Premabase · Laghu-siddhānta-kaumudī · Prakaraṇa 13
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VṛttiGovind
LSK 597
वचादेशविधायकं विधिसूत्रम्
ब्रुवो वचिः
Aṣṭādhyāyī 2.4.53
Vṛtti Varadarājācārya

आर्धधातुके। उवाच। ऊचतुः। ऊचुः। उवचिथ, उवक्थ। ऊचे। वक्तासि, वक्तासे। वक्ष्यति, वक्ष्यते। ब्रवीतु, ब्रूतात्। ब्रुवन्तु। ब्रूहि। ब्रवाणि। ब्रूताम्। ब्रवै। अब्रवीत्। अब्रूत। ब्रूयात्, ब्रुवीत। उच्यात्, वक्षीष्ट।

Hindi commentary Govind Prasad Sharma · śrīdhara-mukhollāsinī

५९७- ब्रुवो वचिः। ब्रुवः षष्ठ्यन्तं, वचिः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। आर्धधातुके का अधिकार है।

आर्धधातुक की विवक्षा में ब्रू के स्थान पर वच् आदेश होता है।

उवाच। ब्रू से लिट् लकार में आर्धधातुकसंज्ञा होती ही है, उसकी विवक्षा में ब्रुवो वचि से वच् आदेश हुआ। उसके बाद, परस्मैपद में तिप्, णल् होकर वच्+अ बना। वच् को द्वित्व, हलादिशेष होकर व+वच्+अ बना। लिट्यभ्यासस्योभयेषाम् से अभ्यास के वकार को सम्प्रसारण होकर उकार और सम्प्रसारणाच्च से पूर्वरूप होकर उवच्+अ बना। अत उपधायाः से वृद्धि होकर उवाच सिद्ध हुआ। द्विवचन में तो वचिस्वपियजादीनां किति से द्वित्व के पहले ही सम्प्रसारण होकर उच्+अतुस् बनता है। उच् को द्वित्व, हलादिशेष की प्रक्रिया में चकार का लोप होकर उ+उच्+अतुस् बना। सवर्णदीर्घ, वर्णसम्मेलन और सकार को रुत्वविसर्ग करके ऊचतुः सिद्ध होता है। इसी तरह बहुवचन में ऊचुः बनता है। थल् में क्रादिनियम से इट् की प्राप्ति, उपदेशेऽत्वतः से इट् का निषेध, पुनः ऋतो भारद्वाजस्य के अनुसार वैकल्पिक इट् होता है। इट् के पक्ष में वच्+इथ ऐसी स्थिति है। वच् को द्वित्व, हलादिशेष, सम्प्रसारण करके उवच्+इथ बना। वर्णसम्मेलन होकर उवचिथ सिद्ध हुआ। इट् न होने के पक्ष में चकार को चोः कुः से कुत्व करके उवक्थ बनता है। इस तरह परस्मैपद लिट् में रूप बनते हैं- उवाच, ऊचतुः, ऊचुः, उवचिथ-उवक्थ, ऊचथुः, ऊच। उवाच-उवच, ऊचिव, ऊचिम।

लिट् के आत्मनेपद में- वचिस्वपियजादीनां किति से पहले ही सम्प्रसारण होकर रूप बनते हैं- ऊचे, ऊचाते, ऊचिरे, ऊचिषे, ऊचाथे, ऊचिध्वे, ऊचे, ऊचिवहे, ऊचिमहे।

लृट्- वच्+तास्+डा, वच्+ता, चोः कुः से कुत्व होकर वक्ता। वक्ता, वक्तारौ, वक्तारः, वक्तासि। वक्तासे, वक्तासाथे, वक्ताध्वे, वक्ताहे, वक्तास्वहे, वक्तास्महे।

लृट्- वच्+स्यति, कुत्व, षत्व, क्षत्व होकर वक्ष्यति बनता है। वक्ष्यते।

लोट्- ब्रवीतु-ब्रूतात्, ब्रूताम्, ब्रुवन्तु, ब्रूहि-ब्रूतात्, ब्रूतम्, ब्रूत, ब्रवाणि, ब्रवाव, ब्रवाम। आत्मनेपद- ब्रूताम्, ब्रुवाताम्, ब्रुवताम्, ब्रूष्व, ब्रुवाथाम्, ब्रूध्वम्, ब्रवै, ब्रवावहै, ब्रवामहै।

लङ्- अब्रवीत्, अब्रूताम्, अब्रुवन्, अब्रवीः, अब्रूतम्, अब्रूत, अब्रवम्, अब्रूव, अब्रूम। आत्मनेपद- अब्रूत, अब्रुवाताम्, अब्रुवत, अब्रूथाः, अब्रुवाथाम्, अब्रूध्वम्, अब्रुवि, अब्रूवहि, अब्रूमहि।

विधिलिङ्- ब्रूयात्, ब्रूयाताम्, ब्रूयुः, ब्रूयाः। ब्रुवीत, ब्रवीयाताम्, ब्रुवीरन्।

आशीर्लिङ्- उच्यात्, उच्यास्ताम्, उच्यासुः। वक्षीष्ट, वक्षीयास्ताम्, वक्षीरन्।