Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 611
इकारान्तादेशविधायकं विधिसूत्रम्
अर्तिपिपर्त्योश्च
Aṣṭādhyāyī 7.4.77
Vṛtti Varadarājācārya

पृ पालनपूरणयोः॥४॥

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अभ्यासस्य इकारोऽन्तादेशः स्यात् श्लौ। पिपर्ति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

विभेति। भी से लट्, तिप्, शप्, उसका श्लु, श्लौ से द्वित्व करके भीभी+ति वना। पूर्व की अभ्याससंज्ञा करके भी को ह्रस्व और भकार को अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर विभी+ति वना। द्वितीय भी के ईकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण होकर विभेति सिद्ध हुआ। मध्यमपुरुष के एकवचन में विभेषि और उत्तमपुरुष के एकवचन में विभेमि बनते हैं।

६११- अर्तिपिपत्योश्च। अर्तिश्च पिपर्तिश्च तयोरितरेतरद्वन्द्व अर्तिपिपर्ती, तयोः अर्तिपिपत्योः। अर्तिपिपत्योः षष्ठ्यन्तं, च अव्ययपदं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अत्र लोपोऽभ्यासस्य से अभ्यासस्य, भृञामित् से इत् और णिजां त्रयाणां गुणः श्लौ से श्लौ की अनुवृत्ति आती है।

ऋ-धातु और पृ धातु के अभ्यास के अन्त्य वर्ण के स्थान पर इकार आदेश होता है श्लु के परे होने पर।

पिपर्ति। पृ धातु से लट्, तिप्, शप्, श्लु, द्वित्व करके पृ+पृ+ति बना। उरत् से अर्, हलादिशेष करके पृ+पृ+ति बना। अभ्यास के अकार के स्थान पर अर्तिपिपत्योश्च से इकार आदेश करने पर पि+पृ+ति बना। अनभ्यास पृ के ऋ को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण होकर पिपर्+ति बना। रेफ का ऊर्ध्वगमन होकर पिपर्ति सिद्ध हुआ।