Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 620
आतो लोपविधायकं विधिसूत्रम्
श्नाऽभ्यस्तयोरातः
Aṣṭādhyāyī 6.4.112
Vṛtti Varadarājācārya

अनयोरातो लोपः क्ङिति सार्वधातुके।

जहति। जहौ। हाता। हास्यति। जहातु-जहितात्-जहीतात्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६२०- श्नाभ्यस्तयोरातः। श्नाश्च अभ्यस्तश्च तयोरितरेतरद्वन्द्वः श्नाभ्यस्तौ, तयोः श्नाभ्यस्तयोः। श्नाभ्यस्तयोः षष्ठ्यन्तम्, आतः षष्ठ्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। श्नसोरल्लोपः से लोपः, अत उत्सार्वधातुके से सार्वधातुके और गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि से क्ङिति की अनुवृत्ति आती है।

कित्, ङित् सार्वधातुक के परे होने पर श्ना-प्रत्यय के तथा अभ्यस्तसंज्ञक धातु के आकार का लोप होता है।

इस सूत्र से केवल झि के परे होने पर ही लोप हो पाता है क्योंकि अन्यत्र हलादि के मिलने के कारण इसे बाधकर ई हल्यघोः आदि सूत्र लगते हैं।

जहति। झि के स्थान पर अदभ्यस्तात् से अत् आदेश होने के बाद जहा+अति बना है। श्नाभ्यस्तयोरातः से हा के आकार का लोप होकर जह्+अति बना। वर्णसम्मेलन होकर जहति सिद्ध हुआ।

लट् के रूप- जहाति, जहितः-जहीतः, जहति, जहासि, जहिथः-जहीथः, जहिथ-जहीथ, जहामि, जहिवः-जहीवः, जहिमः-जहीमः।

आकारान्त होने के कारण लिट् में पा-धातु की तरह प्रक्रिया होती है। अन्तर यह है कि पा के पकार के स्थान पर कोई आदेश नहीं होता किन्तु हा धातु के अभ्यास हकार के स्थान पर कुहोश्चुः से चुत्व होकर झकार और अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर जकार आदेश होता है जिससे जहौ आदि रूप बनते हैं। लिट् के रूप- जहौ, जहतुः, जहुः, जहिथ-जहाथ, जहथुः, जह, जहौ, जहिव, जहिम।

लुट् में अनिट् होने के कारण हाता, हातारौ, हातारः आदि रूप बनते हैं। इसी तरह लृट् में भी हास्यति, हास्यतः, हास्यन्ति आदि।

जहातु-जहितात्-जहीतात्। लोट्, प्रथमपुरुष, एकवचन में लट् की तरह जहा+ति बनाकर एकः से उत्व करके जहातु बनता है, यहाँ पर कित्, डित् न होने के कारण इत्व, ईत्व नहीं होते। किन्तु उसके बाद तातड् करके, उसे डित् मानकर जहातेश्च से इत्व और ई हल्यघोः से ईत्व करने पर जहितात्, जहीतात् ये रूप सिद्ध हो जाते हैं। इस तरह तीन रूप बन गये। द्विवचन में जहिताम्, जहीताम् बनते हैं। बहुवचन में अत् आदेश होकर जहा+अति बना है। श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार का लोप और एकः से उत्व करने पर जहतु सिद्ध हो जाता है। ६२१- आ च हौ। आ लुप्तप्रथमाकं पदं, च अव्ययपदं, हौ सप्तम्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। इद् दरिद्रस्य से इत्, ई हल्यघोः से ई और जहातेश्च से जहातेः की अनुवृत्ति आती है।