Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 619
ईदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
ई हल्यघोः
Aṣṭādhyāyī 6.4.113
Vṛtti Varadarājācārya

श्नाभ्यस्तयोरात ईत् स्यात् सार्वधातुके क्ङिति हलादौ न तु घोः।

जहीतः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६१९- ई हल्यघोः। न घुः अघुः, तस्य अघोः। ई लुप्तप्रथमाकं पदं, हलि सप्तम्यन्तम्, अघोः षष्ठ्यन्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अत उत्सार्वधातुके से सार्वधातुके की, श्नाभ्यस्तयोरातः से आतः और गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि से क्ङिति की अनुवृत्ति आती है।

श्ना प्रत्यय और अभ्यस्तसंज्ञक धातु के आकार के स्थान पर ईकार आदेश होता है हलादि कित् ङित् सार्वधातुक के परे होने पर किन्तु घुसंज्ञक धातुओं को नहीं।

जहितः, जहीतः। हा से तस्, शप्, श्लु, द्वित्व, ह्रस्व, चुत्व, जश्त्व करके जहा+तस् बना है। सार्वधातुकमपित् से तस् ङित् है और हलादि भी। अतः इसके परे होने पर श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार का लोप प्राप्त था, उसे बाधकर ई हल्यघोः से दीर्घ ईकार आदेश प्राप्त हुआ, उसे भी बाधकर जहातेश्च से हा के आकार के स्थान पर विकल्प से इकार आदेश हुआ, जहितः बना। इकार आदेश न होने के पक्ष में ई हल्यघोः से नित्य से ईकार आदेश होकर जहीतः बना। इस तरह दो रूप सिद्ध हुए।