Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 617
दीर्घनिषेधकं विधिसूत्रम्
सिचि च परस्मैपदेषु
Aṣṭādhyāyī 7.2.40
Vṛtti Varadarājācārya

अत्र इटो न दीर्घः। अपारिष्टाम्। अपरीष्यत्, अपरिष्यत्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६१७- सिचि च परस्मैपदेषु। सिचि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, परस्मैपदेषु सप्तम्यन्तं,

त्रिपदमिदं सूत्रम्। वृतो वा से वृतः, आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट्, ग्रहोऽलिटि दीर्घः से

दीर्घः और न लिङि से न की अनुवृत्ति आती है।

परस्मैपदपरक सिच् के परे होने पर वृङ्, वृञ् और ऋदन्त धातुओं से परे

इट् को दीर्घ नहीं होता।

इट् को वृतो वा से प्राप्त वैकल्पिक दीर्घ का निषेध करता है।

अपारिष्टाम्। अपार्+इस्+ताम् में वृतो वा से इट् वाले इकार को वैकल्पिक दीर्घ

प्राप्त था, उसका सिचि च परस्मैपदेषु से निषेध हुआ। सकार को षत्व और षकार के योग

में तकार को ष्टुत्व होकर अपारिष्टाम् बना।

लुङ्- अपारीत्, अपारिष्टाम्, अपारिषुः, अपारीः, अपारिष्टम्, अपारिष्ट, अपारिषम्, अपारिष्व, अपारिष्म।

लृङ् में इट् को वैकल्पिक दीर्घ करके अपरीष्यत्, अपरिष्यत् आदि दो-दो रूप बनते हैं।

ओहाक् त्यागे। ओहाक् धातु छोडने अर्थ में है। ओ की उपदेशेऽजनुनासिक

इत् से इत्संज्ञा और अन्त्य ककार की हलन्त्यम् से इत्संज्ञा होती है, हा बचता है। आत्मनेपद

निमित्तों से हीन है, अतः परस्मैपदी है। उपदेश अवस्था में अनुदात्त होने के कारण अनिट् भी

है।

जहाति। हा से लट्, तिप्, शप्, श्लु, द्वित्व, ह्रस्व और कुहोश्चुः से हकार के

स्थान पर चुत्व करके झकार और उसको जश्त्व करके जकार होने पर जहाति सिद्ध होता

है।