ऊर्णुञ् आच्छादने॥२५॥
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वा वृद्धिः स्याद् हलादौ पिति सार्वधातुके।
ऊर्णोति, ऊर्णोति। ऊर्णुतः, ऊर्णुवन्ति। ऊर्णुते। ऊर्णुवाते। ऊर्णुवते।
वार्तिकम्- उर्णोतेराम्नेति वाच्यम्।
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६००- ऊर्णोतेर्विभाषा। ऊर्णोतेः षष्ठ्यन्तं, विभाषा प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। उतो वृद्धिर्लुकि हलि से वृद्धिः और हलि की तथा नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से पिति और सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।
हलादि पित् सार्वधातुक के परे होने पर ऊर्णुञ् धातु की विकल्प से वृद्धि होती है।
लट्, लोट्, लङ् और विधिलिङ् ये सार्वधातुक हैं और तिप्, सिप्, मिप् ये पित् हैं। विधिलिङ् में यासुट् के डित् होने के कारण वृद्धि का निषेध होता है।
ऊर्णोति, ऊर्णोति। ऊर्णु से लट्, तिप्, शप्, उसका लुक् करके ऊर्णु+ति है। ति के पित् होने के कारण ऊर्णोतेर्विभाषा से णु के उकार की विकल्प से औ के रूप में वृद्धि होकर ऊर्णोति सिद्ध हुआ। वृद्धि न होने के पक्ष में सार्वधातुकार्धधातुकयोः से ओकार गुण होकर ऊर्णोति बना। इसी तरह सिप् और मिप् में भी दो-दो रूप बनते हैं। द्विवचन में तो अपित् सार्वधातुक होने के कारण डित् है, अतः गुण भी निषिद्ध है- ऊर्णुतः। बहुवचन में झि के स्थान पर अन्त् आदेश होने के बाद अजादि मिलता है। अतः अचि श्नुधातुभुवां य्वोरियङुवङौ से णु के उकार के स्थान पर उवङ् होकर ऊर्णुवन्ति बनता है। आत्मनेपद में सभी अपित् हैं अतः डित् हो जाते हैं। अतः वृद्धि भी नहीं होगी और गुण भी नहीं होगा।