झलि परे। चर्त्वम्। आत्थ। आहथुः।
५९५- आहस्थः। आहः षष्ठ्यन्तं, थः प्रथमान्तं, द्विपदमिदं सूत्रम्। झलो झलि से झलि की अनुवृत्ति आती है। षष्ठीनिर्दिष्ट होने से अलोऽन्त्यस्य की उपस्थिति होती है।
झल् परे होने पर आह् के अन्त्य अल् हकार के स्थान पर थकार आदेश होता है।
आत्थ। ब्रू से सिप्, उसके स्थान पर थल् आदेश और धातु के स्थान पर आह् आदेश करके आह्+थ बना। आहस्थः से हकार के स्थान पर थकार आदेश हुआ तो आथ्+थ बना। पूर्व थकार को खरि च से चर्त्व होकर आत्थ सिद्ध हुआ। द्विवचन में आहथुः बनेगा ही। आह् और णल् आदि न होने के पक्ष में अग्रिम सूत्र लगता है।