ब्रूञ् व्यक्तायां वाचि॥२४॥
.....
ब्रुवो लटस्तिबादीनां पञ्चानां णलादयः पञ्च वा स्युर्ब्रुवश्चाहादेशः।
आह। आहतुः। आहुः।
५९४- ब्रुवः पञ्चानामादित आहो ब्रुवः। ब्रुवः पञ्चम्यन्तं, पञ्चानां षष्ठ्यन्तम्, आदितः अव्ययपदम्, आहः प्रथमान्तं, ब्रुवः षष्ठ्यन्तम्, अनेकपदमिदं सूत्रम्। विदो लटो वा से लटः और वा की तथा परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसणल्वमाः से परस्मैपदानां णलतुसुस्थलथुसः की अनुवृत्ति आती है।
ब्रू-धातु से परे लट् के स्थान पर हुए तिप्, तस्, झि, सिप् और थस् इन पाँच प्रत्ययों के स्थान पर क्रमशः णल्, अतुस्, उस्, थल् और अथुस् ये पाँच आदेश विकल्प से होते हैं साथ ही ब्रू के स्थान पर आह आदेश भी हो जाता है।
यह सूत्र दो कार्य करता है- प्रथम तो णल् आदि आदेश और दूसरा धातु के स्थान पर आह आदेश। अभी तक लिट् लकार के स्थान पर हुए तिप् आदि के स्थान पर णल् आदि आदेश हो रहे थे। यहाँ पर ब्रू धातु के लट् के आदि से पाँच प्रत्ययों के स्थान पर भी इस सूत्र से उक्त आदेशों का विधान हुआ है।
आह। ब्रू धातु से लट्, तिप्, शप्, उसका लुक् करके ब्रू+ति बना। ब्रुवः पञ्चानामादित आहो ब्रुवः से ति के स्थान पर वैकल्पिक णल् और ब्रू के स्थान पर वैकल्पिक आह् आदेश होकर आह्+अ बना। वर्णसम्मेलन होकर आह सिद्ध हुआ। लिट् न होने के कारण द्वित्व आदि का प्रसंग नहीं है। इसी तरह द्विवचन और बहुवचन में आहतुः और आहुः ये रूप बनते हैं।