Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 601
न न्द्राः संयोगादयः
Aṣṭādhyāyī 6.1.3
Vṛtti Varadarājācārya

अचः पराः संयोगादयो नदरा द्विर्न शब्दस्य द्वित्वम्। कर्णुनाव।

कर्णुनुवतुः। कर्णुनुवुः।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

६०१- न न्द्राः संयोगादयः। न् च द् च रश्च तेषामितरेतरद्वन्द्वो न्द्राः। संयोगस्य आदयः

संयोगादयः। न अव्ययपदं, न्द्राः प्रथमान्तं, संयोगादयः प्रथमान्तं, त्रिपदमिदं सूत्रम्। अजादेद्वितीयस्य

से अजादेः और एकाचो द्वे प्रथमस्य से द्वे की अनुवृत्ति आती है।

अच् से परे संयोग के आदि में स्थित नकार, दकार और रकार को द्वित्व

नहीं होता है।

कर्णु आदिभूत अच् वाला अनेकाच् धातु है। अतः अजादेद्वितीयस्य के नियम

से द्वितीय एकाच र्णु को द्वित्व प्राप्त है। र्णु में रेफ को द्वित्व करना आचार्य को अभीष्ट

नहीं था। अतः इस सूत्र से रेफ के द्वित्व का निषेध किया गया। अब र्णु को द्वित्व किया

जा सकता है क्या? नहीं, क्योंकि रेफ के योग में नकार को णत्व हुआ था। अब रेफ के

अलग हो जाने से निमित्तापाये नैमित्तिकस्याप्यपायः के नियम से णकार भी नकार को

प्राप्त होता है। इस तरह र्णु भी नु के रूप में आयेगा और केवल नु मात्र को द्वित्व होगा।

कर्णुनाव। कर्णु से लिट्, तिप्, णल् करके कर्णु+अ बना। कर्+णु में र्णु को नु

मानकर द्वित्व हुआ- कर्+णु+नु+अ बना। नु को अचो ञ्णिति से वृद्धि होकर कर्णुनौ+अ

बना। आव् आदेश और वर्णसम्मेलन करके कर्णुनाव सिद्ध हुआ। अतुस् के परे वृद्धि प्राप्त

नहीं है, अतः अचि श्नुधातुभुवां य्वोरियडुवडौ से नु के उकार के स्थान पर उवड् होकर

कर्णु+न्+उव्+अतुस् बना। वर्णसम्मेलन होकर कर्णुनुवतुः सिद्ध हुआ। बहुवचन में भी इसी

तरह कर्णुनुवुः बनता है।