Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 621
आकारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
आ च हौ
Aṣṭādhyāyī 6.4.117
Vṛtti Varadarājācārya

जहातेहौं परे आ स्याच्चादिदीतौ।

जहाहि, जहिहि, जहीहि। अजहात्। अजहुः।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

हि के परे होने पर ओहाक् धातु के आकार के स्थान पर आकार आदेश होता है साथ ही इकार और ईकार आदेश भी होते हैं।

सूत्र में चकार पढ़े जाने के कारण, उसके बल पर पूर्व सूत्रों से विहित इकार और ईकार का भी विधान माना जाता है। इस तरह हि के परे होने पर आकार, ईकार और ईकार वाले तीन रूप हो जाते हैं।

जहाहि, जहिहि, जहीहि। लोट् के सिप् में जहा+हि बना है। सेह्यपिच्च से हि के अपित् होने के कारण सार्वधातुकमपित् से डित् हुआ है। अतः पूर्व सूत्रों से ईकार और ईकार आदेश प्राप्त थे किन्तु आ च हौ से आकार आदेश का विधान हुआ अर्थात् हा के आकार के स्थान पर एक पक्ष में आकार ही रहा, चकारात् ईकार और ईकार आदेश भी हुए। इस तरह उक्त तीन रूप सिद्ध हुए। लोट् के रूप- जहातु-जहितात्-जहीतात्, जहिताम्-जहीताम् जहतु, जहाहि-जहिहि-जहीहि-जहितात्-जहीतात्, जहितम्-जहीतम्, जहित-जहीत, जहानि, जहाव, जहाम।

लड् में पूर्ववत् ही है किन्तु झि के स्थान पर सिच्चभ्यस्तविदिभ्यश्च से जुस् करने पर श्नाभ्यस्तयोरातः से आकार का लोप होता है। इस तरह रूप बनते हैं- अजहात्, अजहिताम्-अजहीताम्, अजहुः, अजहाः, अजहितम्-अजहीतम्, अजहित-अजहीत, अजहाम्, अजहिव-अजहीव, अजहिम-अजहीम।