धातोर्द्वे स्तः। जुहोति। जुहुतः।
अब तिङन्तप्रकरण का तीसरा जुहोत्यादिप्रकरण आरम्भ होता है। इस गण के आदि में हु धातु है, अतः ह्वादिगण अर्थात् ह्वादिप्रकरण कहना चाहिए था किन्तु जुहोत्यादि कहने का तात्पर्य यह है कि इस प्रकरण में शप् को श्लु (लोप जैसा) होता है और उसके होने के बाद धातु को द्वित्व हो जाता है। जैसे हु धातु से ति के परे होने पर शप् को श्लु और धातु को द्वित्व होकर जुहोति रूप बनता है। गण की इस विशेषता को दिखाने के लिए जुहोत्यादि कहा गया। जुहोतिः (हु धातुः) आदिरस्ति येषां ते जुहोत्यादयः।
हु धातु देना और खाना अर्थ में है। लोक में यज्ञ करने के अर्थ में इसका प्रयोग ज्यादा होता है। यह धातु अनिद् है।
६०६- श्लौ। श्लौ सप्तम्यन्तम् एकपदमिदं सूत्रम्। लिटि धातोरनभ्यासस्य से धातोः की तथा एकाचो द्वे प्रथमस्य से द्वे की अनुवृत्ति आती है।
श्लु के परे होने पर धातु को द्वित्व होता है।
जुहोति। हु धातु से लट्-लकार, उसके स्थान पर तिप् आदेश, अनुबन्धलोप, ति की सार्वधातुकसंज्ञा, शप्, उसका जुहोत्यादिभ्यः श्लुः से श्लु(लोप)। हु ति में शप् को श्लु हुआ है, उसके होने पर धातु को श्लौ से द्वित्व, हुहु ति। इस प्रकरण में द्वित्व होने पर प्रथम की अभ्याससंज्ञा तो होती ही है। अभ्यास हु को कुहोश्चुः से चुत्व होकर हकार को झकार, उसके स्थान पर अभ्यासे चर्च से जश्त्व होकर जु बना। जुहु+ति हुआ। ति को सार्वधातुक मानकर हु के उकार को सार्वधातुकार्धधातुकयोः से गुण, जुहोति।
तिप्, सिप्, मिप् को छोड़कर अन्य प्रत्ययों को सार्वधातुकमपित् से डिद्वद्भाव हो जाने के कारण उनके परे होने पर विडन्ति च से गुण का निषेध हो जाता है। अतः द्विवचन आदि में गुण नहीं होता। जुहुतः।