Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 603
गुणविधायकं विधिसूत्रम्
गुणोऽपृक्ते
Aṣṭādhyāyī 7.3.91
Vṛtti Varadarājācārya

ऊर्णोतेर्गुणोऽपृक्ते हलादौ पिति सार्वधातुके। वृद्ध्यपवादः। और्णोत्।

और्णोः। ऊर्णुयात्। ऊर्णुयाः। ऊर्णुवीत। ऊर्णुयात्। ऊर्णुविषीष्ट। ऊर्णविषीष्ट।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६०३- गुणोऽपृक्ते। गुणः प्रथमान्तम्, अपृक्ते सप्तम्यन्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। उतो वृद्धिर्लुकि हलि से हलि, नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से पिति, सार्वधातुके और ऊर्णोतेर्विभाषा से ऊर्णोतेः की अनुवृत्ति आती है।

अपृक्त हलादि पित् सार्वधातुक के परे होने पर ऊर्णु को गुण होता है।

यह सूत्र ऊर्णोतेर्विभाषा का अपवाद है। यहाँ अपृक्त हल् तिप् और सिप् सम्बन्धी ही मिलता है।

और्णोत्। ऊर्णु से लड्, अजादि होने के कारण आडजादीनाम् से आट् का आगम, तिप्, शप्, शप् का लुक् करके आ+ऊर्णु+त् बना। आ+ऊर्णु में आटश्च से वृद्धि होकर और्णु+त् बना। णु के उकार को ऊर्णोतेर्विभाषा से वैकल्पिक वृद्धि प्राप्त थी, उसे बाधकर गुणोऽपृक्ते से गुण होकर और्णोत् सिद्ध हुआ। यही प्रक्रिया सिप् में भी होती है किन्तु वहाँ पर अपृक्त सकार का रुत्व विसर्ग होकर और्णोः बन जाता है। मिप् के स्थान पर अम् आदेश होने के कारण अपृक्त नहीं मिलता। फलतः हलादि न होने से वृद्धि और अपृक्त न होने से विशेष गुण ये दोनों नहीं होते। अतः सार्वधातुकगुण होकर और्णवम् बनता है। शेष जगहों पर गुण नहीं होता। आत्मनेपद में भी गुण का प्रसंग नहीं है, क्योंकि न तो पित् मिलता है और न ही अपृक्त।

लड्- परस्मैपद के रूप- और्णोत्, और्णुताम्, और्णुवन्, और्णोः, और्णुतम्, और्णुत, और्णवम्, और्णुव, और्णुम। आत्मनेपद- और्णुत, और्णुवाताम्, और्णुवत, और्णुथाः, और्णुवाथाम्, और्णुध्वम्, और्णवि, और्णुवहि, और्णुमहि।

विधिलिङ् में यासुट् डित् है, अतः पित् नहीं हो सकता। फलतः वैकल्पिक वृद्धि नहीं होगी और डित्त्व के कारण सार्वधातुकगुण का भी निषेध होगा। आत्मनेपद में सीयुट् के सकार का लिङ्ः सलोपोऽनन्त्यस्य से लोप होने के कारण अच् मिलता है, अतः उवड् होकर रूप सिद्ध होते हैं। परस्मैपद- ऊर्णुयात्, ऊर्णुयाताम्, ऊर्णुयुः, ऊर्णुयाः, ऊर्णुयातम्, ऊर्णुयात, ऊर्णुयाम्, ऊर्णुयाव, ऊर्णुयाम। आत्मनेपद- ऊर्णुवीत, ऊर्णुवीयाताम्, ऊर्णुवीरन्, ऊर्णुवीथाः, ऊर्णुवीयाथाम्, ऊर्णुवीध्वम्, ऊर्णुवीय, ऊर्णुवीवहि, ऊर्णुवीमहि।

आशीर्लिङ् के परस्मैपद में अकृत्सार्वधातुकयोर्दीर्घः से दीर्घ होता है और आत्मनेपद में सीयुट्, सुट्, इट् आदि होकर उर्णु+इ+सीस्+त है, विभाषोर्णोः से इडादिप्रत्यय को विकल्प से डित् होकर उवड् और अडित् के पक्ष में आर्धधातुकगुण

होकर रूप बनते हैं। परस्मैपद- ऊर्णूयात्, ऊर्णूयास्ताम्, ऊर्णूयासुः आदि। आत्मनेपद, डित्त्वपक्ष में उवड्- ऊर्णुविषीष्ट, ऊर्णुविषीयास्ताम्, ऊर्णुविषीरन्, ऊर्णुविषीष्टाः, ऊर्णुविषीयास्थाम्, ऊर्णुविषीढ्वम्-ऊर्णुविषीध्वम्, ऊर्णुविषीय, ऊर्णुविषीवहि, ऊर्णुविषीमहि। अडित् के पक्ष में गुण- ऊर्णविषीष्ट, ऊर्णविषीयास्ताम्, ऊर्णविषीरन् आदि।