Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 14
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VṛttiGovind
LSK 607
अदादेशविधायकं विधिसूत्रम्
अदभ्यस्तात्
Aṣṭādhyāyī 7.1.4
Vṛtti Varadarājācārya

झस्यात् स्यात्। हुश्नुवोरिति यण्। जुह्वति।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६०७- अदभ्यस्तात्। अत् प्रथमान्तम्, अभ्यस्तात् पञ्चम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। इस सूत्र में झोऽन्तः से झः तथा आयनेयीनीयियः फढखछ्यां प्रत्ययादीनाम् से वचनविपरिणाम करके प्रत्ययादेः की अनुवृत्ति आती है।

अभ्यस्तसंज्ञक धातु से परे प्रत्यय के आदि अवयव झकार के स्थान पर अत् आदेश होता है।

जुह्वति। हु धातु से प्रथमपुरुष के बहुवचन में झि आया, शप्, उसका श्लु, हु को द्वित्व, हुहु झि बना, कुहोश्चुः से कुत्व और अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर जुहु बना। जुहु की उभे अभ्यस्तम् से अभ्यस्तसंज्ञा हुई, अदभ्यस्तात् से झि के झकार के स्थान पर अत् आदेश हुआ- अत्+इ=अति बना। जुहु+अति में इको यणचि से यण् प्राप्त था, उसे बाधकर अचि श्नुधातुभ्रुवां य्वोरियडुवडौ से उवड् प्राप्त था, उसे भी बाधकर हुश्नुवोः सार्वधातुके से द्वितीय हु के उकार को यण् होकर व् आदेश हुआ, जुहुव्+अति बना, वर्णसम्मेलन हुआ- जुह्वति।

हु धातु के लट् के रूप- जुहोति, जुहुतः, जुह्वति। जुहोषि, जुहुथः, जुहुथ।

जुहोमि, जुहुवः, जुहुमः।