Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 610
वैकल्पिककारादेशविधायकं विधिसूत्रम्
भियोऽन्यतरस्याम्
Aṣṭādhyāyī 6.4.115
Vṛtti Varadarājācārya

इकारो वास्याद्धलादौ क्ङिति सार्वधातुको विभितः, विभीतः। विभ्यति। विभयाञ्चकार, विभाय। भेता। भेष्यति। विभेतु, विभितात्, विभीतात्। अविभेत्। विभीयात्। भीयात्।

अभैषीत्। अभेष्यत्। ह्री लज्जायाम्॥३॥

जिहेति। जिहीतः। जिहियति। जिहयाञ्चकार, जिहाय। हेता। हेष्यति। जिहेतु। अजिहेत्। जिहीयात्। हीयात्। अहैषीत्। अहेष्यत्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६१०- भियोऽन्यतरस्याम्। भियः षष्ठ्यन्तम्, अन्यतरस्यां सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इद् दरिद्रस्य से इत्, ई हल्यघोः से हलि, गमहनजनखनघसां लोपः क्ङित्यनङि से क्ङिति और अत उत् सार्वधातुके से सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।

हलादि कित्, ङित् सार्वधातुक के परे होने पर धातु को विकल्प से इकार आदेश होता है।

अलोऽन्यस्य की उपस्थिति से अन्त्य वर्ण भी के ईकार के स्थान पर ह्रस्व इकार हो जाता है। वैकल्पिक होने के कारण एक पक्ष में ह्रस्व इकार और एक पक्ष में दीर्घ ईकार वाले रूप बनते हैं। तिप्, सिप्, मिप् को छोड़कर अन्य सभी सार्वधातुकमपित् से ङित् हैं। झि के झकार के स्थान पर अदभ्यस्तात् से अत् आदेश होने के कारण हलादि नहीं है, शेष सभी हलादि हैं। अतः दो-दो रूप होंगे।

विभितः, विभीतः। भी से तस्, शप्, श्लु, द्वित्व, अभ्याससंज्ञा, ह्रस्व, जश्त्व करके विभी+तस् वना। भियोऽन्यतरस्याम् से भी के ईकार के स्थान पर वैकल्पिक इकार आदेश होकर विभितस् वना। सकार को रुत्व और विसर्ग होकर विभितः सिद्ध हुआ। इकार आदेश न होने के पक्ष में विभीतः वनता है। इस तरह दो रूप बन गये। आगे थस्, थ, वस्, मस् में भी इस तरह दो-दो रूप बनेंगे।

विभ्यति। भी से प्रथमपुरुष का बहुवचन झि, उसके झकार के स्थान पर अदभ्यस्तात् से अत् आदेश होकर विभी+अति वना है। हलादि न मिलने के कारण इकार आदेश नहीं होता किन्तु एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य से यण् होकर विभ्यति वनता है। लट् के रूप- विभेति, विभितः-विभीतः, विभ्यति, विभेषि, विभिथः-विभीथः, विभिथ-विभीथ, विभेमि, विभिवः-विभीवः, विभिमः-विभीमः।

लिट् में हु की तरह भीहीभृहुवां श्लुवच्च से आम्, द्वित्व, गुण करके विभयाम् वनाकर कृञ् का अनुप्रयोग करके विभयाञ्चकार, भू का अनुप्रयोग करके विभयाम्बभूव

.....

और अस् का अनुप्रयोग करके विभयामास आदि रूप बनते हैं। आम् आदि न होने के पक्ष में विभाय बन जाता है।

