओं

में अभ्यास को इत्व नहीं होगा।

डुदाञ् दाने। डुदाञ् धातु देना अर्थ में है। डु और ञ् की इत्संज्ञा होती है और

दा शेष रहता है। ञित् होने के कारण उभयपदी है। अनिट् होने पर भी थल् में

भारद्वाजनियम के कारण इट् हो जाता है। यह धातु दाधाध्वदाप् से घुसंज्ञक है।

ददाति। दा से लट्, तिप्, शप्, श्लु, द्वित्व, ह्रस्व करके ददाति बन जाता है।

दत्तः। ददा+तस् में श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार का लोप करके दद्+तस् बना।

खरि च से दकार को चर्त्व होकर तकार हो जाता है। दत्तः। बहुवचन में अदभ्यस्तात् से

अत् आदेश होकर आकार के लोप से ददति बनता है। आत्मनेपद में सर्वत्र डिद्वद्भाव होने

के कारण आकार का लोप होकर यथासम्भव चर्त्व हो जाता है।

लट्- ( परस्मैपद ) ददाति, दत्तः, ददति, ददासि, दत्थः, दत्थ, ददामि, दद्वः,

दद्मः। ( आत्मनेपद ) दत्ते, ददाते, ददते, दत्से, ददाथे, दद्ध्वे, ददे, दद्वहे, दद्महे।

लिट् के परस्मैपद में पा-धातु की तरह ही रूप बनते हैं। आत्मनेपद में सर्वत्र

आतो लोप इटि च से आकार का लोप होता है। ( परस्मैपद ) ददौ, ददतुः, ददुः,

ददिथ-ददाथ, ददथुः, दद, ददौ, ददिव, ददिम। ( आत्मनेपद ) ददे, ददाते, ददिरे, ददिषे,

ददाथे, ददिध्वे, ददे, ददिवहे, ददिमहे। लृट्- दाता, दातारौ, दातारः, दातासि। दातासे,

दातासाथे, दाताध्वे आदि। लृट्- दास्यति, दास्यतः, दास्यन्ति। दास्यते, दास्यते, दास्यन्ते

आदि।

लोट्, परस्मैपद, प्रथमपुरुष में एरुः से उत्व आदि होकर ददातु-दत्तात्, दत्ताम्

ददतु सरलता से बन जाते हैं।