Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
Show
VṛttiGovind
LSK 608
आमादिविधायकं विधिसूत्रमतिदेशसूत्रञ्च
भीह्रीभृहुवां श्लुवच्च
Aṣṭādhyāyī 3.1.39
Vṛtti Varadarājācārya

एभ्यो लिटि आम् वा स्यादामि श्लाविव कार्यञ्च।

जुहुतु। जुहुधि। जुहुवानि। अजुहोत्। अजुहुताम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

जुहवाञ्चकार, जुहाव। होता। होष्यति। जुहोतु, जुहुतात्। जुहुताम्।

६०८- भीहीभृहुवां श्लुवच्च। भीश्च हीश्च भा च हुश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो भीहीभृहुवः, तेषां भीहीभृहुवाम्। श्लौ इव इति श्लुवत्, इवार्थे वतिप्रत्ययः। भीहीभृहुवां षष्ठ्यन्तं, श्लुवत् अव्ययं, च अव्ययं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। कास्प्रत्ययादाममन्त्रे लिटि से लिटि और उषविदजागृभ्योऽन्यतरस्याम् से अन्यतरस्याम् की अनुवृत्ति आती है। प्रत्ययः और परश्च का अधिकार है।

भी, ही, भृ और हु धातुओं से वैकल्पिक आम् और आम् के परे होने पर श्लु के समान द्वित्व आदि कार्य भी हों।

यह सूत्र पहले तो आम् करेगा, फिर आम् में श्लुवद्भाव करता है। जिस प्रकार से श्लु को मानकर द्वित्व आदि कार्य होते हैं, उसी प्रकार आम को मानकर भी होंगे। आम् होने के बाद की प्रक्रिया तो कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से कृ, भू, अस् का अनुप्रयोग आदि होती ही है।

जुहवाञ्चकार। हु-धातु से लिट्, तिप्, णल्, अ। हु+अ में भीहीभृहुवां श्लुवच्च से आम् और श्लुवद्भाव होने पर श्लौ से द्वित्व, अभ्याससंज्ञा, कुहोश्चुः से चुत्व, अभ्यासे चर्च से जश्त्व होने के बाद जु+हु+आम्+अ बना। आमः से लिट् का लुक्, कृञ्चानुप्रयुज्यते लिटि से लिट् को साथ लेकर कृ का अनुप्रयोग, हु+आम्+कृ+लिट् बना। तिप् आदेश होकर उसके स्थान पर णल् आदेश होकर जु+हु+आम्+कृ+अ बना। आम् तिङ् और शित् से भिन्न होने के कारण आर्धधातुकं शेषः से आर्धधातुकसंज्ञक है। अतः उसके परे होने पर जुहु के उकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण होकर जुहो+आम् बना, अवादेश होकर जुहवाम् बना। आगे कृ+अ भी है। अब लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व, उरत्, रपर, हलादिशेष, चुत्व होकर चकृ+अ में अचो ञ्णिति से वृद्धि और वर्णसम्मेलन हुआ- चकार बना। जुहवाम्+चकार में मकार को मोऽनुस्वारः से अनुस्वार और वा पदान्तस्य से परसवर्ण करके जुहवाञ्चकार सिद्ध हो जाता है। अब आगे भी आप स्वयं बनाइये- जुहवाञ्चक्रतुः, जुहवाञ्चक्रुः। जुहवाञ्चकर्थ, जुहवाञ्चक्रथुः, जुहवाञ्चक्र, जुहवाञ्चकार-जुहवाञ्चकर, जुहवाञ्चकृव, जुहवाञ्चकृम।

भू के अनुप्रयोग होने पर- जुहवाम्बभूव, जुहवाम्बभूवतुः, जुहवाम्बभूवुः। जुहवाम्बभूविथ, जुहवाम्बभूवथुः, जुहवाम्बभूव। जुहवाम्बभूव, जुहवाम्बभूविव, जुहवाम्बभूविम।

अस् के अनुप्रयोग होने पर- जुहवामास, जुहवामासतुः, जुहवामासुः। जुहवामासिथ, जुहवामासथुः, जुहवामास। जुहवामास, जुहवामासिव, जुहवामासिम।

आम् आदि न होने के पक्ष में- हु से लिट्, तिप्, णल्, अ होकर हु को लिटि धातोरनभ्यासस्य से द्वित्व, चुत्व, जश्त्व आदि होकर जुहु+अ में अचो ञ्णिति से वृद्धि, जुहौ+अ, आव् आदेश, वर्णसम्मेलन होकर जुहाव बनता है। अजादि के परे होने पर अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियङ्वडौ से हु के उकार के स्थान पर उवङ्, अनुबन्धलोप, उव् शेष, वर्णसम्मेलन होकर जुहुवतुः आदि बनते हैं। इस तरह आप स्वयं- जुहाव, जुहुवतुः, जुहुवुः। जुहोथ-जुहविथ, जुहुवथुः, जुहुव। जुहाव-जुहव, जुहुविव, जुहुविम बनायें।

लुट् लकार के रूप (अनिट्)- होता, होतारौ, होतारः। होतासि, होतास्थः, होतास्थ। होतास्मि, होतास्वः, होतास्मः।

लृट् के रूप- होष्यति, होष्यतः, होष्यन्ति। होष्यसि, होष्यथः, होष्यथ। होष्यामि, होष्यावः, होष्यामः।

लोट् लकार में- जुहोतु-जुहुतात्, जुहुताम्, जुहुतु। हुझल्भ्यो हेर्धिः से हि को धि

आदेश होकर- जुहुधि-जुहुतात्, जुहुतम्, जुहुत। जुहवानि, जुहवाव, जुहवाम।

लङ् लकार में- अजुहोत् और अजुहुताम् भी आप बना सकते हैं।