Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 604
वैकल्पिकवृद्धिविधायकं विधिसूत्रम्
ऊर्णोतेर्विभाषा
Aṣṭādhyāyī 7.2.6
Vṛtti Varadarājācārya

इडादौ सिचि वा वृद्धिः परस्मैपदे परे। पक्षे गुणः। और्णावीत्, और्णुवीत्, और्णवीत्। और्णाविष्टाम्, और्णुविष्टाम्, और्णविष्टाम्। और्णुविष्ट, और्णविष्ट। और्णुविष्टाम्, और्णविष्टाम्। और्णुविष्टाम्, और्णविष्टाम्॥

इत्यदादयः॥१३॥

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६०४- ऊर्णोतेर्विभाषा। ऊर्णोतेः षष्ठ्यन्तं, विभाषा प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। सिचि वृद्धिः परस्मैपदेषु यह पूरा सूत्र अनुवृत्त होता है और नेटि से इटि की अनुवृत्ति आती है।

परस्मैपद सिच् के परे होने पर जो इडादि सिच् उसके परे रहते ऊर्णु धातु को विकल्प से वृद्धि होती है।

और्णावीत्। लुड्, आट् आगम, तिप्, च्लि, सिच् करके ह्रस्व इडागम और दीर्घ इडागम करने के बाद आ+ऊर्णु+इस्+ईत् बना है। ऊर्णु के उकार की ऊर्णोतेर्विभाषा से वैकल्पिक वृद्धि करके आ+ऊर्णौ+इस्+ईत् बना। आ+ऊ में आटश्च से वृद्धि होकर और्णौ+इस्+ईत् बना। औकार को आव् आदेश करके इट ईटि से सकार का लोप और इ+ई में सवर्णदीर्घ करके वर्णसम्मेलन करने पर और्णावीत् सिद्ध हुआ। वृद्धि न होने के पक्ष में विभाषोर्णोः से वैकल्पिक डित्त्व होता है। डित्त्व के पक्ष में उवड् और अडित् में आर्धधातुकगुण होकर और्णुवीत् और और्णवीत् ये रूप बनते हैं। इस तरह तीन-तीन रूप बन गये।

लुड् ( परस्मैपद ) वृद्धिपक्ष में- और्णावीत्, और्णाविष्टाम्, और्णाविषुः, और्णावीः, और्णाविष्टम्, और्णाविष्ट, और्णाविषम्, और्णाविष्व, और्णाविष्म। वृद्ध्यभावे डित्त्वपक्षे उवड्- और्णुवीत्, और्णुविष्टाम्, और्णुविषुः, और्णुवीः, और्णुविष्टम्, और्णुविष्ट, और्णुविषम्, और्णुविष्व, और्णुविष्म। डित्त्वाभावे गुणः- और्णवीत्, और्णविष्टाम्, और्णविषुः आदि।

लृड् में- इडादिप्रत्यय के परे विकल्प से डित् होकर डित्त्वपक्ष में उवड् और डित्त्वाभाव में गुण होकर दो-दो रूप बनते हैं। परस्मैपद में- और्णुविष्टाम्-और्णविष्टाम्। आत्मनेपद में- और्णुविष्टाम्-और्णविष्टाम्।

परीक्षा

द्रष्टव्यः- प्रत्येक प्रश्न पाँच-पाँच अंक के हैं।

१- भ्वादि और अदादिप्रकरण में मूलभूत अन्तर क्या है?

२- लुक् और लोप में क्या अन्तर है?

३- शासिवसिघसीनाञ्च में कौन-कौन पद कहाँ-कहाँ से अनुवृत्त होते हैं?

४- किन-किन लकारों के किन-किन प्रत्ययों को किन-किन सूत्रों से किद्वद्भाव किया जाता है?

५- यदि शप् का लुक् न होता तो अद् धातु के लट्, लोट्, लङ् और विधिलिङ् में कैसे रूप बनते?

६- अस् धातु के डित् लकारों के रूप लिखिए।

७- वा धातु के टित् लकारों के रूप लिखिए।

८- अदादिगण में पढ़े गये सभी धातुओं के लोट् लकार में मध्यमपुरुष एकवचन के रूपों की सूत्र लगाकर सिद्धि कीजिए।

९- अदादिगणीय सभी आकारान्त धातुओं के लिट् लकार के रूप लिखिए।

१०- किस लकार की प्रक्रिया में आप कठिनाई अनुभव करते हैं, यदि करते हैं तो क्यों?

श्री वरदराजाचार्य के द्वारा रचित लघुसिद्धान्तकौमुदी में गोविन्दाचार्य की कृति श्रीधरमुखोल्लासिनी हिन्दी व्याख्या का अदादिप्रकरण पूर्ण हुआ।

अथ जुहोत्यादयः