ओहाक् त्यागे॥५॥ जहाति।
इद्वा स्याद्धलादौ किङ्क्ति सार्वधातुके। जहितः।
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लङ्- अपिपः, अपिपूर्ताम्, अपिपरुः, अपिपः, अपिपूर्तम्, अपिपूर्त, अपिपरम्,
अपिपूर्व, अपिपूर्म।
पिपूर्याः, पिपूर्यातम्, पिपूर्यात, पिपूर्याम्, पिपूर्याव, पिपूर्याम।
है- पूर्यात्, पूर्यास्ताम्, पूर्यासुः, पूर्याः, पूर्यास्तम्, पूर्यास्त, पूर्यासम्, पूर्यास्व, पूर्यास्म।
विधिलिङ् में यासुट् के डित् होने के कारण गुण नहीं होता, अतः उदोष्ठ्यपूर्वस्य
से उत्त्व तथा हलि च से दीर्घ होकर इसके रूप बनते हैं- पिपूर्यात्, पिपूर्याताम्, पिपूर्युः,
आशीर्लिङ् में शप् और श्लु नहीं होते, जिसके कारण द्वित्व आदि नहीं होता।
यासुट् को कित्व करने के कारण गुण का निषेध होकर उत्त्व तथा हलि च से दीर्घ हो जाता
अपारीत्। लुङ् में अपृ+इस्+ईत् बनने के बाद सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से
वृद्धि होकर सकार का इट ईटि से लोप ई+ई में सवर्णदीर्घ होकर अपारीत् सिद्ध हुआ।
६१८- जहातेश्च। जहातेः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इद् दरिद्रस्य से इत्, भिज्ञोऽतरस्याम् से अन्यतरस्याम्, ई हल्यघोः से हलि, गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि से क्ङिति और अत उत्सार्वधातुके से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।
हलादि कित्, ङित् सार्वधातुक के परे होने पर ओहाक् धातु को विकल्प से ह्रस्व इकार आदेश होता है।
यह अग्रिम सूत्र श्नाभ्यस्तयोरातः का अपवाद है।