Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 616
वैकल्पिकेड्विधायकं विधिसूत्रम्
वॄतो वा
Aṣṭādhyāyī 7.2.38
Vṛtti Varadarājācārya

वृङ्वृञ्भ्यामृदन्ताच्चेटो दीर्घो वा स्यात्र तु लिटि।

परीता, परिता। परीष्यति, परिष्यति। पिपर्तु। अपिपः। अपिपूर्ताम्। अपिपरुः।

पिपूर्यात्। पूर्यात्। अपारीत्।

.....

पप्र-पपर, पपार-पपर, पप्रिव-पपरिव, पप्रिम-पपरिम।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

लिट् के रूप- पपार, पप्रतुः-पपरतुः, पप्रुः-पपरुः, पपरिथ, पप्रथुः-पपरथुः,

६१६- वृतो वा। वृ च ऋत् च तयोः समाहारद्वन्द्वो वृत्, तस्मात्। वृतः पञ्चम्यन्तं, वा

अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुकस्येड् वलादेः से इट् और ग्रहोऽलिटि दीर्घः से

दीर्घः और अलिटि की अनुवृत्ति आती है।

वृङ्, वृञ् और ऋदन्त धातुओ से परे इट् को विकल्प से दीर्घ होता है

किन्तु लिट् परे हो तो नहीं।

वृ में अनुबन्ध न होने के कारण ङकारानुबन्धक वृङ् और ञकारानुबन्धक वृञ्

ये दोनों लिए जाते हैं। अलिटि का तात्पर्य लिट् में नहीं होता और लकारों में हो जाता है।

परीता, परिता। पृ से लुट्, तासि, इट् का आगम, डा आदि करके गुण करने पर

पर्+इ+ता बना है। वृतो वा से इट् को वैकल्पिक दीर्घ करने पर परीता बना। दीर्घ न होने

के पक्ष में परिता ही रहेगा। इस तरह दो रूप बन गये। आगे लृट्-लकार में भी वैकल्पिक

दीर्घ होगा।

लृट्- दीर्घपक्षे में- परीता, परीतारौ, परीतारः। दीर्घाभाव में- परिता, परितारौ, परितारः।

लृट्- दीर्घपक्ष में- परीष्यति, परीष्यतः, परीष्यन्ति और दीर्घाभाव में परिष्यति, परिष्यतः

आदि।

लोट् में लट् की तरह ही प्रक्रिया होती है किन्तु लोट् में होने वाले विशेष उत्व,

हित्व, तातङ्, आट् आगम आदि कार्य भी होंगे। तातङ् में ङित्व के कारण गुण का निषेध

होकर उदोष्ठ्यपूर्वस्य से उत्व तथा हलि च से दीर्घ हो जाता है। इसी तरह अपित्व के

कारण ङित् हो जाने से हि में भी समझना चाहिए। उत्तमपुरुष में आट् का आगम पित् है,

अतः गुण हो जाता है। झि में अदभ्यस्तात् से झकार को अत् आदेश हो जाता है।

लोट् के रूप- पिपर्तु-पिपूर्तात्, पिपूर्ताम्, पिपरतु, पिपूर्हि-पिपूर्तात्, पिपूर्तम्,

पिपूर्त, पिपराणि, पिपराव, पिपराम।

लङ् में- पृ से तिप्, अट्, इकार का लोप, शप्, श्लु, द्वित्व और अर्तिपिपत्योश्च

से अभ्यास को इत्व, सार्वधातुकगुण, रपर आदि होने के बाद अपिपर्+त् बना। त् का

हल्ङ्याब्भ्यो दीर्घात्सुतिस्यपृक्तं हल् से लोप होने पर अपिपर् बना। रेफ का विसर्ग हुआ-

अपिपः। सिप् में भी अपिपः ही बनता है। मिप् में यही प्रक्रिया होकर अपिपरम् बनता है।

शेष जगहों पर सार्वधातुकमपित् से ङिद्वद्भाव होने के कारण गुणनिषेध होकर उदोष्ठ्यपूर्वस्य

से उत्व और हलि च से दीर्घ होता है किन्तु झि में सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च से जुस् और

जुसि च से गुण होकर अपिपरुः बनता है।