Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 599
उमागमविधायकं विधिसूत्रम्
वच उम्
Aṣṭādhyāyī 7.4.20
Vṛtti Varadarājācārya

अङि परे। अवोचत्, अवोचत। अवक्ष्यत्, अवक्ष्यत।

गणसूत्रम्- चर्करीतं च। चर्करीतमिति यङ्लुगन्तस्य संज्ञा, तददादौ बोध्यम्।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५९९- वच उम्। वचः षष्ठ्यन्तम्, उम् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। ऋदृशोऽङि गुणः से अङि की अनुवृत्ति आती है।

अङ् के परे होने पर वच् धातु को उम् का आगम होता है।

मकार की इत्संज्ञा होती है। मित् होने के कारण मिदचोऽन्त्यात् परः से अन्त्य अच् वकारोत्तरवर्ती अकार के बाद और चकार के पहले होता है।

अवोचत्। ब्रू से लुङ् की विवक्षा में ब्रुवो वचि से वच् आदेश, लुङ्, अट् का आगम, ति, करके अवच्+त् बना। च्लि, उसके स्थान पर सिच् प्राप्त, उसे बाधकर के

अस्यतिवक्तिख्यातिभ्योऽङ् से अङ् आदेश करके अवच्+अत् बना। वच उम् से उम् का आगम, अव+उच्+अत् बना। अव+उच् में गुण होकर अवोच् बना। आगे वर्णसम्मेलन करके अवोचत् सिद्ध हुआ। इसी तरह ही आत्मनेपद में भी होता है।

लृङ्- अवोचत्, अवोचताम्, अवोचन्, अवोचः, अवोचतम्, अवोचत, अवोचम्, अवोचाव, अवोचाम। अवोचत, अवोचेताम्, अवोचन्त, अवोचथाः, अवोचेथाम्, अवोचध्वम्, अवोचे, अवोचावहि, अवोचामहि। लृङ्- अवक्ष्यत्। अवक्ष्यत।

चर्करीतं च। इसे गणसूत्र माना जाता है। चर्करीत यह यङ्लुगन्त की संज्ञा है, इसे अदादिगण में मानना चाहिए। यह वचन पाणिनि जी ने धातुपाठ के अदादिगण में पढ़ा है। इसका तात्पर्य यह है कि चर्करीत को अदादिगण में गिना जाये। पाणिनि से पूर्ववर्ती आचार्यों ने यङ्लुगन्त धातुओं को चर्करीत संज्ञा दी थी। उसी का व्यवहार पाणिनि जी ने यहाँ पर किया है। चर्करीत का अदादिगण में पाठ करने से यङ्लुगन्त में अदिप्रभृतिभ्यः शपः से शप् का लुक् हो सकता है।

ऊर्णुञ् आच्छादने। ऊर्णुञ् धातु आच्छादन अर्थात् ढकने के अर्थ में है। जकार की इत्संज्ञा होती है, ऊर्णु शेष रहता है। जित् होने से उभयपदी है और अनेकाच् होने से सेट् है।