Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 596
ईडागमविधायकं विधिसूत्रम्
ब्रुव ईट्
Aṣṭādhyāyī 7.3.93
Vṛtti Varadarājācārya

ब्रुवः परस्य हलादेः पित ईट् स्यात्।

ब्रवीति। ब्रूतः। ब्रुवन्ति। ब्रूते। ब्रुवाते। ब्रुवते।

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Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५९६- ब्रुव ईट्। ब्रुवः पञ्चम्यन्तम्, ईट् प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। उतो वृद्धिर्लुकि हलि से हलि और नाभ्यस्तस्याचि पिति सार्वधातुके से पिति एवं सार्वधातुके की अनुवृत्ति आती है।

ब्रू से परे हलादि पित् को ईट् का आगम होता है।

इस तरह तिप्, सिप् और मिप् में ही ईट् हो पाता है।

ब्रवीति। ब्रू से लट् में आह् आदि न होने के पक्ष में ब्रू+ति है। पित् ति को ब्रुव ईट् से ईट् का आगम होकर ब्रू+ईति बना। सार्वधातुकगुण होकर ब्रो+ईति हुआ। अव् आदेश होकर ब्रवीति सिद्ध हुआ। द्विवचन में पित् न होने के कारण ईट् नहीं होता। अतः ब्रूतः बनता है। बहुवचन में ब्रू+अन्ति है। अचि श्नुधातुभुवां य्वोरियङ्वङौ से उवङ् होकर ब्रू+उव्+अन्ति बना। वर्णसम्मेलन होकर ब्रुवन्ति सिद्ध हुआ। सिप् और मिप् में ईट्, गुण और अव् आदेश होते हैं तथा शेष में कुछ नहीं होता। इस तरह ब्रू के परस्मैपद में रूप बनते हैं- आह-ब्रवीति, आहतुः-ब्रूतः, आहुः-ब्रुवन्ति, आत्थ-ब्रवीषि, आहथुः-ब्रूथः, ब्रूथ, ब्रवीमि, ब्रूवः, ब्रूमः। आत्मनेपद में ङित्त्व के कारण कहीं भी गुण नहीं होगा और पित् न होने से ईट् भी नहीं होगा। अजादि प्रत्ययों के परे उवङ् होता है। इस तरह रूप बनते हैं- ब्रूते, ब्रुवाते, ब्रुवते, ब्रूषे, ब्रुवाथे, ब्रूध्वे, ब्रुवे, ब्रूवहे, ब्रूमहे।