शपः श्लुः स्यात्।
हु दानादनयोः॥१॥
६०५- जुहोत्यादिभ्यः श्लुः। जुहोतिरादिर्येषां ते जुहोत्यादयः, तेभ्यो जुहोत्यादिभ्यः। जुहोत्यादिभ्यः पञ्चम्यन्तं, श्लुः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। अदिप्रभृतिभ्यः शपः से शपः की अनुवृत्ति आती है।
जुहोत्यादिगण में पठित धातुओं से परे शप् का श्लु आदेश है।
श्लु भी एक तरह का लोप ही है। जैसे अदादिगण में लुक् को भी लोप माना गया, उसी तरह श्लु को भी लोप ही समझा जाता है।। श्लु करने का विशेष कारण यह है कि श्लु के बाद प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम् से प्राप्त प्रत्ययलक्षण कार्य का न लुमताङ्गस्य से निषेध किया जाता है जिससे शप् आदि के लुक् होने पर उसको मानकर होने वाले कार्य भी रूक जाते हैं।