Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 615
गुणविधायकं विधिसूत्रम्
ऋच्छत्यॄताम्
Aṣṭādhyāyī 7.4.11
Vṛtti Varadarājācārya

तौदादिकऋच्छेर्ऋधातोर्ऋतां च गुणो लिटि। पपरतुः। पपरुः।

.....

लट् के रूप- पिपर्ति, पिपूर्तः, पिपुरति, पिपर्षि, पिपूर्थः, पिपूर्थ, पिपर्मि, पिपूर्वः, पिपूर्मः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

अलोऽन्त्यस्य को सहायता से अनभ्यास पृ के ऋकार के स्थान पर उदोष्ठ्यपूर्वस्य से उत्

अर्थात् हस्व उकार आदेश प्राप्त है किन्तु उरण रपरः की सहायता से रपर होकर उर् आदेश

हो जाता है। इस तरह पि+पुर्+तस् बना। हलि च से रेफान्त उपधा रूप पु के उकार को

दीर्घ हुआ, पिपूर्+तस् बना। रेफ का ऊर्ध्वगमन और सकार को रुत्व, विसर्ग करके पिपूर्तः

सिद्ध हुआ।

पिपुरति। बहुवचन में झकार के स्थान पर अत् आदेश होता है, अभ्यास को इत्व,

धातु को उत्व करके पिपुर्+अति बना है। वर्णसम्मेलन होकर पिपुरति सिद्ध हुआ।

पपार। पृ से लिट्, तिप्, णल्, द्वित्व, उरत् करके हलादिशेष करने पर पपृ+अ

बना। अचो ज्याति से वृद्धि होकर पपार सिद्ध हुआ।

६१५- ऋच्छत्यृताम्। ऋच्छतिश्च ऋ च ऋत् च तेषामितरेतरद्वन्द्वः ऋच्छत्यृतः, तेषाम्

ऋच्छत्यृताम्। ऋच्छत्यृताम् षष्ठ्यन्तमेकपदमिदं सूत्रम्। ऋतश्च संयोगादेर्गुणः से गुणः और

दयतेर्दिगि लिटि से लिटि की अनुवृत्ति आती है।

तुदादि के ऋच्छ धातु, ऋ-धातु और ऋकारान्त धातुओं को गुण होता है।

इको गुणवृद्धी की उपस्थिति से इक् अर्थात् ऋकार या ऋकार के स्थान पर

ही गुण हो पाता है।

पप्रतुः, पपरतुः। लिट् के द्विवचन पृ+अतुस् में द्वित्व, उरत्, हलादि शेष करके

पपृ+अतुस् बना। शृद्धप्रां हस्वो वा से दीर्घ ऋकार को वैकल्पिक हस्व होकर पपृ+अतुस्

बना। हस्वपक्ष में हस्वविधान के सामर्थ्य से ऋच्छत्यृताम् से गुण नहीं होगा। अतः इको

यणचि से यण् होकर पपृ+र्+अतुस् बना। वर्णसम्मेलन होकर पप्रतुः सिद्ध हुआ। हस्व न

होने के पक्ष में ऋच्छत्यृताम् से ऋकार को गुण होकर अर् हो जाता है, जिससे पपर्+अतुस्

हुआ। वर्णसम्मेलन होकर पपरतुः सिद्ध हुआ। इसी तरह आगे भी पप्रुः-पपरुः आदि बनते

हैं।