लिट् के रूप- कृ के अनुप्रयोग में- विभयाञ्चकार, विभयाञ्चक्रतुः, विभयाञ्चक्रुः, विभयाञ्चकर्थ, विभयाञ्चक्रथुः, विभयाञ्चक्र, विभयाञ्चकार-विभयाञ्चकर, विभयाञ्चकृव, विभयाञ्चकृम। भू के अनुप्रयोग में- विभयाम्बभूव, विभयाम्बभूवतुः, विभयाम्बभूवुः, विभयाम्बभूविथ, विभयाम्बभूवथुः, विभयाम्बभूव, विभयाम्बभूव, विभयाम्बभूविव, विभयाम्बभूविम। अस् के अनुप्रयोग में- विभयामास, विभयामासतुः, विभयामासुः, विभयामासिथ, विभयामासथुः, विभयामास, विभयामास, विभयामासिव, विभयामासिम। आम् आदि न होने के पक्ष में- विभाय, विभ्यतुः, विभ्युः, विभिथि-विभेथ, विभ्यथुः, विभ्य, विभाय-विभय, विभ्यिव, विभ्यिम। लुट्- भेता, भेतारौ, भेतारः। लृट्- भेष्यति, भेष्यतः, भेष्यन्ति। लोट्- विभेतु-विभितात्-विभीतात्, विभिताम्-विभीताम्, विभ्यतु, विभिहि-विभीहि-विभितात्- विभीतात्, विभितम्-विभीतम्, विभित-विभीत, विभयानि, विभयाव, विभयाम। लङ्- अविभेत्, अविभिताम्-अविभीताम्, अविभयुः। अविभेः, अविभितम्-अविभीतम्, अविभित-अविभीत। अविभयम्, अविभिव-अविभीव, अविभिम-अविभीम।

विधिलिङ्- में यासुट् होने से हलादि ङित् सावधातुक होने के कारण सर्वत्र वैकल्पिक इत्व हो जाता है। विभियात्-विभीयात्, विभियाताम्-विभीयाताम्, विभियुः-विभीयुः, विभियाः-विभीयाः, विभियातम्-विभीयातम्, विभियात-विभीयात, विभियाम्-विभीयाम्, विभियाव-विभीयाव, विभियाम-विभीयाम।

आशीर्लिङ्- भीयात्, भीयास्ताम्, भीयासुः, भीयाः, भीयास्तम्, भीयास्त, भीयासम्, भीयास्व, भीयास्म। लुङ्- सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से वृद्धि होती है- अभैषीत्, अभैष्टाम्, अभैषुः, अभैषीः, अभैष्टम्, अभैष्ट, अभैषम्, अभैष्व, अभैष्म।

लृङ्- अभेष्यत्, अभेष्यताम्, अभेष्यन्, अभेष्यः, अभेष्यतम्, अभेष्यत, अभेष्यम्, अभेष्याव, अभेष्याम।

ह्री लज्जायाम्। ह्री धातु लज्जा करना, शरमाना अर्थ में है। इसमें किसी की इत्संज्ञा नहीं हुई है। आत्मनेपद के निमित्तों से रहित है, अतः परस्मैपदी है। अनिट् है। इसकी प्रक्रिया भी भी की तरह ही होती है किन्तु भियोऽन्यतरस्याम् नहीं लगेगा और संयोगपूर्व में होने के कारण एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य नहीं लगेगा। उस स्थल पर अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङुवङौ से इयङ् हो जायेगा। ह्री को द्वित्व होकर हलादिशेष, ह्रस्व होने पर हि+ह्री बनता है और कुहोश्चुः से चुत्व होकर झकार औ जश्त्व होकर जकार हो जाता है।

लट्- जिहेति, जिहीतः, जिहियति, जिहेषि, जिहीथः, जिहीथ, जिहेमि, जिहीवः, जिहीमः। लिट्- (आम् के पक्ष में) जिहयाञ्चकार, जिहयाम्बभूव, जिहयामास। (आम् के अभाव में) जिहाय, जिहियतुः, जिहियुः, जिहियथ-जिहेथ, जिहियथुः, जिहिय, जिहाय-जिहय, जिहियिव, जिहियिम। लुट्- हेता, हेतारौ, हेतारः, हेतासि आदि। लृट्- हेष्यति, हेष्यतः, हेष्यन्ति, हेष्यसि आदि। लोट्- जिहेतु-जिहीतात्, जिहीताम्, जिहियतु, जिहीहि-जिहीतात्, जिहीतम्, जिहीत, जिहियाणि, जिहियाव, जिहियाम। लङ्- अजिहेतु, अजिहीताम्, अजिहयुः, अजिहेः, अजिहीतम्, अजिहीत, अजिहयम्, अजिहीव, अजिहीम। विधिलिङ्- जिहीयात्, जिहीयाताम्, जिहीयुः, जिहीयाः, जिहीयातम्, जिहीयात आदि। आशीर्लिङ्- हीयात्, हीयास्ताम्, हीयासुः, हीयाः, हीयास्तम्, हीयास्त, हीयासम् आदि।