इगन्ताङ्गस्य गुणोऽजादौ जुसि। अजुहवुः। जुहुयात्। हूयात्। अहौषीत्।
अहोष्यत्। जिभी भये॥२॥
विभेति।
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६०९- जुसि च। जुसि सप्तम्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। क्सस्याचि से अचि तथा
मिदेर्गुणः से गुणः की अनुवृत्ति आती है। अङ्गस्य का अधिकार है।
अजादि जुस् के परे होने पर इगन्त अङ्ग को गुण होता है।
अजुहवुः। हु धातु से प्रथमपुरुष बहुवचन झि, शप्, श्लु, द्वित्वादि, अट् आगम,
झि के स्थान पर अत् आदेश प्राप्त, अभ्यस्तसंज्ञक होने के कारण उसे बाधकर
सिजभ्यस्तविदिभ्यश्च से जुस् आदेश, अनुबन्धलोप, अजुहु+उस् में जुसि च से गुण,
अजुहो+उस्, अव् आदेश, वर्णसम्मेलन, सकार को रुत्वविसर्ग, अजुहवुः।
हु धातु के लङ् के रूप- अजुहोत्, अजुहुताम्, अजुहवुः। अजुहोः, अजुहुतम्,
अजुहुत। अजुहवम्, अजुहुव, अजुहुम।
विधिलिङ् में हु धातु से शप्, श्लु, द्वित्व, यासुट् आदि करने पर निम्नानुसार रूप
सिद्ध होते हैं- जुहुयात्, जुहुयाताम्, जुहुयुः। जुहुयाः, जुहुयातम्, जुहुयात। जुहुयाम्,
जुहुयाव, जुहुयाम।
आशीर्लिङ् में हु धातु से यासुट् के परे होने पर अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से हु
को दीर्घ होकर रूप सिद्ध होते हैं- हूयात्, हूयास्ताम्, हूयासुः। हूयाः, हूयास्तम्, हूयास्त।
हूयासम्, हूयास्व, हूयास्म।
लुङ् लकार में हु धातु से लुङ्, अट्, तिप्, च्लि, सिच् आदेश, इकार का
लोप, अपृक्त हल् को ईट् आगम करके अहु+स्+ईत् बना। सिच् वाले सकार के परे
होने पर सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु से हु के उकार की वृद्धि हुई, अहौ+स्+ईत् बना,
षत्व और वर्णसम्मेलन करके अहौषीत् सिद्ध हुआ। ईट् आगम तो तिप् और सिच् में
ही हो सकता है। अन्यत्र वृद्धि, षत्व और टुत्व आदि करके निम्नलिखित रूप बनते हैं-
अहौषीत्, अहौष्टाम्, अहौषुः। अहौषीः, अहौष्टम्, अहौष्ट। अहौषम्, अहौष्व,
अहौष्म।
लृङ् लकार में- अहोष्यत्, अहोष्यताम्, अहोष्यन्। अहोष्यः, अहोष्यतम्,
अहोष्यत। अहोष्यम्, अहोष्याव, अहोष्याम।
जिभी भये। जिभी धातु डरना अर्थ में है। जि की आदिर्जिटुडवः से इत्संज्ञा
होती है और उसका लोप होकर भी बचता है। जीत् होने का फल जीतः क्तः सूत्र की
प्रवृत्ति है जो कृदन्तप्रकरणम् में स्पष्ट होगा। इसी धातु से भीम, भयानक, भय, भीति आदि
शब्द बनते हैं। यह हु की तरह ही अनिट् है।